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Good morning friends..
GANESH TEWARI 'NESH' (NASH)
सेवक हूँ मैं ईश का, नहीं तनिक परवाह। उम्र ढली अब जगत से, नहीं मुझे कुछ चाह।।
दोहा-- 4६१
(नैश के दोहे से उद्धृत)
-------गणेश तिवारी 'नैश'
Sonu Kumar
यदि पीएम जूरी कोर्ट का प्रस्तावित कानून गेजेट में छाप देता है लेकिन सुप्रीम कोर्ट इसे असंवैधानिक बता कर रद्द कर देता है, तो क्या किया जा सकता है ?
https://hi.quora.com/q/gtevjihzvzgehiip/जूरी-कोर्ट-शेषन-हायर-सुप्रीम-कोर्ट-में-जूरी-अदालतो-की-स्थापना
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जूरी कोर्ट के प्रस्तावित क़ानून की कोई भी धारा भारतीय संविधान के किसी भी अनुच्छेद एवं भारत में लागू किसी भी क़ानून की किसी भी धारा का उलंघन नहीं करती है। यहाँ तक कि पीएम को जूरी कोर्ट गेजेट में निकालने के लिए लोकसभा की अनुमति लेने की भी जरूरत नहीं है। पीएम इस पर हस्तक्षर करके सीधे गेजेट में छाप सकता है। किन्तु यह तकनिकी बिंदु है, व्यवहारिक नहीं।
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व्यवहारिक बिंदु यह है कि यदि पीएम जूरी कोर्ट गेजेट में छापता है तो सुप्रीम कोर्ट के भ्रष्ट जजों के पास इस क़ानून को खारिज करने की विवेकाधीन शक्ति है। और इसीलिए यह तय है कि कोई न कोई बहाना बनाकर सुप्रीम कोर्ट के भ्रष्ट जज इसमें अडंगा जरुर लगायेंगे।
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और तब पीएम निम्नलिखित में से कोई या क्रमिक रूप से सभी कदम उठा सकता है :
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(i) पीएम गेजेट में सुप्रीम कोर्ट जज पर वोट वापसी की प्रक्रिया छापेगा। वोट वापसी आने के बाद भारत के नागरिक अमुक सुप्रीम कोर्ट जज को नौकरी से निकाल कर किसी ऐसे व्यक्ति को यह नौकरी दे देंगे जो जूरी कोर्ट क़ानून में अडंगा नहीं लगाए।
(ii) यदि सुप्रीम कोर्ट का भ्रष्ट जज वोट वापसी का क़ानून भी ख़ारिज कर देता है तो पीएम सुप्रीम कोर्ट के भ्रष्ट जज के खिलाफ संसद में महाभियोग लाएगा। पीएम महाभियोग द्वारा सुप्रीम कोर्ट के भ्रष्ट जज को नौकरी से निकालकर अपने किसी भी वफादार को सुप्रीम कोर्ट का मुख्य न्यायाधीश नियुक्त कर सकता है।
(iii) यदि महाभियोग गिर जाता है तो पीएम सुप्रीम कोर्ट के माता-पिता, पुत्र-पुत्री, भाई-भतीजो आदि के खिलाफ सीबीआई लगाकर उलटे सीधे मुकदमे कायम करेगा और उन्हें जेल में डाल देगा। पीएम इसके लिए लोकसभा के प्रस्ताव का इस्तेमाल करेगा। ज्ञातव्य है कि लोकसभा को यह शक्ति है कि वह देश के किसी भी व्यक्ति को बिना कोई मुकदमा चलाये जेल में डाल सकती है। और इसकी अपील अदालत में नहीं की जा सकती।
(iv) पीएम गेजेट में जनमत संग्रह की प्रक्रिया छापेगा, और देश के सामने यह प्रश्न रखेगा कि क्या सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा जज को नौकरी से निकाल दिया जाना चाहिए। यदि 51% मतदाता जनमत संग्रह में “हाँ” दर्ज कर देते है तो पीएम सुप्रीम कोर्ट के भ्रष्ट जज को निकाल देगा। जनमत संग्रह में यदि कोई प्रस्ताव पास हो जाता है तो फिर उसे लोकसभा या राज्यसभा द्वारा रोका नहीं जा सकता।
(v) यदि जनमत संग्रह के पास होने के बावजूद सांसद इसमें अडंगा करते है तो पीएम सांसदों पर वोट वापसी का क़ानून छापेगा ताकि नागरिक जूरी कोर्ट का विरोध कर रहे सांसदों को निकाल कर नए सांसद भेज सके।
(vi) यदि सांसद वोट वापसी के दायरे में आने से इनकार करते है तो पीएम लोकसभा भंग करके नए चुनावो की घोषणा करेगा। नए चुनावों में वे सभी सांसद हार जायेंगे जो जूरी कोर्ट के विरोध में थे, और वे प्रत्याशी जीत कर संसद में जायेंगे जो जूरी कोर्ट के समर्थन में है।
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ये सब सीधे तरीके है। इसके अलावा पीएम टेढ़े तरीको का इस्तेमाल करके भी सुप्रीम कोर्ट जज को काबू कर सकता है :
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पीएम इमरजेंसी का प्रस्ताव पास करेगा, और सुप्रीम कोर्ट बंद करवा देगा। आपातकाल लगाने के बाद पीएम जीतने मर्जी उतने क़ानून छाप सकता है और सुप्रीम कोर्ट इन कानूनों का रिव्यू नहीं कर सकता। आपातकाल लगाने के बाद पीएम सुप्रीम कोर्ट के भ्रष्ट जज को उसके रिश्तेदारों के एनकाउन्टर वगेरह करने की धमकी भी दे सकता है। पीएम के पास पुलिस और मिलिट्री होती है।
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अत: यदि पीएम बल प्रयोग करने पर आये तो सुप्रीम कोर्ट जज को 2 मिनिट में ठिकाने कर सकता है। हालांकि मेरे विचार में पीएम को आपातकाल लगाकर इस तरह की हिंसात्मक कार्यवाही करने की जरूरत नहीं है, और न ही उसे इस दिशा में कदम उठाना चाहिए। ऐसे कई सीधे और कानूनी तरीके मौजूद है जिनका इस्तेमाल करके पीएम लोकतान्त्रिक तरीके से सुप्रीम कोर्ट जज को चित कर सकता है।
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यदि पीएम लोकतान्त्रिक तरीके से यह स्थापित कर देता है कि, सुप्रीम कोर्ट का भ्रष्ट जज नागरिको के बहुमत की मंशा के खिलाफ जा रहा है तो अहिंसामूर्ती महात्मा उधम सिंह जी(*) सक्रीय होकर सुप्रीम कोर्ट के भ्रष्ट जज से मुलाक़ात करने को तत्पर हो जायेंगे। और इससे पहले कि अहिंसामूर्ती महात्मा उधम सिंह जी सुप्रीम कोर्ट जज से मुलाक़ात करें सुप्रीम कोर्ट जज या तो इस्तीफा दे देगा या फिर जूरी कोर्ट में अडंगा लगाना बंद कर देगा।
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तो मेरे विचार में सही तरीका यह है कि यदि सुप्रीम कोर्ट के भ्रष्ट जज जूरी कोर्ट क़ानून में अडंगा लगाते है तो पीएम इस स्थिति को लोकतान्त्रिक तरीके से निपटाए, बल प्रयोग से नहीं।
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(*) अहिंसामूर्ती महात्मा उधम सिंह जी लोकतंत्र के रक्षक है। जब सत्ता में बैठा कोई व्यक्ति स्पष्ट बहुमत के खिलाफ जाता है तो जिन भी लोगो में अहिंसामूर्ती महात्मा उधम सिंह जी का अंश है वे लोकतन्त्र की पुनर्स्थापना के लिए आवश्यक कदम उठाते है। यहाँ इस बात पर ध्यान देना जरुरी है कि अहिंसामूर्ती महात्मा उधम सिंह जी अपने विवेक से सही गलत का फैसला नहीं करते। वे बस लोकतान्त्रिक मूल्यों का पालन करते है।
अहिंसामूर्ती महात्मा भगत सिंह जी, अहिंसामूर्ती महात्मा मदन लाल जी धींगरा, अहिंसामूर्ती महात्मा चंद्रशेखर आजाद आदि उधम सिंह जी के ही प्रकार थे, और गोरो द्वारा लोकतंत्र की अवहेलना किये जाने के कारण वे अपने अपने तरीके से विभिन्न परिस्थितियों में गोरो से मुलाक़ात करते रहते थे।
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काम की बात : लोकतान्त्रिक तरीके से पीएम सिर्फ तभी आगे बढ़ पायेगा जब कार्यकर्ताओं का एक बड़ा वर्ग जूरी कोर्ट क़ानून का समर्थन करें। यदि देश के नागरिको को जूरी कोर्ट के क़ानून के बारे में कोई जानकारी नहीं है, और न ही कार्यकर्ताओ में इस क़ानून का समर्थन मौजूद है, तो पीएम को जनता का समर्थन नहीं मिलेगा, और पीएम सुप्रीम कोर्ट जज के आगे टिक नहीं पायेगा।
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वजह यह है कि सुप्रीम कोर्ट जज को पेड मीडिया के प्रायोजको का समर्थन प्राप्त है। अत: जब सुप्रीम कोर्ट जज जूरी कोर्ट को ख़ारिज करेगा तो देश के सभी मीडिया हाउस, सभी पेड मीडिया पार्टियाँ एवं उनके नेता, सभी सांसद, सभी पेड बुद्धिजीवी, सभी पेड संविधान विशेषग्य, सभी पेड कलाकार आदि सुप्रीम कोर्ट जज के पक्ष में एवं जूरी कोर्ट केविरोध में खड़े हो जायेंगे।
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आम असूचित नागरिक पेड मीडिया द्वारा संचालित इस गिरोह की चपेट में आकर पीएम के कदम का विरोध करना शुरू कर देंगे, या कम से कम पीएम का समर्थन नहीं करेंगे। ऐसी स्थिति में पीएम इस गिरोह से निपट नहीं सकता। पीएम इस गैंग से सिर्फ तब निपट सकता है जब पीएम को कम से कम 8 से 10 लाख ऐसे कार्यकर्ताओ का समर्थन हासिल हो, जो जूरी कोर्ट के ड्राफ्ट के समर्थन में है, और पेड मीडिया की गिरफ्त से बाहर है।
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सार यह है कि, जूरी कोर्ट जैसा क़ानून पीएम के चाहने भर से रातों रात देश में लागू नहीं किया जा सकता। इसका सिर्फ एक रूट यह है कि बिना पेड मीडिया की सहायता के भारत में कम से कम 10 लाख कार्यकर्ताओ को जूरी कोर्ट क़ानून का समर्थन करने के लिए तैयार किया जाए। और 10 लाख कार्यकर्ताओं तक पहुँचने के लिए कम से कम 10 करोड़ नागरिको तक जूरी कोर्ट ड्राफ्ट की जानकारी पहुंचानी होगी। वो भी पेड मीडिया के बिना। जाहिर है, यह काफी दुरूह एवं लम्बी प्रक्रिया है। यह काम तब और भी चुनौतीपूर्ण बन जाता है, जब पेड मीडिया के प्रायोजक जूरी ट्रायल के बारे में गलत एवं अधूरी सूचनाएं देकर लोगो को लगातार भ्रमित करते रहने वाले है।
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जूरी कोर्ट जैसे क़ानून को गेजेट में छपवाने की प्रक्रिया के बारे में विस्तृत विवरण मैंने इस जवाब में दिया है। इसे पढ़े -- Pawan Kumar Sharma का जवाब - क्या भारत सुपर पावर बन सकता है? कैसे और कब? नागरिकों की क्या भूमिका होनी चाहिए?
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मेरा मानना है कि, जूरी ट्रायल मानव जाति द्वारा खोजा गया एक मात्र लंगर है जो सरकार को संविधान एवं इसके सिद्धांतो का पालन करने के लिए सफलतापूर्वक बाध्य कर सकता है -
थॉमस जेफरसन ( अमेरिकी स्वतंत्रता के घोषणा पत्र के लेखक )
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Rashmi Dwivedi
अच्छे समय से ज्यादा अच्छे इंसान के साथ रिश्ता रखो अच्छा इंसान अच्छा समय ला सकता है लेकिन अच्छा समय अच्छा इंसान नहीं ला सकता। हर हर महादेव ❤️
- Rashmi Dwivedi
महेश रौतेला
बहुत समय से मैं
भगवान की तरफ हूँ,
आँधी हो,तूफान हो
युद्ध हो,महायुद्ध हो,
अमीरी हो,गरीबी हो
मैं भगवान की तरफ रहता हूँ।
बाढ़ हो,सूखा होः
गर्मी हो, ठंड हो या वसंत हो
मेरी आशा-आकांक्षा उनमें रहती है।
गीता पढ़ता हूँ
लोक,परलोक की बातें समझ लेता हूँ,
"जो पहले ही मारे जा चुके हैं
उन्हें मारने का निमित्त मात्र बन
भगवान की ओर रहता हूँ।"
संशय से बाहर आने के लिए
कर्म बन जाता हूँ,
शायद भगवान ऐसा ही चाहते हैं।
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*** महेश रौतेला
GANESH TEWARI 'NESH' (NASH)
ऋगुवेद सूक्ति-- (47) की व्याख्या
"उद्वत्यं जातवेदसं देवं वहन्ति केतव:" --ऋगुवेद--1/50/10
अर्थ --सूर्य की किरणें ज्ञान का प्रकाश फैलाती हैं।
“उद्वत्यं जातवेदसं देवं वहन्ति केतवः” (ऋग्वेद 1/50/10)—यह अत्यंत सुंदर और गहन अर्थ वाला है।
शब्दार्थ (सरल रूप में)-
उद्वत्यम् = ऊपर उठता हुआ
जातवेदसम् = सबको जानने वाला (यहाँ सूर्य)
देवम् = प्रकाशमान/दैवी सत्ता
वहन्ति = लेकर आते हैं
केतवः = किरणें (प्रकाश की धाराएँ)
भावार्थ-
सूर्य की किरणें उस सर्वज्ञ, प्रकाशमय देव (सूर्य) को ऊपर उठाकर प्रकट करती हैं और संसार में प्रकाश फैलाती हैं।
गूढ़ अर्थ (आध्यात्मिक दृष्टि से)
दिया हुआ अर्थ —
“सूर्य की किरणें ज्ञान का प्रकाश फैलाती हैं” — बिल्कुल सही और व्याख्यात्मक है।
इस मंत्र का संकेत यह है कि:
सूर्य = परम चेतना / ज्ञान का स्रोत
किरणें = ज्ञान, विवेक, प्रेरणा
जैसे सूर्य की किरणें अंधकार हटाती हैं, वैसे ही ज्ञान अज्ञान (अंधकार) को दूर करता है।
वेदों में प्रमाण--
1. ऋग्वेद-- 1/50/10
“उद्वत्यं जातवेदसं देवं वहन्ति केतवः”
भावार्थ: सूर्य की किरणें उस प्रकाशस्वरूप देव को ऊपर उठाकर प्रकट करती हैं और संसार को प्रकाशित करती हैं।
यह स्पष्ट करता है कि किरणें ज्ञान का प्रसार करती हैं।
2. ऋग्वेद-- 1/50/1
दृष्टे विश्वाय सूर्यम्॥”
भावार्थ: सूर्य उदित होकर सबको देखने योग्य बनाता है।
यहाँ सूर्य को दृष्टि (ज्ञान) देने वाला कहा गया है।
3. ऋग्वेद-- 10/37/1
“सूर्यो आत्मा जगतस्तस्थुषश्च”
भावार्थ: सूर्य चल-अचल जगत का आत्मा है।
इसका संकेत है कि सूर्य चेतना और ज्ञान का मूल स्रोत है।
4. यजुर्वेद-- 20/21
“चक्षुर्मित्रस्य वरुणस्याग्नेः…”
भावार्थ: सूर्य देवताओं का नेत्र है।
यहाँ सूर्य को दिव्य दृष्टि (ज्ञान) का प्रतीक बताया गया है।
5. अथर्ववेद- 13/2/35
“सूर्य आत्मा जगत:”
भावार्थ: सूर्य समस्त जगत का आत्मा है।
यह भी दर्शाता है कि सूर्य जीवन और ज्ञान का केंद्र है।
निष्कर्ष--
वेदों में बार-बार यह बात आती है कि:
सूर्य = प्रकाश + चेतना + ज्ञान
किरणें = ज्ञान का प्रसार
अंधकार = अज्ञान
इस प्रकार दिया हुआ अर्थ—
“सूर्य की किरणें ज्ञान का प्रकाश फैलाती हैं” —
पूरी तरह वैदिक प्रमाणों से समर्थित है।
उपनिषदों से प्रमाण--
1. ईशोपनिषद-- (मंत्र 15)
“हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम्।
तत्त्वं पूषन्नपावृणु सत्यधर्माय दृष्टये॥”
भावार्थ:
हे सूर्य! आप सत्य के मुख को स्वर्णिम आवरण से ढँके हुए हैं, कृपया उसे हटाइए ताकि मैं सत्य का दर्शन कर सकूँ।
यहाँ सूर्य से सत्य (ज्ञान) को प्रकट करने की प्रार्थना की गई है।
2. कठोपनिषद-- (2/2/15)
“न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं
नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः।
तमेव भान्तमनुभाति सर्वं
तस्य भासा सर्वमिदं विभाति॥”
भावार्थ:
वहाँ सूर्य, चंद्र, तारे या बिजली भी प्रकाश नहीं देते; बल्कि उसी परमात्मा के प्रकाश से सब कुछ प्रकाशित होता है।
यहाँ स्पष्ट है कि सूर्य का प्रकाश भी अंतिम ज्ञान (ब्रह्म) का प्रतीक है।
3. छान्दोग्य उपनिषद-- (3/13/7)
“य एष आदित्ये पुरुषो दृश्यते…”
भावार्थ:
जो पुरुष (आत्मा) सूर्य में दिखाई देता है, वही सबके भीतर भी है।
सूर्य को आत्मा और चेतना (ज्ञान) का प्रतीक बताया गया है।
4. बृहदारण्यक उपनिषद- (5/15/1)
“असतो मा सद्गमय।
तमसो मा ज्योतिर्गमय।
मृत्योर्मा अमृतं गमय॥”
भावार्थ:
असत्य से सत्य की ओर, अंधकार से प्रकाश (ज्ञान) की ओर, मृत्यु से अमरता की ओर ले चल।
यहाँ “ज्योति” स्पष्ट रूप से ज्ञान और जागरण का प्रतीक है।
5. मुण्डक उपनिषद (2/2/10)
“ब्रह्मैवेदममृतं पुरस्ताद्…”
भावार्थ:
यह संपूर्ण जगत ब्रह्मरूप प्रकाश से ही प्रकाशित है।
यह बताता है कि सच्चा प्रकाश = ब्रह्मज्ञान है।
निष्कर्ष--
उपनिषदों में बार-बार यह सिद्ध किया गया है कि:
सूर्य और उसका प्रकाश = ज्ञान का प्रतीक
ज्योति = आत्मिक जागृति और सत्य
अंधकार = अज्ञान
इस प्रकार आपका भाव—
“सूर्य की किरणें ज्ञान का प्रकाश फैलाती हैं” —
उपनिषदों के गूढ़ दर्शन से पूर्णतः प्रमाणित होता है।
पुराणों से प्रमाण --
1. विष्णु पुराण--
“सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च”
भावार्थ:
सूर्य सम्पूर्ण जगत (चल-अचल) का आत्मा है।
यहाँ सूर्य को जीवन और चेतना (ज्ञान) का मूल स्रोत माना गया है।
2. भागवत पुराण-- (श्रीमद्भागवत)
“नमः सवित्रे जगदेकचक्षुषे…”
भावार्थ:
उस सविता (सूर्य) को नमस्कार, जो सम्पूर्ण जगत का एकमात्र नेत्र है।
सूर्य को “जगत का नेत्र” कहा गया है, अर्थात् वह ज्ञान और दृष्टि देने वाला है।
3. मार्कण्डेय पुराण--
इसमें सूर्य को अज्ञान का नाश करने वाला बताया गया है।
भावार्थ --
सूर्य अपनी किरणों से अंधकार को नष्ट करता है, उसी प्रकार वह जीवों के अज्ञान को भी दूर करता है।
यह सीधा संकेत है कि सूर्य = ज्ञान का प्रकाश।
4- ब्रह्माण्ड पुराण_
एक प्रचलित श्लोक (सार रूप में उद्धृत):
“सूर्यः सर्वजगतां चक्षुः प्रकाशकः परः स्मृतः।”
भावार्थ:
सूर्य समस्त जगत का नेत्र और सर्वोच्च प्रकाशक है।
5-. गरुड़ पुराण--
गरुड़ पुराण (विशेषतः आचार/धर्म काण्ड) में सूर्य को पाप और अज्ञान का नाश करने वाला बताया गया है।
एक प्रचलित श्लोक (सार रूप में उद्धृत):
“सूर्यप्रकाशेन नश्यति तमो यथा भुवि।
तथा ज्ञानप्रकाशेन नश्यत्यज्ञानमात्मनः॥”
भावार्थ:
जैसे सूर्य के प्रकाश से अंधकार नष्ट होता है, वैसे ही ज्ञान के प्रकाश से अज्ञान नष्ट हो जाता है।
गीता में प्रमाण--
1. भगवद्गीता --5/16
“ज्ञानेन तु तदज्ञानं येषां नाशितमात्मनः।
तेषामादित्यवज्ज्ञानं प्रकाशयति तत्परम्॥”
भावार्थ:
जिनका अज्ञान ज्ञान द्वारा नष्ट हो गया है, उनका ज्ञान सूर्य के समान परम तत्व को प्रकाशित करता है।
यहाँ स्पष्ट कहा गया है:
ज्ञान = सूर्य जैसा प्रकाश।
2. भगवद्गीता-- 13/33
“यथा प्रकाशयत्येकः कृत्स्नं लोकमिमं रविः।
क्षेत्रं क्षेत्री तथा कृत्स्नं प्रकाशयति भारत॥”
भावार्थ:
जैसे एक सूर्य पूरे जगत को प्रकाशित करता है, वैसे ही आत्मा पूरे शरीर को प्रकाशित करती है।
सूर्य का प्रकाश = चेतना और ज्ञान का प्रतीक।
3. भगवद्गीता-- 15/12
“यदादित्यगतं तेजो जगद्भासयतेऽखिलम्…”
भावार्थ:
सूर्य में स्थित जो तेज सम्पूर्ण जगत को प्रकाशित करता है, वह मेरा ही (परमात्मा का) तेज है।
सूर्य का प्रकाश = ईश्वरीय ज्ञान और शक्ति।
4. भगवद्गीता-- 10/11
“तेषामेवानुकम्पार्थमहं अज्ञानजं तमः।
नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता॥”
भावार्थ:
मैं करुणा से उनके अज्ञान रूपी अंधकार को ज्ञान के दीपक से नष्ट करता हूँ।
यहाँ “दीप/प्रकाश” = ज्ञान और “अंधकार” = अज्ञान।
महाभारत में प्रमाण --
1. उद्योग पर्व (विदुर नीति) 34.17
“ज्ञानं हि मनुष्याणां प्रकाशः परिकीर्तितः।”
भावार्थ:
ज्ञान मनुष्यों का प्रकाश कहा गया है।
यह सीधा और स्पष्ट प्रमाण है:
ज्ञान = प्रकाश (सूर्य के समान)
2. शान्ति पर्व 238.11
“अज्ञानतिमिरान्धस्य ज्ञानाञ्जनशलाकया।
चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै…”
भावार्थ:
जो अज्ञान रूपी अंधकार से अंधे हुए व्यक्ति की आँखें ज्ञानरूपी अंजन से खोलता है…
यहाँ:
अज्ञान = अंधकार (तिमिर)
ज्ञान = आँख खोलने वाला प्रकाश
3. शान्ति पर्व-- 239.31
“ज्ञानदीपेन भास्वता…”
भावार्थ:
ज्ञान का दीपक प्रकाश देता है।
यहाँ:
ज्ञान = दीपक (प्रकाश स्रोत)
4. वन पर्व-- 313.117
“यथा सूर्यः प्रकाशेन नाशयत्यन्धकारकम्।
तथा ज्ञानं विनाशयत्यज्ञानं हि देहिनाम्॥”
भावार्थ:
जैसे सूर्य अपने प्रकाश से अंधकार को नष्ट करता है, वैसे ही ज्ञान अज्ञान को नष्ट कर देता है।
यह आपके भाव का सबसे सटीक प्रमाण है:
सूर्य का प्रकाश = ज्ञान का प्रतीक
5. शान्ति पर्व ---12.217.14 (सारांश रूप)
“ज्ञानं परमं बलम्।”
भावार्थ:
ज्ञान ही सर्वोच्च शक्ति है।
ज्ञान को जीवन का मार्गदर्शक (प्रकाश) माना गया है।
निष्कर्ष--
महाभारत में स्पष्ट रूप से सिद्ध है कि:
ज्ञान = प्रकाश (दीप, सूर्य, ज्योति)
अज्ञान = अंधकार (तिमिर)
ज्ञान का उदय = अंधकार का नाश
इस प्रकार आपका मूल भाव—
“सूर्य की किरणें ज्ञान का प्रकाश फैलाती हैं” —
महाभारत के श्लोकों से प्रत्यक्ष रूप में प्रमाणित होता है।
स्मृतियों में प्रमाण --
1. मनुस्मृति (अध्याय- 2, श्लोक- 15)
“वेदोऽखिलो धर्ममूलं स्मृतिशीले च तद्विदाम्।”
भावार्थ:
समस्त वेद धर्म का मूल हैं और उन्हें जानने वालों की स्मृति और आचरण भी।
यहाँ वेद/ज्ञान को ही धर्म का आधार (प्रकाश) माना गया है—
जो जीवन को प्रकाशित करता है।
2. मनुस्मृति (अध्याय 4, श्लोक 138)
“नास्ति विद्यासमं चक्षुः नास्ति सत्यसमं तपः।”
भावार्थ:
विद्या के समान कोई नेत्र (प्रकाश) नहीं है और सत्य के समान कोई तप नहीं।
यहाँ स्पष्ट:
विद्या (ज्ञान) = चक्षु (प्रकाश)
3. याज्ञवल्क्य स्मृति (अध्याय- 1, श्लोक- 3)
“वेदो धर्ममूलं स्मृतिशीले च तद्विदाम्।”
भावार्थ:
वेद धर्म का मूल है, और स्मृति तथा सदाचार भी।
यहाँ भी ज्ञान को जीवन का मार्गदर्शक (प्रकाश) माना गया है।
4. याज्ञवल्क्य स्मृति (अध्याय -3, श्लोक- 56)
“ज्ञानं तु परमं प्रकाशं।” (सारतः)
भावार्थ:
ज्ञान ही सर्वोच्च प्रकाश है।
यह सीधा सिद्धांत है:
ज्ञान = प्रकाश
5. नारद स्मृति (अध्याय 1, श्लोक 6)
“धर्मशास्त्रं तु विज्ञेयम्।”
भावार्थ:
धर्मशास्त्र को जानना चाहिए।
यहाँ “जानना (ज्ञान)” ही मार्गदर्शक है—
जो अज्ञान (अंधकार) को दूर करता है।
6. पराशर स्मृति- (अध्याय- 1, श्लोक- 24)
“ज्ञानदीपः प्रकाशो हि पापान्धकारनाशनः।”
भावार्थ:
ज्ञान का दीपक पाप और अंधकार का नाश करने वाला प्रकाश है।
निष्कर्ष--
स्मृतियाँ में यह स्पष्ट सिद्धांत मिलता है:
विद्या/ज्ञान = चक्षु / प्रकाश
अज्ञान = अंधकार
ज्ञान जीवन को प्रकाशित करता है (सूर्य की किरणों की तरह)
इस प्रकार आपका मूल भाव—
“सूर्य की किरणें ज्ञान का प्रकाश फैलाती हैं” —
स्मृतियों के शास्त्रीय सिद्धांतों से भी प्रमाणित होता है।
नीति ग्रन्थों में प्रमाण --
1. विदुर नीति_
(महाभारत, उद्योग पर्व 33/6)
“न सा सभा यत्र न सन्ति वृद्धा
न ते वृद्धा ये न वदन्ति धर्मम्।
न स धर्मो यत्र न सत्यमस्ति
न तत्सत्यं यच्छलेनाभ्युपेतम्॥”
भावार्थ:
जहाँ ज्ञानी (वृद्ध) नहीं, वह सभा नहीं; और जो धर्म नहीं बताते, वे वृद्ध नहीं। जहाँ सत्य नहीं, वहाँ धर्म नहीं।
यहाँ सत्य (ज्ञान) को ही जीवन का प्रकाश माना गया है।
2. विदुर नीति--
(महाभारत, उद्योग पर्व 34/17)
“ज्ञानं हि मनुष्याणां प्रकाशः परिकीर्तितः।”
भावार्थ:
ज्ञान मनुष्यों का प्रकाश कहा गया है।
यह सीधा प्रमाण है:
ज्ञान = प्रकाश
3. चाणक्य नीति (अध्याय 5, श्लोक 16)
“नास्ति विद्यासमं चक्षुः नास्ति सत्यसमं तपः।
नास्ति रागसमं दुःखं नास्ति त्यागसमं सुखम्॥”
भावार्थ:
विद्या के समान कोई नेत्र (प्रकाश) नहीं है।
यहाँ स्पष्ट:
विद्या (ज्ञान) = चक्षु (प्रकाश)
4. चाणक्य नीति (अध्याय-- 1, श्लोक-- 3)
“अविद्या जीवितं शून्यं...”
भावार्थ:
अज्ञान से जीवन शून्य (अंधकारमय) हो जाता है।
यहाँ:
अविद्या = अंधकार
विद्या = प्रकाश
5. हितोपदेश--
(मित्रलाभ, श्लोक 1)
“विद्या मित्रं प्रवासे…”
भावार्थ:
विद्या (ज्ञान) मनुष्य का सच्चा मित्र है।
ज्ञान ही मार्गदर्शन करता है—
जैसे प्रकाश मार्ग दिखाता है।
6. पंचतंत्र--
(सामान्यतः उद्धृत श्लोक)
“विद्या नाम नरस्य रूपमधिकं प्रच्छन्नगुप्तं धनम्।”
भावार्थ:
विद्या मनुष्य का श्रेष्ठ रूप और छिपा हुआ धन है।
ज्ञान ही जीवन को प्रकाशित करता है।
निष्कर्ष--
नीति ग्रंथ में यह सिद्ध होता है:
विद्या/ज्ञान = चक्षु / प्रकाश
अविद्या = अंधकार
ज्ञान जीवन को उसी प्रकार प्रकाशित करता है जैसे सूर्य की किरणें जगत को प्रकाशित करती हैं।
वाल्मीकि रामायण, अध्यात्म रामायण और गर्ग संहिता में प्रमाण--
1. रामायण (वाल्मीकि रामायण)
(क) युद्धकाण्ड – आदित्य हृदय स्तोत्र (अध्याय 105, श्लोक 1)
“ततो युद्धपरिश्रान्तं समरे चिन्तया स्थितम्।
रावणं चाग्रतो दृष्ट्वा युद्धाय समुपस्थितम्॥”
(प्रसंग प्रारम्भ)
(ख) वही – श्लोक 9–10
“सर्वदेवात्मको ह्येष तेजस्वी रश्मिभावनः।
एष देवासुरगणान् लोकान् पाति गभस्तिभिः॥”
भावार्थ:
यह सूर्य समस्त देवताओं का आत्मा है, अपनी किरणों (रश्मियों) से सभी लोकों का पालन करता है।
यहाँ स्पष्ट है--
रश्मि (किरणें) = प्रकाश फैलाने वाली शक्ति (ज्ञान का प्रतीक)
2. अध्यात्म रामायण-
अयोध्याकाण्ड 1.20 (प्रचलित पाठ)
“यथा प्रकाशयत्येको भानुः कृत्स्नं जगत्त्रयम्।
तथा प्रकाशको ब्रह्म…”
भावार्थ:
जैसे एक सूर्य सम्पूर्ण जगत को प्रकाशित करता है, वैसे ही ब्रह्म (ज्ञान) सबको प्रकाशित करता है।
स्पष्ट उपमा है।
सूर्य का प्रकाश = ब्रह्मज्ञान
3. गर्ग संहिता
महत्वपूर्ण:
गर्ग संहिता के विभिन्न संस्करणों में श्लोक संख्या बहुत भिन्न मिलती है। फिर भी एक प्रचलित प्रमाण:
गोलोक खण्ड (अध्याय 3, श्लोक 15 – प्रचलित पाठ)
“यथा सूर्यप्रकाशेन तमो नश्यति तत्क्षणात्।
तथा ज्ञानप्रकाशेन नश्यत्यज्ञानमात्मनः॥”
भावार्थ:
जैसे सूर्य के प्रकाश से अंधकार तुरंत नष्ट हो जाता है, वैसे ही ज्ञान के प्रकाश से अज्ञान नष्ट हो जाता है।
यहाँ प्रत्यक्ष सिद्धांत:
सूर्य का प्रकाश = ज्ञान का प्रतीक
निष्कर्ष--
तीनों ग्रंथों में स्पष्ट सिद्धांत मिलता है:
सूर्य = प्रकाश का स्रोत
प्रकाश = ज्ञान / ब्रह्म / चेतना
अंधकार = अज्ञान
इसलिए आपका मूल भाव—
“सूर्य की किरणें ज्ञान का प्रकाश फैलाती हैं”
इन ग्रंथों से प्रत्यक्ष एवं उपमान रूप में प्रमाणित होता है।
योग वशिष्ठ में प्रमाण-
1. वैराग्य प्रकरण
(सर्ग 3 – प्रचलित पाठ)
“अज्ञानतिमिरान्धस्य ज्ञानाञ्जनशलाकया।
चक्षुरुन्मील्यते यस्य तस्मै…”
भावार्थ:
जो अज्ञान रूपी अंधकार से अंधे मनुष्य की आँखें ज्ञानरूपी अंजन से खोलता है…
यहाँ: अज्ञान = तिमिर (अंधकार)
ज्ञान = प्रकाश (दृष्टि देने वाला)
2. उत्पत्ति प्रकरण
(सर्ग 55 – प्रचलित)
“यथा दीपप्रकाशेन नश्यत्यन्धं तमोऽखिलम्।
तथा ज्ञानप्रकाशेन नश्यत्यज्ञानमात्मनः॥”
भावार्थ:
जैसे दीपक के प्रकाश से अंधकार नष्ट हो जाता है, वैसे ही ज्ञान के प्रकाश से अज्ञान नष्ट होता है।
स्पष्ट सिद्धांत:
ज्ञान = प्रकाश
3. उत्पत्ति प्रकरण
(सर्ग 58 – प्रचलित)
“यथा भानुप्रकाशेन जगदेतत् प्रकाशते।
तथा ज्ञानप्रकाशेन बुद्धिः सर्वं प्रपश्यति॥”
भावार्थ:
जैसे सूर्य के प्रकाश से जगत प्रकाशित होता है, वैसे ही ज्ञान के प्रकाश से बुद्धि सब कुछ देखती है।
यह आपके भाव का सीधा प्रमाण है:
सूर्य का प्रकाश = ज्ञान का प्रतीक
4. निर्वाण प्रकरण
(पूर्वार्ध – प्रचलित)
“ज्ञानदीपप्रकाशेन नश्यत्यज्ञानसंचयः।”
भावार्थ:
ज्ञान रूपी दीपक के प्रकाश से अज्ञान का संचय नष्ट हो जाता है।
यहाँ: ज्ञान = दीप / प्रकाश
योग वशिष्ठ में बार-बार यह सिद्ध किया गया है:
ज्ञान (ब्रह्मज्ञान) = प्रकाश (दीप, सूर्य, ज्योति)
अज्ञान = तिमिर (अंधकार)
ज्ञान का उदय = अज्ञान का पूर्ण नाश
निष्कर्ष--
मन्त्र के अनुसार “सूर्य की किरणें ज्ञान का प्रकाश फैलाती हैं”
का योग वशिष्ठ में प्रत्यक्ष समर्थन मिलता है।
इस्लामिक धर्मग्रन्थो में प्रमाण --
मन्त्र का भाव—“सूर्य की किरणें ज्ञान का प्रकाश फैलाती हैं”—का समर्थन क़ुरआन तथा इस्लामी शिक्षाओं में भी मिलता है। यहाँ “नूर (प्रकाश)” को हिदायत (मार्गदर्शन), ज्ञान और सत्य का प्रतीक माना गया है।
1. क़ुरआन (सूरह अन-नूर 24:35)
“اللَّهُ نُورُ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ…”
भावार्थ:
अल्लाह आकाशों और धरती का नूर (प्रकाश) है।
यहाँ “नूर” का अर्थ केवल रोशनी नहीं, बल्कि
ज्ञान, मार्गदर्शन और सत्य है।
2. क़ुरआन (सूरह यूनुस 10:5)
“هُوَ الَّذِي جَعَلَ الشَّمْسَ ضِيَاءً وَالْقَمَرَ نُورًا…”
भावार्थ:
वही है जिसने सूर्य को तेज (प्रकाश) और चाँद को नूर बनाया।
सूर्य का “ضياء” (तेज) =
स्पष्ट प्रकाश, जो देखने और समझने में मदद करता है
(ज्ञान के प्रतीक के रूप में समझा जाता है)
3. क़ुरआन (सूरह इब्राहीम 14:1)
“لِتُخْرِجَ النَّاسَ مِنَ الظُّلُمَاتِ إِلَى النُّورِ…”
भावार्थ:
यह किताब इसलिए है ताकि लोगों को अंधकार से निकालकर प्रकाश की ओर ले जाया जाए।
यहाँ:
अंधकार = अज्ञान, गुमराही
प्रकाश = ज्ञान, सत्य, मार्गदर्शन
4. क़ुरआन (सूरह अल-बक़रह 2:257)
“اللَّهُ وَلِيُّ الَّذِينَ آمَنُوا يُخْرِجُهُمْ مِنَ الظُّلُمَاتِ إِلَى النُّورِ…”
भावार्थ:
अल्लाह ईमान वालों को अंधकार से निकालकर प्रकाश की ओर ले जाता है।
यहाँ भी “नूर” = ज्ञान और सही मार्ग।
5. इस्लामी विचार (सार)
इस्लामी शिक्षाओं में बार-बार यह बताया गया है:
नूर (प्रकाश) = हिदायत, ज्ञान, सत्य
ज़ुल्मात (अंधकार) = अज्ञान, भ्रम
सूर्य का प्रकाश = स्पष्टता और समझ का प्रतीक
निष्कर्ष
क़ुरआन में यह सिद्ध होता है कि:
प्रकाश (नूर) केवल भौतिक नहीं, बल्कि आध्यात्मिक ज्ञान और मार्गदर्शन है।
अंधकार = अज्ञान और भटकाव
प्रकाश = सत्य और सही रास्ता
इस प्रकार यह भाव कि
“सूर्य की किरणें ज्ञान का प्रकाश फैलाती हैं” —
इस्लामी दृष्टिकोण से भी प्रतीकात्मक रूप में पूर्णतः समर्थित है।
सिक्ख धर्म में प्रमाण--
मंत्र का भाव—“सूर्य की किरणें ज्ञान का प्रकाश फैलाती हैं”—का समर्थन गुरु ग्रंथ साहिब में भी अत्यंत सुंदर रूप में मिलता है।
सिक्ख धर्म में प्रमाण--
सिख धर्म में “ਜੋਤਿ (ज्योति)” और “ਨੂਰ (नूर)” को ज्ञान, सत्य और परमात्मा की चेतना का प्रतीक माना गया है।
1. एक ही ज्योति का सिद्धांत
“ਸਭ ਮਹਿ ਜੋਤਿ ਜੋਤਿ ਹੈ ਸੋਇ ॥
ਤਿਸ ਦਾ ਚਾਨਣੁ ਸਭ ਮਹਿ ਚਾਨਣੁ ਹੋਇ ॥”
भावार्थ:
सबमें एक ही ज्योति (प्रकाश) है, और उसी का प्रकाश सबमें फैल रहा है।
यहाँ “ਚਾਨਣੁ (प्रकाश)” =
ज्ञान और चेतना का प्रसार।
2. अज्ञान से ज्ञान की ओर
“ਗੁਰ ਗਿਆਨੁ ਦੀਪਕੁ ਤਿਨਿ ਜਲਾਇਆ ॥
ਅੰਧਕਾਰੁ ਗਇਆ ਪਰਗਟੁ ਹੋਇਆ"
भावार्थ:
गुरु ने ज्ञान का दीपक जलाया, जिससे अंधकार दूर हो गया और प्रकाश प्रकट हो गया।
यहाँ: ਅੰਧਕਾਰ (अंधकार) = अज्ञान
ਦੀਪਕ (दीपक/प्रकाश) = ज्ञान
3. नूर (प्रकाश) का सिद्धांत--
“ਨੂਰੁ ਤੇ ਸਭੁ ਜਗੁ ਉਪਜਿਆ
ਕਉਨ ਭਲੇ ਕੋ ਮੰਦੇ ॥”
भावार्थ:
एक ही नूर (प्रकाश) से सारा संसार उत्पन्न हुआ है।
“ਨੂਰ” =
दिव्य प्रकाश / ज्ञान / चेतना
4. परम प्रकाश (सत्य)
“ਸਤਿਗੁਰੁ ਮਿਲਿਐ ਚਾਨਣੁ ਹੋਆ
ਹਉਮੈ ਅੰਧੇਰਾ ਜਾਇ ॥”
भावार्थ:
सतगुरु से मिलने पर प्रकाश (ज्ञान) उत्पन्न होता है और अहंकार का अंधकार दूर हो जाता है।
यह स्पष्ट करता है:
ज्ञान का प्रकाश = अज्ञान का नाश
निष्कर्ष--
गुरु ग्रंथ साहिब में यह सिद्ध किया गया है कि:
ਜੋਤਿ / ਨੂਰ / ਚਾਨਣ = ज्ञान, सत्य और परम चेतना
ਅੰਧਕਾਰ = अज्ञान और अहंकार
प्रकाश का फैलना = ज्ञान का प्रसार
इस प्रकार मन्त्र का भाव—
“सूर्य की किरणें ज्ञान का प्रकाश फैलाती हैं” —
सिख धर्म के सिद्धांतों से भी पूर्णतः प्रमाणित होता है।
बाइबिल में प्रमाण--
ईसाई धर्म में “Light (प्रकाश)” को Truth (सत्य), Wisdom (ज्ञान), और Divine Guidance (ईश्वरीय मार्गदर्शन) का प्रतीक माना गया है।
1. God is Light
“God is light; in Him there is no darkness at all.”
(1 John 1:5)
भावार्थ:
ईश्वर स्वयं प्रकाश है, उसमें कोई अंधकार नहीं।
यहाँ “Light” =
पूर्ण ज्ञान और सत्य।
2. Light of the World
“I am the light of the world. Whoever follows me will not walk in darkness, but will have the light of life.”
(John 8:12)
भावार्थ:
जो मेरे मार्ग पर चलता है, वह अंधकार में नहीं रहेगा, बल्कि जीवन का प्रकाश पाएगा।
यहाँ: Darkness = अज्ञान
Light = ज्ञान और सही मार्ग
3. From Darkness to Light
“To open their eyes and turn them from darkness to light.”
(Acts 26:18)
भावार्थ:
लोगों को अंधकार से प्रकाश की ओर लाना।
स्पष्ट संकेत:
अज्ञान से ज्ञान की ओर यात्रा।
4. The True Light
“The true light that gives light to everyone was coming into the world.”
(John 1:9)
भावार्थ:
सच्चा प्रकाश, जो हर व्यक्ति को प्रकाश देता है, संसार में आया।
“True Light” =
सर्वव्यापक ज्ञान और सत्य।
5. Let Your Light Shine
“Let your light shine before others…”
(Matthew 5:16)
भावार्थ:
अपना प्रकाश दूसरों के सामने चमकने दो।
यहाँ “Light” =
ज्ञान, सद्गुण और सही आचरण।
निष्कर्ष-
बाइबल में यह सिद्ध किया गया है कि:Light (प्रकाश) = ज्ञान, सत्य और ईश्वरीय मार्गदर्शन
Darkness (अंधकार) = अज्ञान और भ्रम प्रकाश का फैलना = ज्ञान और सत्य का प्रसार
इस प्रकार मन्त्र- का भाव—
“सूर्य की किरणें ज्ञान का प्रकाश फैलाती हैं” —
ईसाई धर्म की शिक्षाओं से भी प्रतीकात्मक रूप से प्रमाणित है।
जैन धर्म में प्रमाण --
मन्त्र का भाव—“सूर्य की किरणें ज्ञान का प्रकाश फैलाती हैं”—का समर्थन जैन धर्म के ग्रंथों में भी मिलता है। जैन दर्शन में “ज्ञान (ञाण)” को ही अज्ञान (अविज्जा/अंधकार) को दूर करने वाला “प्रकाश” कहा गया है।
नीचे प्राकृत (देवनागरी लिपि) के साथ प्रमाण (भावार्थ सहित) प्रस्तुत हैं:
1. ज्ञान का प्रकाश
“णाणं तु णयरं लोए, णाणेण विणा अंधं।”
भावार्थ:
ज्ञान संसार में नेत्र के समान है; ज्ञान के बिना सब अंधकार है।
यहाँ:
णाण (ज्ञान) = प्रकाश
अंधं = अज्ञान (अंधकार)
2. सम्यक ज्ञान की महिमा
“सम्यग्णाणेण विणा णत्थि मुक्खो।”
भावार्थ:
सम्यक ज्ञान के बिना मोक्ष नहीं है।
यह दर्शाता है कि:
ज्ञान ही जीवन का मार्ग प्रकाशित करता है।
3. अज्ञान का अंधकार--
“अविज्जा अंधकारो, णाणं तु पभा।”
भावार्थ:
अज्ञान अंधकार है और ज्ञान प्रकाश है।
यह सीधे सिद्ध करता है:
प्रकाश = ज्ञान।
4. आत्मज्ञान का प्रकाश--
“णाणस्स प्रकाशेण पव्वयं लोयं पयासइ।”
भावार्थ:
ज्ञान के प्रकाश से समस्त लोक प्रकाशित होता है।
जैसे सूर्य की किरणें जगत को प्रकाशित करती हैं, वैसे ही
ज्ञान सबको प्रकाशित करता है।
5. जैन सिद्धांत (सार)
जैन दर्शन में बार-बार यह बताया गया है:
णाण (ज्ञान) = प्रकाश (पभा/ज्योति)
अविज्जा (अज्ञान) = अंधकार
ज्ञान का उदय = आत्मा का जागरण।
निष्कर्ष--
जैन धर्म में यह सिद्ध किया गया है कि: ज्ञान ही वास्तविक प्रकाश है।अज्ञान अंधकार के समान है
ज्ञान का फैलना = प्रकाश का फैलना (सूर्य की किरणों की तरह)
इस प्रकार मन्त्र का भाव—
“सूर्य की किरणें ज्ञान का प्रकाश फैलाती हैं” —
जैन धर्म के सिद्धांतों से पूर्णतय:
प्रमाणित है।
बौद्ध धर्म में प्रमाण --
मन्त्र का भाव—“सूर्य की किरणें ज्ञान का प्रकाश फैलाती हैं” इसका समर्थन बौद्ध धर्म के ग्रंथों में भी स्पष्ट रूप से मिलता है। बौद्ध धर्म में “पञ्ञा (प्रज्ञा/ज्ञान)” को ही अविज्जा (अज्ञान) रूपी अंधकार को दूर करने वाला “प्रकाश” कहा गया है।
नीचे पाली (देवनागरी लिपि) के साथ प्रमाण प्रस्तुत हैं:
1. धम्मपद (Dhammapada)
“पञ्ञा लोके पभासति।”
भावार्थ:
प्रज्ञा (ज्ञान) संसार में प्रकाश फैलाती है।
यहाँ: पञ्ञा (ज्ञान) = प्रकाश (पभा) जैसे सूर्य की किरणें जगत को प्रकाशित करती हैं, वैसे ही ज्ञान जीवन को प्रकाशित करता है।
2. अज्ञान और ज्ञान
“अविज्जा परमं मलं, पञ्ञा परमं आलोकं।”
भावार्थ:
अज्ञान सबसे बड़ा अंधकार (मल) है, और प्रज्ञा सर्वोत्तम प्रकाश है।
स्पष्ट सिद्धांत:
अंधकार = अज्ञान
प्रकाश = ज्ञान
3. आत्मदीप (बुद्ध का उपदेश)
“अत्तदीपा विहरथ, अत्तसरणा अनञ्ञसरणा।”
भावार्थ:
अपने भीतर दीपक (प्रकाश) बनो, अपने ही आश्रय बनो।
“दीप” =
ज्ञान और जागरूकता का प्रकाश
4. ज्ञान से मार्ग प्रकाश
“पञ्ञाय पथो विहितो।”
भावार्थ:
ज्ञान (प्रज्ञा) से ही मार्ग प्रकाशित होता है।
जैसे सूर्य मार्ग दिखाता है, वैसे ही
ज्ञान जीवन का मार्ग दिखाता है।
5. बौद्ध सिद्धांत (सार)
बौद्ध धर्म में बार-बार यह बताया गया है:
पञ्ञा (प्रज्ञा) = प्रकाश (आलोक)
अविज्जा (अज्ञान) = अंधकार
ज्ञान का उदय = दुःख से मुक्ति का मार्ग
निष्कर्ष--
बौद्ध धर्म में यह सिद्ध किया गया है कि: ज्ञान ही वास्तविक प्रकाश है अज्ञान अंधकार के समान है
प्रकाश का फैलना = ज्ञान का फैलना (सूर्य की किरणों के समान)
इस प्रकार मन्त्र का भाव—
“सूर्य की किरणें ज्ञान का प्रकाश फैलाती हैं” —
बौद्ध धर्म के सिद्धांतों से भी पूर्णतः प्रमाणित होता है।
यहूदी धर्म में प्रमाण --
मन्त्र का भाव—“सूर्य की किरणें ज्ञान का प्रकाश फैलाती हैं” इसका समर्थन तनख (Tanakh / Hebrew Bible) में भी स्पष्ट रूप से मिलता है। यहूदी परंपरा में “Light (Or)” को Wisdom (ज्ञान), Truth (सत्य) और Divine Guidance (ईश्वरीय मार्गदर्शन) का प्रतीक माना गया है।
1. Creation of Light
“Let there be light: and there was light.”
(Genesis 1:3)
भावार्थ:
ईश्वर ने कहा—प्रकाश हो जाए, और प्रकाश हो गया।
यहाँ “Light” =
सृष्टि का प्रथम ज्ञान/व्यवस्था (Order & Awareness)।
2. God as Light
“The Lord is my light and my salvation.”
(Psalm 27:1)
भावार्थ:
प्रभु मेरा प्रकाश और उद्धार है।
“Light” =
मार्गदर्शन और ज्ञान।
3. Light as Guidance
“For the commandment is a lamp; and the law is light.”
(Proverbs 6:23)
भावार्थ:
आज्ञा दीपक है और धर्म (कानून) प्रकाश है।
यहाँ स्पष्ट है:
धर्म और ज्ञान = प्रकाश।
4. Path of the Righteous
“The path of the righteous is like the morning sun, shining ever brighter till the full light of day.”
(Proverbs 4:18)
भावार्थ:
धर्मात्माओं का मार्ग उगते सूर्य के समान है, जो धीरे-धीरे पूर्ण प्रकाश में बदलता है।
सूर्य का प्रकाश =
ज्ञान और सही मार्ग का विकास।
5. Light over Darkness
“The light shines in the darkness, and the darkness has not overcome it.”
((cf. theme across Hebrew thought; also echoed in later texts))
भावार्थ:
प्रकाश अंधकार में चमकता है और अंधकार उसे जीत नहीं सकता।
यहाँ: Darkness = अज्ञान / भ्रम
Light = ज्ञान / सत्य
निष्कर्ष--
तनख में यह सिद्ध किया गया है कि:Light (प्रकाश) = ज्ञान, सत्य और ईश्वरीय मार्गदर्शन
Darkness (अंधकार) = अज्ञान और भ्रम सूर्य/प्रकाश का बढ़ना = ज्ञान और धर्म का विकास
इस प्रकार मन्त्र का भाव—
“सूर्य की किरणें ज्ञान का प्रकाश फैलाती हैं” —
यहूदी धर्म की शिक्षाओं से भी प्रतीकात्मक रूप में पूर्णतः प्रमाणित होता है।
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Vrishali Gotkhindikar
*राम म्हणजे काय ?* उगीचच झोपतो त्याला *आ राम* म्हणतात. झोपलेला परत कधी उठतच नाही त्याला *हे राम* म्हणतात. मित्रा सारखा वागतो म्हणून *सखा राम* म्हणतात. जो राजालाही आदर्श होऊन राहतो त्याला *राजा राम* म्हणतात. हृदयीचे जाणतो म्हणून त्याला *आत्मा राम* म्हणतात. एक पत्नी व्रताप्रमाणे वागतो त्याला *सीता राम* म्हणतात. भगवंत ज्यांचे पाय पूजितो त्यांना *तुका राम* म्हणतात. प्रसंगी हाती शस्त्र वा शास्त्र धरुन अन्यायाशी लढतो त्याला *परशु राम* म्हणतात. जो अखंडपणे भगवंताचा दास होऊन रहातो त्याला *राम दास* म्हणतात. हल्लिच्या युगात जो पहाटे उठवतो त्याला *आला राम* म्हणतात. जो सेवाव्रताने वागतो त्याला *सेवा राम* म्हणतात. जो प्रसादाचा गोड मेवा बनवतो त्याला *मेवा राम* म्हणतात. आणी हे ज्यांना कळलं.. त्यांच्यासाठी *"राम राम"* म्हणतात. *हे वाचणारा सोळा वेळा राम म्हणाला* *मोजलेत ना? आता एकूण वीस वेळा राम राम झाले.* *चला,एकवीस वेळ रामनाम तर घडले.*. *🙏जय श्री राम
।।श्री राम जय राम जय जय राम।।
બદનામ રાજા
હંમેશા પાછળ રહ્યો હું,
તારા સુધી પહોંચવાની દોડમાં...
🌸
RM
તમારા જીવનમાંથી "અફસોસ" શબ્દ કાઢી નાખો, કારણ કે ..
તે તમને ઘણું બધું કરવાથી રોકે છે...
sanvi
A sketch drawn by me. 💗🌷💫
Vishakha Mothiya
Reflections live વેબસાઈટ પર પ્રકાશિત થયેલ મારો માહિતીસભર લેખ...
*પરોપકારી પારસી*
જાણીશું એક એવા સમુદાયના લોકો વિશે જેનો સ્વભાવ,ભાષા,સેન્સ ઑફ હ્યુમર લોકોને ટદ્દન સકારાત્મક રીતે પ્રભાવિટ કરે છે. રિયલ લાઈફ હોય કે ટીવીમાં આ લોકોને આપણે ક્યારેય ઉદાસ નથી જોયા. Smile અને positivity જાણે આ લોકોની રગેરગમાં વસે છે. દૂધમાં સાકર ભળી જાય એમ આપણા દેશમાં ભળી ગયા અને ભારતના વિકાસમાં નોંધપાત્ર યોગદાન આપ્યું. તો ચાલો જાણીએ,પરોપકારી પારસી વિશે; સાથે જાણીશું તેનો ઇતિહાસ, રિવાજો તેમજ વિશેષ બાબતો વિશે.
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softrebel
बेटियां
होठों की हँसी, चेहरे की किलकारियाँ,
आँगन में बन के चहचहाए वो चिड़िया।
नटखट नदियों-सी,सुगंधित फूलों की क्यारियां,
अपने संस्कारों से पैरों को पखारती है,
बस ऐसी होती है बिटिया
कलेजे का टुकड़ा आँखों की पुतलियाँ।
माथे पे आँचल, हाथों में मेहंदी रची,
हल्दी के रंग में आज रंगी है वो गुड़िया।
लोरियों में पली, सपनों में ढली,
आज किसी और के घर की है वो धूपिया।
होठों की हँसी, चेहरे की किलकारियाँ,
आँगन में बन के चहचहाए वो चिड़िया।
नटखट नदियों-सी,सुगंधित फूलों की क्यारियां,
अपने संस्कारों से पैरों को पखारती है,
बस ऐसी होती है बिटिया
कलेजे का टुकड़ा आँखों की पुतलियाँ।
माँ की दुआ बन हर साँस में बहती है,
पापा की उम्मीद पलकों में चमकती है।
भाई-बहन, सखियों की हँसी साथ लिए,
हर रिश्ते में वो अपनी खुशबू बिखेरती है।
होठों की हँसी, चेहरे की किलकारियाँ,
आँगन में बन के चहचहाए वो चिड़िया।
नटखट नदियों-सी,सुगंधित फूलों की क्यारियां,
अपने संस्कारों से पैरों को पखारती है,
बस ऐसी होती है बिटिया
कलेजे का टुकड़ा आँखों की पुतलियाँ।
वो जा तो रही है, पर दूर नहीं हो रही ,
दो घरों की रौशनी बन दो आँगनों में चमक रही है।
एक घर की धड़कन, दूजे की सुबह,
हर दिल के आसमान में अपनी जगह लालिमा सी बिखेर रही है।
होगा ये घर कल उदास,
पर आज इस घर के हर कोने में अंजोरिया सी पसर रही है।
होठों की हँसी, चेहरे की किलकारियाँ,
आँगन में बन के चहचहाए वो चिड़िया।
नटखट नदियों-सी,सुगंधित फूलों की क्यारियां,
अपने संस्कारों से पैरों को पखारती है,
बस ऐसी होती है बिटिया
कलेजे का टुकड़ा आँखों की पुतलियाँ।
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बेटियां
होठों की हँसी, चेहरे की किलकारियाँ,
आँगन में बन के चहचहाए वो चिड़िया।
नटखट नदियों-सी,सुगंधित फूलों की क्यारियां,
अपने संस्कारों से पैरों को पखारती है,
बस ऐसी होती है बिटिया
कलेजे का टुकड़ा आँखों की पुतलियाँ।
माथे पे आँचल, हाथों में मेहंदी रची,
हल्दी के रंग में आज रंगी है वो गुड़िया।
लोरियों में पली, सपनों में ढली,
आज किसी और के घर की है वो धूपिया।
होठों की हँसी, चेहरे की किलकारियाँ,
आँगन में बन के चहचहाए वो चिड़िया।
नटखट नदियों-सी,सुगंधित फूलों की क्यारियां,
अपने संस्कारों से पैरों को पखारती है,
बस ऐसी होती है बिटिया
कलेजे का टुकड़ा आँखों की पुतलियाँ।
माँ की दुआ बन हर साँस में बहती है,
पापा की उम्मीद पलकों में चमकती है।
भाई-बहन, सखियों की हँसी साथ लिए,
हर रिश्ते में वो अपनी खुशबू बिखेरती है।
होठों की हँसी, चेहरे की किलकारियाँ,
आँगन में बन के चहचहाए वो चिड़िया।
नटखट नदियों-सी,सुगंधित फूलों की क्यारियां,
अपने संस्कारों से पैरों को पखारती है,
बस ऐसी होती है बिटिया
कलेजे का टुकड़ा आँखों की पुतलियाँ।
वो जा तो रही है, पर दूर नहीं हो रही ,
दो घरों की रौशनी बन दो आँगनों में चमक रही है।
एक घर की धड़कन, दूजे की सुबह,
हर दिल के आसमान में अपनी जगह लालिमा सी बिखेर रही है।
होगा ये घर कल उदास,
पर आज इस घर के हर कोने में अंजोरिया सी पसर रही है।
होठों की हँसी, चेहरे की किलकारियाँ,
आँगन में बन के चहचहाए वो चिड़िया।
नटखट नदियों-सी,सुगंधित फूलों की क्यारियां,
अपने संस्कारों से पैरों को पखारती है,
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mohansharma
तू निशाना तो लगा हम कहाँ जा पाएंगे ..
हम तो आशिक हैँ ख़ुद निशाने पे आ जाएंगे..
Piyu soul
💫हमारी दोस्ती का रिश्ता 💫
रास्ते अलग थे, मंज़िलें भी जुदा थीं,
पर चार दिलों ने एक साथ धड़कना सीख लिया।
दोस्ती में हँसी थी, प्यार में सुकून था,
हम चारों ने हर लम्हे को अपना जुनून बना लिया।
कभी बातों में खोए, कभी खामोशी में समझ गए,
बिना कहे ही एक-दूसरे के जज़्बात पढ़ गए।
दो हाथ थामे थे, दो दिल जुड़े हुए थे,
पर दोस्ती ने हमें एक ही धागे में पिरो दिए थे।
जब एक गिरा, तो चारों ने संभाला,
जब कोई हंसा, तो सबका दिल खिल उठा।
ये रिश्ता सिर्फ़ दोस्ती नहीं, एक दुनिया है,
जहाँ प्यार भी है, और अपनापन भी बेमिसाल है। 💛
piyu 7soul
kattupaya s
Goodnight friends.. sleep well
Kiran
तारीफों में अब वो बात नहीं लगती,
हर “प्यारे” शब्द में कोई राज़ लगता है।
satish vishe
“मन जेव्हा खूप अस्वस्थ होतं…”
मन जेव्हा खूप अस्वस्थ होतं,
तुझ्या सहवासाची आस लागते,
गर्दीत असूनही कुठेतरी
तुझीच कमी सतत जाणवते…
शब्द हजार असतात ओठांवर,
पण तुला सांगायला धडधडते,
कारण तुझ्या एका उत्तरावरच
माझं सगळं जग ठरतं…
कधी तुझं एक “काय झालं?”
मनाला औषधासारखं वाटतं,
आणि कधी तुझंच मौन
हळूहळू मन तोडतं…
रात्रभर जागत राहतं मन,
तुझ्या आठवणींशी बोलतं,
तू जवळ नसतानाही
तुझ्याच छायेत हरवतं…
कधी वाटतं, समजून घेशील तू,
या न बोललेल्या भावना साऱ्या,
पण तुझ्या त्या शांततेतच
हरवतात माझ्या आशेच्या किनाऱ्या…
मन अजूनही तुझीच वाट पाहतं,
थोडा वेळ, थोडं लक्ष मागतं,
कारण प्रेम म्हणजे फक्त शब्द नाही,
ते वेळेतूनच खऱ्या अर्थाने दिसतं…
Kiran
प्यार, तू ज़िंदा है अभी भी
मैं ये जानकर हैरान हूँ।
Nilesh Rajput
She loved poetry,
so I wrote for her.
She loved stories,
so I made stories for her.
She loved someone else,
and I........💔
Kiran
रात के तारे यूँ टिमटिमाते हैं,
जैसे खामोशी से समझाते हैं—
ज़्यादा घमंड मत कर इंसान,
आख़िर लौटकर यहीं आना है।
Piyu soul
💫हमसफ़र सा एहसास💫
हर मोड़ पे चाहे भीड़ हो या तन्हाई,
दिल की बातें कह दे जो — वही सच्ची साथ निभाई।
राहें बदल जाएँ, चेहरे बदल जाएँ,
पर जो दिल को छू जाए — वही याद रह जाए। 💫
piyu 7soul ❤️
Imaran
तेरी याद का एहसास मेरे दिल से लगाव बढ़ाता है,
तेरा साथ मिले तो जुदाई भी प्यार बन जाता है
💛🩵imran 💛🩵
Thakor Pushpaben Sorabji
હતી એ વાડ
શાંત હતા પંખીઓના એ ટહુકા
શોધતા હતા મારગ એ પ્રાણીડા
હતી જે છાયા એ છીનવાઈ ગઈ!....
શાંત હતા....................
હતા એ આવળ બાવળ લીમડાના એ ઝાડવા
હતા એ સૌને કાપી કરાયા દૂર સૌને
હતા જેના આશરે પ્રાણીડા જોતા રહ્યા એ સૌ!..
શાંત હતા....................
શાંત લાગ્યા મુજને લહેરાતા ખેતરો
લાગ્યા નિશાસા નાંખતાં એ પ્રાણીડા સૌ
કેમ કે આશરો હતો જેનો એ છીનવાઇ ગયો!...
શાંત હતા.....................
નીકળી ગઈ ઝાડવાની વાડને થઈ ગઈ ફેન્સી વાડ
શોધતા હતા મારગ એ પ્રાણીડા બધા
સાંભળી સૂના ખેતરે જાણે તેમની એ વાચા !.....
શાંત હતા.........................
જય શ્રી કૃષ્ણ:પુષ્પા એસ ઠાકોર"પુષ્પ"
उषा जरवाल
आज हमने अपने विद्यालय का प्रथम एवं सफल शैक्षणिक सत्र पूर्ण किया। यह सत्र सफलतापूर्वक पूर्ण करना केवल एक उपलब्धि नहीं है बल्कि माननीय पदासीन अधिकारियों द्वारा दिया गया उचित मार्गदर्शन, परिश्रम, अथक प्रयास एवं सामुदायिक सहयोग का परिणाम है। इस कार्यकाल के दौरान हमने अनेक त्रुटियाँ कीं, अनेक चुनौतियों का सामना किया और प्रत्येक कठिनाई को एक अवसर में रूपांतरित कर दिया।
इस सत्र ने हमें अनुभूति कराई कि सकारात्मक दृष्टिकोण रखते हुए अपने अथक परिश्रम, आपसी सहयोग एवं अनवरत प्रयास से हम सफलता के नए आयाम स्थापित करने के लिए सक्षम हैं ।
हमें विश्वास है कि इसी समर्पण एवं एकजुटता के साथ हम आगामी सत्रों में और अधिक उत्कृष्ट उपलब्धियाँ अर्जित करेंगे।
विद्यालय परिवार के प्रत्येक सदस्य का योगदान इस सफलता की आधारशिला रहा है, जिसके लिए हम हृदय से कृतज्ञ हैं।
आइए, इसी उत्साह, अनुशासन एवं दृढ़ संकल्प के साथ हम भविष्य की ओर अग्रसर हों और शिक्षा के पथ पर निरंतर प्रगति के नवीन इतिहास रचने के लिए तत्पर हों ।
Chaitanya Joshi
પ્રતીક્ષાની પરાકાષ્ઠાએ શબરીને રામ મળ્યા હશે.
આગમન રામનું નિહાળી ગુરુના આશિષ ફળ્યા હશે.
હરખઘેલી થઈને એ નારી રામ દર્શને પુલકિત થઈ,
દર્ભાસન બિછાવી રામ લક્ષ્મણ ને બેસાડ્યા એણે,
ને નયન અશ્રુ થકી ચરણો રામના એણે ધોયાં હશે .
ફળી સાધના એક ભીલ નારીની રામના આગમન થકી,
કૌશલ્યા બનીને એંઠા બોર એણે ખવડાવ્યા હશે.
શબરી કરતાંય વિશેષ રાજી રામ જોવામાં આવ્યા,
વનવગડે શ્રીરામને આજે કૌશલ્યા માં સાંભર્યા હશે.
નવધા ભક્તિના ઉપદેશે સ્તુતિ શબરી તણી કરી,
શબરીને વિદાય આપી સુગ્રીવ ભણી ગમન કર્યા હશે.
-ચૈતન્ય જોષી . દીપક ,પોરબંદર.
Preet
koi bar hm bhut dukhi hote hai
per cha kr bhi kisi ke sath share nhi kr pate
because ek dar iska kya result hoga
isliye khud jhelna better lgta hai
- Preet
Shefali
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Nayana Viradiya
"ઉનાળાની બપોર "
ઉનાળાની બપોરે તડકો ધોમધખતો ત્રાટકે,
ધરતીના હૃદયમાં બળબળતો અગ્નિ ખટકે.
પવન પણ થાકીને શાંત બનીને બેઠો,
છાંયો શોધતો માનવ રસ્તા પર પેઠો.
વૃક્ષોની છાયા નીચે જીવન થોડુંક હસતું,
પંખીઓના કલરવ સાંભળી લાગે કોઈ વસતું.
નદીના પાણીમાં પણ ગરમી ભળે છે.
સૂરજની જ્વાળા બધે પોતાનું રાજ કરે છે.
શેરી ગલીઓ સુમસામ થઈ છે.
પંખીઓ છાંયડે ઓથે બેસી મૌન ટહુકા કરે છે.
ગામને પાદર ઝાડની છાયામાં ગૌધન આરામ કરે છે.
ઉનાળાની બપોરે માનવ મહેરામણ ટળે છે.
શહેરના ચક્કાજામ રસ્તાઓ પણ નીરવ શાંતિ ભરે છે.
લોકો જલ્દીમાં ઘરની ભણી પગલાં ભરે છે.
બપોર ઢળીને ઠંડી સાંજ માટે આશાભરી આંખો ધરે છે.
ધરતી તપે ને કંચન વરસે એ કાજે આ ગરમી ઉપેક્ષા સહે છે.
લોકજીવનમાં સહનશીલતા ના પાઠ શીખવવા તે ઉનાળો પોતે પણ તપે છે.
Nayana Viradiya
" ખોવાયેલો ખજાનો" પ્રેરકવાર્તા
- નયના વિરડીયા ✍️
બહુ સમય પહેલાની વાત છે. અરબ સાગરના કિનારે એક નાનકડું મછવારાઓનું ગામ હતું આ ગામમાં “વીર” નામનો છોકરો રહેતો હતો. ગામના લોકો દરિયાને માત્ર રોજી-રોટી માટે જોતાં, પણ વીર માટે દરિયો એક રહસ્ય હતો. એને હંમેશા જ લાગતું કે દરિયાની અંદર કંઈક એવું છુપાયેલું છે જે તેની જિંદગી બદલી દેશે.
એક દિવસ દરિયા કિનારે એને એક જૂનો નકશો મળ્યો. કાગળ પીળો પડી ગયો હતો અને તેના પર એક “X” નું નિશાન હતું. વીરને તરત જ વિચાર આવ્યો કે નક્કી આ કોઈ મોટા ખજાના સુધી પહોંચવા માટે નો નકશો જ છે.આવો મોકો મળે અને કોઈ ચુપચાપ બેસી રહે એવું ક્યારેય થયું છે?
વીરે તરત જ નક્કી કરી લીધું કે તે ખજાનો શોધીને જ રહેશે.
તે નાની હોડી લઈને દરિયામાં નીકળી પડ્યો. દિવસો સુધી તે તરતો રહ્યો. ભૂખ, તરસ અને ભય… બધું સહન કરતો ગયો. આખરે તે નકશામાં દર્શાવેલા ટાપુએ પહોંચી ગયો.
ટાપુ શાંત હતો, બહુ જ શાંત. જાણે ત્યાં કોઈ વર્ષોથી આવ્યું જ ન હોય.
વીરે “X” ની જગ્યા ખોદવાની શરૂઆત કરી. થોડા સમય પછી, તેને લાકડાનું એક બોક્સ મળ્યું. બોક્સ જોતા જ તેનું હૃદય જોરદાર ધડકવા લાગ્યું “હવે તો હું દુનિયા નો સૌથી ધનિક માણસ બની જઈશ,” અનેક સપનાઓએ પાંખો ફફડાવી આલીશાન ઘર બનાવીશ,હાથી, ઘોડા,નોકર,ચાકર ની સેના ઘરના આંગણામાં ઉભી હશે અને શાહી ઠાઠ થી પોતે એ મહેલ જેવા ઘરમાં રહેશે. વિચારોના વરસાદ સાથે તેણે બોક્સ ખોલ્યું.
પણ અંદર શું હતું?
સોનાં-ચાંદી નહીં…
રૂપિયા પૈસા પણ નહિ...
જય,ઝવેરાત કે મિલ્કતો નો ઉલ્લેખપત્ર પણ નહિ...
પણ એક જૂનું દર્પણ.
વીર ગુસ્સે ભરાઈ ગયો. “આ શું મજાક છે?” એ ચીસો પાડવા લાગ્યો વેરાન ટાપુ માં તેની ચીસો શાંત બની વિખેરાય ગઈ
પણ જ્યારે તેણે દર્પણમાં પોતાનો ચહેરો જોયો, ત્યારે તેને સમજાયું કે તે પહેલાં જેવો રહ્યો જ નથી. એની આંખોમાં હવે ભય નહોતો, પરંતુ આત્મવિશ્વાસ હતો. એની અંદર એક નવી શક્તિ જન્મી હતી. દરિયો ખેડવાનો અનુભવ હતો.
ત્યારે જ તેને સમજાયું…
ખજાનો સોનામાં નહોતો, ખજાનો તો એની અંદર હતો.
Raj Phulware
IshqKeAlfaaz
मी अचानक मेलो तर...
mamta
hamari samasya bhi is surya ki tarah hai aati bhi hai or chali bhi jati hai
isli jindagi choti hai samasya bahut hai use par karke haste rahiye😀🌄🤗
- mamta
બદનામ રાજા
लंबे सफर निकले लोगों को, रास्ते में मिले लोगों के,
ज्यादा करीब नहीं जाना चाहिए...
🌸
Piyush Goel
https://indiatimesnow.in/piyush-kumar-goel-the-record-breaking-author-redefining-the-art-of-writing/
Piyu soul
please read my series and give feedback review and comment if you like that please share and follow me it's helpful for me
Mara Bachaaaaa
इंतजार मौत का
की वो आ जाए
अपना बना ले जाए
अंधेरा जो किया
हमने आपकी जिंदगी में।
- Mara Bachaaaaa
Kamlesh
વરસી રહ્યો છે મેઘ મુશળધાર આજે,
રખે ને હૈયા વરાળ ચઢી હશે ક્યાંક આભે...
ખીલી રહી ચાંદની સજી સોળે શરણગાર સાજે,
રખે ને ભાણ ભળકે બળ્યો હશે ક્યાંક આજે...
વ્હાલી વસંતના વધામણા વનવગડામાં ગાજે,
રખે ને પર્ણના હૈયે ક્યાંક હશે પીડ પાનખરની જોજે...
ચાહે "કમલ" સમાવી લે તુજને આગોશમાં ,
રખે ને ભરમાણું એ પાછું "અનોખીપ્રિત"માં આજે...
Soni shakya
इश्क को कभी आवाज नहीं दी मैंने..!
फिर भी हर धड़कन तेरा नाम पुकारती रही..!!
- Soni shakya
Khushbu kumari
मजबूरी है मेरी
Kiran
मैं समय को बस गुजरते देखता रहा,और वो खामोशी से कहता गया—मुबारक हो,
तुम बर्बाद होते जा रहे हो …
Vartikareena
माई डियर प्रोफेसर का भाग 5 आ चुका है। आप लोग पढ सकते हो। अब से हर पार्ट के पोस्ट होते ही आप लोगो को मै इन्फोर्मे कर दुंगी। पढ लेना ।
Shailesh Joshi
વિશ્વાસ કેળવવામાં વર્ષો, ને તૂટવામાં ક્ષણ લાગે છે,
ને પાછો એકવાર તૂટયા પછી એને ફરી જોડવામાં તો,
વર્ષોના વર્ષો લાગે છે, માટે એક વાત સ્પષ્ટ પણે સમજી લેવી કે, સંબંધોમાં પરસ્પર વિશ્વાસ જાળવી રાખવા માટે, સૌથી વધારે જરૂરી જે પરિબળ છે એ છે, પરસ્પરનો પ્રેમ અને લાગણી, અને એને તોડવામાં જે સૌથી મોટું પરિબળ કામ કરે છે, એ છે, કોઈપણ પ્રકારની માંગણી, કેમકે લાગણીઓ તૂટવામાં માંગણીઓ બહુ મોટો ભાગ ભજવતી હોય છે.
- Shailesh Joshi
Anup Gajare
"सृजन बनाम संहार"
____________________________________________________
बेजान ढांचे में फुकी हवा
कल्पना में बसे
भ्रम को खत्म नहीं करती।
उड़ती हुई लाशें, या
गिरे हुए पत्ते
वृक्ष से कोई भी
समझौता नहीं करते
उनकी मृतकता ही
परिवेश है।
उनका होना मेरे लिए
ठीक वैसा ही अनुभव है
जैसा उनका न होना।
हे बीथोवन
हम तुझे भूल गए
याद रखा हिटलर का नरसंहार
पर तेरी सिंफनी को
कभी ठीक से देखा ही नहीं गया।
पेड़ उनके लिए
कभी नहीं रोते
पत्तों की रुलाई
जिन्होंने संगीत नहीं
बल्कि हिंसा का सृजन किया।
बीथोवन की न लिखी
दसवीं सिंफनी
मैं हु।
और क्या समुद्ध
हो सकता है
जिसने कभी
खुद को समझा ही
नहीं
उसके होने से
पहले ही उसे नष्ट कर दिया गया था
किसी कंपोजिशन की तरह।
भ्रम में उपजे हालात
एक दूसरा रंग निर्माण करते रहे
टीस का हिस्सा
मेरे जहन में बचा रहा
किसी प्रेत की तरह।
हवा मृत बंसी में
टहलती हुई
होठों के बीच फंस गई
ये भी एक आत्महत्या ही थी।
ढांचे में
आखरी कोशिका
ने खत लिखा था कि,
मैं उनके करीब कभी
न जाऊ, जिनके लिए
मेरे लिए वक्त की दीवार नहीं है।
समय
मेरे चारों ओर
दीवार नहीं बनाता,
वह तो
धीरे-धीरे
मेरे भीतर उगता है
किसी फफूंदी की तरह।
मैंने देखा है
घड़ियों को मरते हुए—
उनकी सुइयाँ
एक ही क्षण पर
टंगी रह जाती हैं,
जैसे निर्णय लेने से
डर गई हों।
और उस ठहरे हुए पल में
मैंने खुद को
बार-बार जन्म लेते देखा,
बिना किसी शोर के,
बिना किसी उद्देश्य के।
क्या यही सृजन है?
या यह भी
संहार का ही
एक धीमा संस्करण है?
मैंने अपने ही हाथों
अपने ही चेहरे को
छुआ—
वह मेरा नहीं था।
वह किसी और की
अधूरी रचना थी,
जिसे जल्दबाज़ी में
त्याग दिया गया था।
जैसे कोई कलाकार
अपनी कैनवास को
आधे रंग में छोड़कर
भाग गया हो।
और मैं…
वही अधूरा रंग हूँ,
जो सूख चुका है
पर मिटा नहीं।
मेरे भीतर
अब भी गूंजती है
वह अनसुनी धुन—
जिसे लुडविग वान बीथोवन
कभी लिख नहीं पाया।
पर शायद
वह धुन
लिखी ही नहीं जानी थी—
उसे तो बस
जीया जाना था,
टूटे हुए ढांचों में,
मृत कोशिकाओं के बीच,
जहाँ सृजन
हमेशा संहार के
बिल्कुल पास बैठा होता है।
मैंने संहार को
धीरे-धीरे
सृजन करते देखा है—
वह पहले
सब कुछ छीनता है,
फिर
खालीपन को
एक आकार देता है।
और वही आकार
हम “अस्तित्व” कह देते हैं।
अब मुझे समझ आता है—
मैं कोई व्यक्ति नहीं,
कोई स्मृति नहीं,
कोई विचार भी नहीं।
मैं बस
एक असफल प्रयास हूँ—
जिसे ब्रह्मांड ने
लिखने की कोशिश की,
और फिर
मिटा दिया।
पर मिटाने की प्रक्रिया में
जो धूल बची…
वही मैं हूँ।
और शायद
यही मेरी सबसे बड़ी त्रासदी है—
कि मैं पूरी तरह
कभी नष्ट भी नहीं हुआ।
______________________________________________
MASHAALLHA KHAN
यू सबसे दूर दूर रहना मेरी आदत नही
कुछ मजबुरिया है जो मैने सबसे छिपा रखी है .
-MASHAALLHA
Kuldeep Roni
तेरी बातों से ये लगता है मुझे
तू धोखा देकर जाएगा मुझे
तेरी यादों से ऐसे गुज़र जाऊंगा
जैसे हवा छूकर गुजरती है मुझे
KULDEEP RONl
Kuldeep Roni
आसमान जमीन पर लाकर दिखा
जमीन मिट्टी में मिलाकर दिखा
और तु क्या है क्या नहीं है हमें है मालूम
क्या कहा औकात औकात से बाहर जाकर दिखा
और तू रो कर क्या दिखाता है हमें
औकात है तो हंस कर दिखा
धोखा वफा चाहत इश्क मोहब्बत प्यार
तेरे से जो हो सकता है वो करके दिखा
मौत तेरे सामने खड़ी है रोनी
तुझे बचना है तो बच कर दिखा
Prem Solanki
पहले भरोसा तोड़ता हैं कोई फ़िर दिल,
बाद में आदमी ख़ुद-ब-ख़ुद टूट जाएगा,
✍️PARTH SOLANKI✍️
Dada Bhagwan
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Kiran
राह में आते रहते हैं काँटे,
लगता है उन्हें भी हम पसंद आ गए हैं…
- Kiran
SAYRI K I N G
पल
कुछ ठहर गए, कुछ पल गए कुछ खोटे थे, कुछ चल गए
कुछ को पकड़ा था हाथों में कुछ हाथों में से फिसल गए
फिर से मिल जाये बीता वक़्त हम पल दो पल को मचल गए
कुछ पलों से हमने दौड़ लगाई वो खुद से भी आगे निकल गए
पलों की सवारी रुकती कब है कुछ आज गए, कुछ कल गए
कुछ ठहर गए, कुछ पल गए कुछ खोटे थे, कुछ चल गए
SAYRI K I N G
बिखरी हुई हर एक चीज़ को बुरा कहने वालों, तुमनें देखी ही नहीं चेहरे पर जुल्फें गिरती उनकी...
SADIKOT MUFADDAL 《Mötäbhäï 》
થોડું વિચારી ને જો જો.
લાકડીનાં નહીં,
લાગણીનાં ઘા વધુ દર્દ આપે છે.
- SADIKOT MUFADDAL 《Mötäbhäï 》
Preet
good morning guys
have a good day 😊
- Preet
Imaran
तेरे दीदार से मेरे दिल की धड़कन में मोहब्बत का एहसास होता है,
तू ही मेरा दिलबर और मेरी मेरी जान है
🫶imran 🫶
Thakor Pushpaben Sorabji
સમજ્યા સૌને
સમજાવ્યા પણ સૌને
પણ
સમજ્યા એ
એમની જ સમજણે
જય શ્રી કૃષ્ણ:પુષ્પા એસ ઠાકોર
- Thakor Pushpaben Sorabji
Om Mahindre
After weeks of writing… it’s finally live 🔥
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Thakor Pushpaben Sorabji
રાધે રાધે
Thakor Pushpaben Sorabji
જય શ્રી કૃષ્ણ "પુષ્પ"
PRASANG
भीतर का अँधेरा।
भय नाम का चेहरा अब कोई सच नहीं है,
भीतर का अँधेरा भी उतना सच नहीं है।
कदम बाँधता साया ये अपने ही मन का,
राहों में कहीं भी कोई अवरोध नहीं है।
नज़रों ने खींचीं ये बंधन की लकीरें,
बाहर कहीं कोई दोहरी सरहद नहीं है।
सीने में अगर आग ज़रा-सी भी जले तो,
हर ख़ौफ़, हर इक तूफ़ान कुछ भी नहीं है।
कल का जो भय था, बस वहम ही ठहरा,
आने वाले लम्हों में वो बात नहीं है।
ख़ुद से जो भिड़ा, फ़तह उसी पर ही ठहरी,
बाहर कहीं कोई जंग का मैदान नहीं है।
‘प्रसंग’ कहे- ये ख़ौफ़ झूठी परछाईं,
आँखें जो खुलें तो इसमें भी दम नहीं है।
- प्रसंग
प्रणय राज रणवीर
DrAnamika
संकट मे साथ देने का दावा करने वाले लोग संकट की घड़ी में सबसे पहले साथ छोड गए
--डॉ अनामिका--
kattupaya s
Good morning friends.. have a nice Wednesday
PRASANG
वक़्त का फ़ैसला
अपनी सूरत पे यूँ इतराना ठीक नहीं,
आईना यूँ कभी बहक जाना ठीक नहीं।
वक़्त के हाथ में सब राज़ लिखे होते,
आज हँसना है तो कल रोना ठीक नहीं।
रंग-ओ-रूप, दौलत, धूप-छाँव जैसे हैं,
इन पे मन का यूँ भरम खाना ठीक नहीं।
जो भी पाया है, वो बस दो पल का मेला है,
इस मेले में ख़ुद को खो जाना ठीक नहीं।
मिट्टी से उठकर फिर मिट्टी में मिलना है,
इस सच्चाई को यूँ झुठलाना ठीक नहीं।
नर्म लफ़्ज़ों में भी सच बोला जाता है,
हर सच को यूँ तलवार बनाना ठीक नहीं।
‘प्रसंग’ कहे, ये दुनिया फ़ानी मंज़र है,
इस पर इतना दिल बहलाना ठीक नहीं।
- प्रसंग
प्रणयराज रणवीर
Sonu Kumar
अमेरिका अपना नुकसान की भरपाई भारत को युद्ध में धकेलने से करवा रहा हैं..
भारत के मोदी राहुल केजरीवाल तीनों अमेरिका के सामने घुटने टेक चूके हैं.. जनता के पास बचने का समाधान फिलहाल यही हैं की जितना जल्दी हो सके EVM की जगह चुनाव बैलेट पेपर से होने चाहिए | क्योंकि तीनों की चोटी us uk धनिको के पास हैं क्योंकि पेड मिडिया के स्पोंसर वही हैं..
यदि भारत की जनता अमेरिका जैसे वोटवापसी सिस्टम, जूरी कोर्ट, बैलेट पेपर चुनाव, जनमत संग्रह, हथियारबंद नागरिक समाज क़ानून लागु करवाने के लिए PM, CM पर दबाव बनाने चाहिए |
#CancelEVM
#VotvapsiPassbook
#JuryCourt
#TCP
#Gunlawreferndum
#GunLawIndia
#CoorgGunLawReferendum
GANESH TEWARI 'NESH' (NASH)
गुण की पूजा हर जगह, करते हैं सब लोग। धन का बस उपयोग यह, करें वस्तु का भोग।।
दोहा --४६०
(नैश के दोहे से उद्धृत)
------गणेश तिवारी 'नैश'
Dr Darshita Babubhai Shah
मैं और मेरे अह्सास
नववर्ष में लेते है प्रतिज्ञा
नववर्ष में लेते है प्रतिज्ञा की कभी हार नहीं मानेंगे l
दूसरों की खुशी में खुद की खुशी मुकम्मल जानेंगे ll
परस्पर भाईचारा, एकता और अखंडता को
कायम कर l
शांति को प्रस्थापित कर चैन सुकून की नीद
पायेगे ll
"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह
Archana Singh
मरने की तमन्ना में जिये जा रहे हैं ,
गैरों के हिसाब से
ज़िंदगी का ज़हर पीएं जा रहे हैं !
हमें कहां ख़्वाहिश समंदर की थी ,
बस एक बूंद की तमन्ना
किए जा रहे हैं ...!!
अर्चना सिंह ✍🏻
GANESH TEWARI 'NESH' (NASH)
ऋगुवेद सूक्ति-- (४६) की व्याख्या-
"कृण्वन्तो विश्वमार्यम्"
ऋग्वेद-5/51/15
भाव--पूरे विश्व को आर्य(श्रेष्ठ) बनाओ।
मंत्र —
“कृण्वन्तो विश्वमार्यम्”
ऋग्वेद (5/51/15)
शाब्दिक अर्थ--
कृण्वन्तः = बनाओ / करो
विश्वम् = सम्पूर्ण संसार
आर्यम् = आर्य (श्रेष्ठ, सदाचारी)
भावार्थ:
“सम्पूर्ण विश्व को आर्य (श्रेष्ठ, सज्जन, संस्कारित) बनाओ।”
इसे गहराई से समझें--
यहाँ “आर्य” शब्द का अर्थ किसी जाति या नस्ल से नहीं है, बल्कि
श्रेष्ठ आचरण वाला,सत्यनिष्ठ
संस्कारित और उदार व्यक्ति।
इस मंत्र का संदेश है:
पूरी मानवता को नैतिक, सभ्य और उच्च जीवन मूल्यों वाला बनाना।
वैदिक दृष्टि--
यह मंत्र हमें सिखाता है कि—
केवल स्वयं के सुधार तक सीमित न रहें बल्कि समाज और विश्व के उत्थान के लिए कार्य करें। ज्ञान, संस्कार और सदाचार का प्रसार करें।
यही भावना आगे चलकर “वसुधैव कुटुम्बकम्” (सारा विश्व एक परिवार है) को साकार करती है।
वेदों में प्रमाण--
1. ऋग्वेद-- 10.191.2
संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्।
भावार्थ:
मिलकर चलो, मिलकर बोलो, तुम्हारे मन एक समान हों।
अर्थ: सम्पूर्ण मानवता में एकता और समन्वय स्थापित करना — यही “विश्व को श्रेष्ठ बनाना” है।
2. ऋग्वेद-- 1.89.1
आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतः।
भावार्थ:
सभी दिशाओं से हमारे पास कल्याणकारी विचार आएँ।
अर्थ: पूरी दुनिया से अच्छे विचार ग्रहण करना और फैलाना।
3. यजुर्वेद-- 36.18
मित्रस्याहं चक्षुषा सर्वाणि भूतानि समीक्षे।
भावार्थ:
मैं सभी प्राणियों को मित्र की दृष्टि से देखूँ।
अर्थ: सबके प्रति मैत्री भाव — यही आर्यत्व (श्रेष्ठता) है।
4. अथर्ववेद-- 12.1.45
माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः।
भावार्थ:
यह पृथ्वी मेरी माता है और मैं उसका पुत्र हूँ।
अर्थ: समस्त पृथ्वी को अपना परिवार मानना।
5. अथर्ववेद-- 3.30.1
समानो मन्त्रः समिति: समानी...
भावार्थ:
तुम्हारे विचार, उद्देश्य और भाव एक समान हों।
अर्थ: समाज में सामंजस्य और एकता स्थापित करना।
निष्कर्ष--
इन सभी वैदिक मंत्रों का सार यही है कि—
सम्पूर्ण विश्व को एक परिवार समझो। सभी के लिए कल्याणकारी सोच रखो।
मानवता में एकता, मैत्री और सदाचार स्थापित करो।
यही “कृण्वन्तो विश्वमार्यम्” का वास्तविक विस्तार है—
उपनिषदो में प्रमाण--
1. ईशोपनिषद् --1
ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्।
भावार्थ:
इस सम्पूर्ण जगत में जो कुछ भी है, वह ईश्वर से व्याप्त है।
अर्थ: जब सबमें एक ही परमात्मा है, तो सबके प्रति श्रेष्ठ भाव रखना ही “विश्व को आर्य बनाना” है।
2. मुण्डक उपनिषद्-- 3.1.6
सत्येन पन्था विततो देवयानः।
भावार्थ:
सत्य के द्वारा ही देवयान (उच्च मार्ग) प्रशस्त होता है।
अर्थ: सत्य के मार्ग पर चलकर ही मनुष्य श्रेष्ठ बनता है और दूसरों को भी बनाता है।
3. कठोपनिषद्-- 1.3.14
उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत।
भावार्थ:
उठो, जागो और श्रेष्ठ ज्ञान को प्राप्त करो।
अर्थ: स्वयं जागरूक बनो और दूसरों को भी ज्ञान देकर श्रेष्ठ बनाओ।
4. छान्दोग्य उपनिषद-- 6.8.7
तत्त्वमसि (श्वेतकेतु)।
भावार्थ:
तू वही (ब्रह्म) है।
अर्थ: हर व्यक्ति में दिव्यता है—उसे पहचानकर जीवन को श्रेष्ठ बनाना ही आर्यत्व है।
5. बृहदारण्यक उपनिषद्- ---1.4.14
अहं ब्रह्मास्मि।
भावार्थ:
मैं ब्रह्म हूँ।
अर्थ: आत्मा की महानता को समझकर जीवन को उच्च बनाना।
6. तैत्तिरीय उपनिषद्-- 1.11.1
सत्यं वद, धर्मं चर।
भावार्थ:
सत्य बोलो, धर्म का आचरण करो।
अर्थ: यही श्रेष्ठ (आर्य) जीवन का मूल आधार है।
निष्कर्ष--
उपनिषदों का संदेश यही है कि—
आत्मज्ञान प्राप्त करो, सत्य और धर्म का पालन करो, सबमें एक ही ब्रह्म को देखो,और इस ज्ञान से सम्पूर्ण विश्व को श्रेष्ठ बनाओ
यही “कृण्वन्तो विश्वमार्यम्" का संदेश है।
पुराणों में प्रमाण--
1. विष्णु पुराण-- 1.19.41
वर्णाश्रमाचारवता पुरुषेण परः पुमान्।
विष्णुराराध्यते पन्था नान्यत्तत्त्वोषकारणम्॥
भावार्थ:
वर्णाश्रम धर्म का आचरण करने वाला मनुष्य भगवान विष्णु की आराधना करता है; यही श्रेष्ठ मार्ग है।
अर्थ: सदाचार और धर्मपालन से समाज को श्रेष्ठ बनाना।
2. भागवत पुराण-- 1.2.6
स वै पुंसां परो धर्मो यतो भक्तिरधोक्षजे।
अहैतुकी अप्रतिहता ययात्मा सुप्रसीदति॥
भावार्थ:
वह धर्म श्रेष्ठ है जिससे निष्काम भक्ति उत्पन्न हो और आत्मा प्रसन्न हो।
अर्थ: ऐसा धर्म अपनाना जो सबके कल्याण का कारण बने।
3. पद्म पुराण (सृष्टि खण्ड)
परोपकाराय पुण्याय पापाय परपीडनम्।
भावार्थ:
दूसरों का उपकार करना पुण्य है और दूसरों को पीड़ा देना पाप।
अर्थ: परोपकार से ही विश्व श्रेष्ठ बनता है।
4. गरुड़ पुराण-- 1.113.10 (सामान्य संदर्भ)
अहिंसा परमो धर्मः धर्म हिंसा तथैव च।
भावार्थ:
अहिंसा परम धर्म है।
अर्थ: सभी प्राणियों के प्रति करुणा और अहिंसा — यही आर्यत्व है।
5. अग्नि पुराण (अध्याय 372 के आसपास)
सर्वभूतहिते रतः।
भावार्थ:
जो सभी प्राणियों के हित में लगा रहता है।
अर्थ: सबके कल्याण की भावना रखना।
6. नारद पुराण (पूर्व भाग)
धर्मः सर्वेषां भूतानां हितः।
भावार्थ:
सभी प्राणियों का हित ही धर्म है।
अर्थ: धर्म का उद्देश्य सम्पूर्ण विश्व का कल्याण है।
निष्कर्ष--
पुराणों का सार स्पष्ट है—
परोपकार, अहिंसा, और सर्वहित ही सच्चा धर्म है।
मनुष्य को ऐसा जीवन जीना चाहिए जिससे समाज और विश्व का उत्थान हो।
यही “कृण्वन्तो विश्वमार्यम्” का पुराणों में व्यावहारिक रूप है—
दूसरों का भला करो और पूरे विश्व को श्रेष्ठ बनाओ।
गीता में प्रमाण--
1.(क) गीता-- 3.20 और 21
कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः।
लोकसंग्रहमेवापि संपश्यन्कर्तुमर्हसि॥ (3.20)
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥ (3.21)
भावार्थ:
श्रेष्ठ पुरुष अपने आचरण से लोक का मार्गदर्शन करता है; इसलिए उसे लोकसंग्रह (विश्व के कल्याण) के लिए कर्म करना चाहिए।
अर्थ: स्वयं श्रेष्ठ बनकर पूरे समाज को श्रेष्ठ बनाना।
(ख). गीता-- 12.4
सर्वभूतहिते रताः।
भावार्थ:
जो सभी प्राणियों के हित में लगे रहते हैं।
अर्थ: सबके कल्याण में लगे रहना — यही “विश्व को आर्य बनाना” है।
(ग). गीता-- 5.25
लभन्ते ब्रह्मनिर्वाणम् ऋषयः क्षीणकल्मषाः।
छिन्नद्वैधा यतात्मानः सर्वभूतहिते रताः॥
भावार्थ:
जो सभी प्राणियों के हित में लगे रहते हैं, वे परम शांति को प्राप्त करते हैं।
अर्थ: सर्वहित ही श्रेष्ठता का मार्ग है।
(घ) गीता-- 6.29
सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि।
ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः॥
भावार्थ:
योगी सभी प्राणियों में अपने आत्मा को और अपने में सभी को देखता है।
अर्थ: सबमें एकता का दर्शन — यही उच्च (आर्य) दृष्टि है।
(च). गीता-- 18.46
यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम्।
स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः॥
भावार्थ:
जिससे सबकी उत्पत्ति हुई है, उसी की अपने कर्मों से पूजा करके मनुष्य सिद्धि प्राप्त करता है।
अर्थ: अपने कर्तव्य से विश्व-व्यवस्था को श्रेष्ठ बनाना।
निष्कर्ष
गीता का स्पष्ट संदेश है—
लोकसंग्रह (विश्व कल्याण) के लिए कर्म करो, सर्वभूतहित में लगे रहो, अपने आचरण से दूसरों को प्रेरित करो।
यही “कृण्वन्तो विश्वमार्यम्” का गीता में व्यावहारिक रूप है—
स्वयं श्रेष्ठ बनो और पूरे विश्व को श्रेष्ठ बनाओ।
महाभारत में प्रमाण--
1(क) महाभारत, शान्ति पर्व-- 262.5
अहिंसा परमो धर्मः धर्म हिंसा तथैव च।
भावार्थ:
अहिंसा परम धर्म है।
अर्थ: सभी प्राणियों के प्रति करुणा और अहिंसा — यही विश्व को श्रेष्ठ बनाने का आधार है।
(ख). महाभारत, शान्ति पर्व --109.11
सर्वभूतहिते रतः।
भावार्थ:
जो सभी प्राणियों के हित में लगा रहता है।
अर्थ: सर्वहित की भावना ही आर्यत्व (श्रेष्ठता) है।
(ग). महाभारत, अनुशासन पर्व --113.8
आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत्।
भावार्थ:
जो व्यवहार अपने लिए प्रतिकूल है, वह दूसरों के साथ न करो।
अर्थ: नैतिक आचरण द्वारा समाज को श्रेष्ठ बनाना।
(घ). महाभारत, शान्ति पर्व-- 90.24
धर्मो रक्षति रक्षितः।
भावार्थ:
जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है।
अर्थ: धर्म पालन से ही समाज और विश्व सुरक्षित व श्रेष्ठ बनता है।
(च)०. महाभारत, शान्ति पर्व 167.9
न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते।
भावार्थ:
ज्ञान के समान कोई पवित्र वस्तु नहीं है।
अर्थ: ज्ञान का प्रसार ही विश्व को श्रेष्ठ बनाता है।
(छ). महाभारत, वन पर्व --313.117
परोपकाराय सतां विभूतयः।
भावार्थ:
सज्जनों की सम्पत्ति परोपकार के लिए होती है।
अर्थ: दूसरों का भला करना ही सच्ची श्रेष्ठता है।
निष्कर्ष--
महाभारत का स्पष्ट संदेश है—
अहिंसा, परोपकार और धर्म का पालन करो
सर्वभूतहित में लगे रहो
ज्ञान और सदाचार का प्रसार करो
यही “कृण्वन्तो विश्वमार्यम्” का महाभारत में व्यावहारिक रूप है
स्वयं श्रेष्ठ बनकर समाज और विश्व को श्रेष्ठ बनाना।
1(क). मनुस्मृति-- 6.92
धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः।
धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम्॥
भावार्थ:
धैर्य, क्षमा, इन्द्रियनिग्रह, सत्य आदि धर्म के दस लक्षण हैं।
अर्थ: इन गुणों को अपनाकर मनुष्य स्वयं तथा समाज को श्रेष्ठ बनाता है।
(ख). मनुस्मृति-- 10.63
अहिंसा सत्यमस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः।
एतं सामासिकं धर्मं चातुर्वर्ण्येऽब्रवीन्मनुः॥
भावार्थ:
अहिंसा, सत्य, चोरी न करना, शुद्धता और इन्द्रियनिग्रह — यह सबके लिए समान धर्म है।
अर्थ: सार्वभौमिक नैतिकता से सम्पूर्ण विश्व का उत्थान।
२- याज्ञवल्क्य स्मृति-- 1.122
अहिंसा सत्यमस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः।
दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम्॥
भावार्थ:
अहिंसा, सत्य, दान, स्वाध्याय, तप आदि धर्म के अंग हैं।
अर्थ: इनका पालन समाज को श्रेष्ठ बनाता है।
3- याज्ञवल्क्य स्मृति 1.156 (सामान्य संदर्भ)
सर्वभूतहिते रतः।
भावार्थ:
जो सभी प्राणियों के हित में लगा रहता है।
अर्थ: सर्वहित ही सच्चा धर्म है।
4-. पाराशर स्मृति-- 1.24 (सामान्य संदर्भ)
अहिंसा परमोधर्मः।
भावार्थ:
अहिंसा ही परम धर्म है।
अर्थ: करुणा और अहिंसा से ही विश्व श्रेष्ठ बनता है।
5-. नारद स्मृति (प्रारम्भिक अध्याय)
धर्मो हि सर्वभूतानां हितः।
भावार्थ:
सभी प्राणियों का हित ही धर्म है।
अर्थ: धर्म का उद्देश्य सम्पूर्ण विश्व का कल्याण है।
निष्कर्ष--
स्मृतियों का सार यही है—
अहिंसा, सत्य, दया, दान को अपनाओ।
सर्वभूतहित में लगे रहो।
ऐसा आचरण करो जिससे सम्पूर्ण समाज और विश्व का उत्थान हो।
यही “कृण्वन्तो विश्वमार्यम्” का स्मृतियों में व्यावहारिक रूप है—
स्वयं श्रेष्ठ बनो और पूरे विश्व को श्रेष्ठ बनाइए।
नीति ग्रन्थों में प्रमाण--
1. हितोपदेश
“अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्।
उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्॥”
हितोपदेश, मित्रलाभ, श्लोक 71
अर्थ: उदार लोगों के लिए पूरी पृथ्वी परिवार है — यही “विश्व को श्रेष्ठ बनाओ” की भावना है।
2. पंचतंत्र--
“सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत्॥”
भावार्थ --यह बृहदारण्यक उपनिषद् का प्रसिद्ध मंत्र है। इसमें सभी के लिए सुख और मंगल की कामना की गयी है।
3. चाणक्य नीति
“परोपकाराय फलन्ति वृक्षाः, परोपकाराय वहन्ति नद्यः।
परोपकाराय दुहन्ति गावः, परोपकारार्थमिदं शरीरम्॥”
चाणक्य नीति, अध्याय 1, श्लोक 13
अर्थ: प्रकृति की हर वस्तु परोपकार के लिए है — मनुष्य भी ऐसा ही बने।
4. विदुर नीति (महाभारत से)
“सर्वभूतहिते रतः”
महाभारत, उद्योग पर्व, अध्याय 33 (विदुर नीति)
जो सब प्राणियों के हित में लगा रहता है वही श्रेष्ठ है।
5. चाणक्य नीति
“त्यजेदेकं कुलस्यार्थे ग्रामस्यार्थे कुलं त्यजेत्।
ग्रामं जनपदस्यार्थे आत्मार्थे पृथिवीं त्यजेत्॥”
चाणक्य नीति, अध्याय 1, श्लोक 17
यह श्लोक बताता है कि बड़े हित (समष्टि) को प्राथमिकता देना चाहिए — जो “विश्व हित” की ओर संकेत है।
निष्कर्ष-
इन सभी नीति ग्रन्थों यह स्पष्ट करते हैं कि परोपकार, विश्व-कल्याण, समस्त मानवता को एक परिवार मानना।
यही “कृण्वन्तो विश्वमार्यम्” (ऋग्वेद) का वास्तविक अर्थ और उद्देश्य है।:
1. वाल्मीकि रामायण में प्रमाण--
(1)
“सर्वभूतहिते रतः”
स्थान: अयोध्याकाण्ड- 2.1.31 (कुछ संस्करणों में भिन्नता)
श्रीराम के गुण बताते हुए कहा गया है कि वे सभी प्राणियों के हित में लगे रहते थे।
यह “विश्व को श्रेष्ठ बनाना” का प्रत्यक्ष रूप है।
(2)“जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी”
स्थान: युद्धकाण्ड --6.124.17 (लोकप्रिय पाठ)
अर्थ:
माता और जन्मभूमि स्वर्ग से भी महान हैं।
यहाँ अपने कर्तव्य और धर्म पालन से समाज को श्रेष्ठ बनाने का संदेश है।
2. गर्ग संहिता में प्रमाण--
(1)
“लोकानां हितकारिणौ”
स्थान: गर्ग संहिता, गोलोक खण्ड (अध्याय भिन्न संस्करणों में बदलता है)
श्रीकृष्ण और बलराम को
संपूर्ण लोकों के हित करने वाले कहा गया है।
(2)“भवाय सर्वभूतानाम्”
संदर्भ: विभिन्न अध्यायों में भगवान के अवतार का उद्देश्य
अर्थ:
“सभी प्राणियों के कल्याण के लिए”
यह स्पष्ट करता है कि दिव्य कार्य का उद्देश्य विश्व का कल्याण और उत्थान है।
3- योग वशिष्ठ में प्रमाण-
(1) “सर्वभूतहिते रतः”
स्थान: योग वशिष्ठ, वैराग्य प्रकरण (अध्याय भिन्न)
ज्ञानी पुरुष का लक्षण बताया गया है कि वह सभी प्राणियों के हित में लगा रहता है।
(2)“यथा सर्वाणि भूतानि आत्मन्येव पश्यति”
स्थान: योग वशिष्ठ, उपशम प्रकरण
अर्थ:
जब मनुष्य सभी प्राणियों को अपने समान देखता है—
तब वह किसी का अहित नहीं करता और विश्व को श्रेष्ठ बनाने की दिशा में कार्य करता है।
क़ुरआन और हदीस में प्रमाण--
“कृण्वन्तो विश्वमार्यम्” (संपूर्ण विश्व को श्रेष्ठ बनाओ / सबका उत्थान करो) का जो भाव है—सर्वजन हित, नैतिकता और मानवता—वह इस्लामिक धर्मग्रन्थों में भी स्पष्ट रूप से मिलता है। नीचे क़ुरआन और हदीस से प्रमाण दिए जा रहे हैं:
1. क़ुरआन से प्रमाण
(क)
“इन्नल्लाह यअमुरु बिल-अद्लि वल-इह्सान…”
(إِنَّ اللَّهَ يَأْمُرُ بِالْعَدْلِ وَالإِحْسَانِ)
सूरह अन-नहल (16:90)
अर्थ:
अल्लाह आदेश देता है न्याय (अद्ल) और भलाई (एहसान) का।
यह समाज को श्रेष्ठ बनाने का मूल सिद्धांत है।
(2)
“मन क़तल नफ़्सन… फका-अन्नमा क़तलन्नास जमीयन,
व मन अह्याहा फका-अन्नमा अह्यन्नास जमीयन”
सूरह अल-माइदा (5:32)
अर्थ:
जिसने एक निर्दोष व्यक्ति की हत्या की, उसने मानो पूरी मानवता को मारा;
और जिसने एक को बचाया, उसने पूरी मानवता को बचाया।
यह विश्व-कल्याण और मानवता की रक्षा का सर्वोच्च भाव है।
(3)
“व मा अरसल्नाक इल्ला रहमतन लिल-आलमीन”
सूरह अल-अंबिया (21:107)
अर्थ:
(हे मुहम्मद) हमने आपको सारे संसार के लिए दया (रहमत) बनाकर भेजा।
यहाँ सम्पूर्ण विश्व के कल्याण की बात है।
(4)
“ला इकराह फिद्दीन”
सूरह अल-बक़रा (2:256)
अर्थ:
धर्म में कोई जबरदस्ती नहीं है।
यह सहिष्णुता और नैतिक श्रेष्ठता का सिद्धांत है।
2. हदीस से प्रमाण--
(सहीह बुखारी, सहीह मुस्लिम)
(1)
“खैरुन्नास मन यनफ़अुन्नास”
(मुस्नद अहमद / अन्य संग्रहों में)
अर्थ:
सबसे अच्छा इंसान वह है जो दूसरों के लिए सबसे अधिक लाभदायक हो।
यह “विश्व को श्रेष्ठ बनाओ” का सीधा रूप है।
(2)
“ला युमिनु अहदुकुम हत्ता युहिब्ब लि-अखीहि मा युहिब्बु लिनफ़्सिहि”
सहीह बुखारी 13 / सहीह मुस्लिम 45
अर्थ:
तुम में से कोई सच्चा ईमान वाला नहीं हो सकता जब तक वह अपने भाई के लिए वही पसंद न करे जो अपने लिए करता है।
यह सर्वहित और समानता की भावना है।
निष्कर्ष
इस्लामिक ग्रन्थों में भी वही मूल भावना मिलती है जो
“कृण्वन्तो विश्वमार्यम्” में है:
न्याय और भलाई (अद्ल, इ
जहसान)
संपूर्ण मानवता की रक्षा
विश्व के लिए दया (रहमत)
दूसरों के लिए उपयोगी बनना
अर्थात् —
सिर्फ अपने लिए नहीं, बल्कि पूरे विश्व के उत्थान और कल्याण के लिए कार्य करना।
सिक्ख ग्रन्थों में प्रमाण--
गुरु ग्रन्थ साहिब से प्रमाण--
(1)
“ਸਰਬੱਤ ਦਾ ਭਲਾ” (सरबत दा भला)
अर्थ/स्रोत:
यह पंक्ति सिख अरदास का मुख्य भाग है (गुरु परम्परा से)
अर्थ:
सभी का भला हो, सबका कल्याण हो।
यह सीधे “विश्व को श्रेष्ठ बनाओ” का भाव है।
(2)
“ਨ ਕੋ ਬੈਰੀ ਨਹੀ ਬਿਗਾਨਾ, ਸਗਲ ਸੰਗ ਹਮ ਕਉ ਬਨਿ ਆਈ”
गुरु ग्रन्थ साहेब- 1299
अर्थ:
न कोई मेरा शत्रु है, न कोई पराया;
मैं सबके साथ प्रेमपूर्वक रहता हूँ।
यह विश्व-बंधुत्व और श्रेष्ठ आचरण का संदेश है।
(3)
“ਸਭਨਾ ਜੀਆ ਕਾ ਇਕੁ ਦਾਤਾ, ਸੋ ਮੈ ਵਿਸਰਿ ਨ ਜਾਈ”
गुरु ग्रन्थ साहेब- 425
अर्थ:
सभी जीवों का दाता एक ही परमात्मा है।
इससे सभी में एकता और समानता का भाव आता है।
दशम ग्रन्थ में प्रमाण--
(1)
“ਮਾਨਸ ਕੀ ਜਾਤ ਸਭੈ ਏਕੈ ਪਹਿਚਾਨਬੋ”
(गुरु गोबिन्द सिंह)
स्रोत: दशम ग्रंथ
अर्थ:
पूरी मानव जाति को एक ही समझो।
यह सम्पूर्ण मानवता को श्रेष्ठ बनाने की प्रेरणा देता है।
(2)
“ਜਿਨ ਪ੍ਰੇਮ ਕੀਓ ਤਿਨ ਹੀ ਪ੍ਰਭੁ ਪਾਇਓ”
(गुरु गोबिन्द सिंह)
स्रोत: दशम ग्रंथ
अर्थ:
जिसने प्रेम किया, उसी ने परमात्मा को पाया।
प्रेम और करुणा से ही विश्व का उत्थान संभव है।
निष्कर्ष--
सिक्ख धर्म का मूल संदेश ही है:
सरबत दा भला → सबका कल्याण
कोई पराया नहीं → विश्व-बंधुत्व
सबमें एक ही परमात्मा → समानता
प्रेम और सेवा → श्रेष्ठ समाज का निर्माण
इसलिए सिक्ख धर्म भी पूरी तरह से“कृण्वन्तो विश्वमार्यम्” के भाव को पुष्ट करता है—
“सभी का भला करो, सभी को श्रेष्ठ बनाओ।”
ईसाई धर्म में प्रमाण--
1. बाइबल से प्रमाण
(1)
“Love your neighbour as yourself.”
(अपने पड़ोसी से वैसे ही प्रेम करो जैसे अपने आप से करते हो)
मत्ती- 22:39 (Matthew 22:39)
यह सार्वभौमिक प्रेम और मानवता का मूल सिद्धांत है।
(2)
“Blessed are the peacemakers: for they shall be called the children of God.”
मत्ती- 5:9 (Matthew 5:9)
अर्थ:
धन्य हैं वे जो शांति स्थापित करते हैं।
यह समाज और विश्व को श्रेष्ठ बनाने की प्रेरणा है।
(3)
“Do to others as you would have them do to you.”
लूका- 6:31 (Luke 6:31)
अर्थ:
दूसरों के साथ वैसा ही व्यवहार करो जैसा तुम अपने लिए चाहते हो।
यह नैतिक श्रेष्ठता और समानता का सिद्धांत है।
(4)
“Love your enemies and pray for those who persecute you.”
मत्ती 5:44 (Matthew 5:44)
अर्थ:
अपने शत्रुओं से भी प्रेम करो और जो तुम्हें सताते हैं उनके लिए प्रार्थना करो।
यह उच्चतम स्तर की करुणा और श्रेष्ठता दर्शाता है।
(5)
“Let your light shine before others, that they may see your good deeds.”
मत्ती 5:16 (Matthew 5:16)
अर्थ:
अपने अच्छे कर्मों से दूसरों के सामने प्रकाश फैलाओ।
यह पूरे समाज को प्रेरित कर श्रेष्ठ बनाने का संदेश है।
(6)
“Go into all the world and preach the gospel to all creation.”
मरकुस 16:15 (Mark 16:15)
अर्थ:
पूरे संसार में जाओ और शुभ संदेश फैलाओ।
यह विश्व-स्तर पर नैतिकता और धर्म का प्रसार है।
निष्कर्ष-
ईसाई धर्मग्रन्थों में भी वही मूल भाव मिलता है:
सबसे प्रेम करो (Universal Love)
शांति स्थापित करो (Peace)
समानता और नैतिकता (Golden Rule)
अच्छे कर्मों से समाज को प्रेरित करो
अर्थात् —
पूरा विश्व नैतिक, प्रेमपूर्ण और श्रेष्ठ बने।
यही “कृण्वन्तो विश्वमार्यम्” का सार्वभौमिक रूप है।
जैन धर्म में प्रमाण--
1. तत्त्वार्थ सूत्र
(1)
“परस्परोपग्रहो जीवानाम्”
अध्याय 5, सूत्र 21
अर्थ:
“सभी जीव एक-दूसरे के उपकार (सहयोग) के लिए हैं।”
वो यह स्पष्ट रूप से बताता है कि
सभी का हित करना ही धर्म है — यही “विश्व को श्रेष्ठ बनाना” है।
2. आचारांग सूत्र
“सव्वे पाणा न हन्तव्वा”
प्रथम श्रुतस्कंध, अध्याय 4 (भावार्थ)
अर्थ:
“सभी प्राणियों की हिंसा नहीं करनी चाहिए।”
अहिंसा के माध्यम से ही विश्व का कल्याण संभव है।
3. उत्तराध्ययन सूत्र
(3)
“खम्मामि सव्व जीवे, सव्वे जीवा खमंतु मे।
मित्ति मे सव्व भूएसु, वेरं मज्झ न केणइ॥”
अध्याय 4, श्लोक 62
अर्थ:
मैं सभी जीवों से क्षमा चाहता हूँ, सभी मुझे क्षमा करें;
मेरा सभी से मित्रभाव है, किसी से वैर नहीं।
यह विश्व-बंधुत्व और शुद्ध आचरण का सर्वोच्च आदर्श है।
4. दशवैकालिक सूत्र
(4)
“अहिंसा परमॊ धर्मः” (भावार्थ रूप में जैन परम्परा में अत्यंत प्रसिद्ध)
संदर्भ: दशवैकालिक सूत्र (भावार्थ आधारित परम्परा)
अर्थ:
अहिंसा ही सर्वोच्च धर्म है।
अहिंसा से ही सभी जीवों का कल्याण और श्रेष्ठता संभव है।
5. महावीर स्वामी के उपदेश
(5)
“जीओ और जीने दो” (परम्परागत उपदेश)
अर्थ:
स्वयं भी जीओ और दूसरों को भी जीने दो।
यह सम्पूर्ण विश्व के प्रति करुणा और सह-अस्तित्व का सिद्धांत है।
निष्कर्ष--
जैन धर्म का मूल ही है:
अहिंसा (Non-violence)
सर्वजीव कल्याण (Universal welfare)
मित्रभाव और क्षमा (Friendship & Forgiveness)
परस्पर सहयोग (Mutual support)
इसलिए जैन धर्म भी पूरी तरह से यह सिखाता है कि—
“संपूर्ण विश्व को श्रेष्ठ बनाओ, सबका भला करो”
यही “कृण्वन्तो विश्वमार्यम्” का मूल रूप है।
बौद्ध धर्म में प्रमाण--
त्रिपिटक से प्रमाण-- पिटक–ग्रन्थ–श्लोक/सूत्र संख्या सहित दिए जा रहे हैं:
1. सुत्त पिटक – करणीय मेत्ता सुत्त
(1)
“सुखिनो वा खेमिनो होंतु, सब्बे सत्ताः”
सुत्त निपात-- 1.8 (Karaniya Metta Sutta)
अर्थ:
“सभी प्राणी सुखी और सुरक्षित हों।”
यह सार्वभौमिक कल्याण (Universal welfare) का सीधा संदेश है।
(2)
“माता यथा निअं पुत्रं आयुसा एकपुत्तमनुरक्खे…”
सुत्त निपात-- 1.8
अर्थ:
जैसे माता अपने इकलौते पुत्र की रक्षा करती है,
वैसे ही सभी प्राणियों के प्रति प्रेम रखो।
यह सर्वोच्च करुणा और विश्व-हित का आदर्श है।
2. धम्मपद
(3)
“सब्बपापस्स अकरणं, कुसलस्स उपसम्पदा;
सचित्तपरियोदपनं — एतं बुद्धानं सासनं॥”
धम्मपद, श्लोक 183
अर्थ:
पाप न करना, पुण्य करना और मन को शुद्ध रखना—
यही बुद्ध का उपदेश है।
यह मनुष्य को श्रेष्ठ बनाकर समाज को श्रेष्ठ बनाने का मार्ग है।
(4)
“न हि वेरेन वेरानि सम्मन्ति ध कुदाचनं;
अवेरेन च सम्मन्ति…”
धम्मपद, श्लोक 5
अर्थ:
द्वेष से द्वेष कभी समाप्त नहीं होता,
केवल प्रेम (अद्वेष) से ही समाप्त होता है।
यह विश्व-शांति और श्रेष्ठता का मूल सिद्धांत है।
3. अंगुत्तर निकाय
(5)
“बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय”
अंगुत्तर निकाय (AN 4.95 आदि संदर्भ)
अर्थ:
“अनेक लोगों के हित और सुख के लिए”
बुद्ध के उपदेशों का उद्देश्य ही
संपूर्ण समाज और विश्व का कल्याण है।
4. गौतम बुद्ध के उपदेश
(6)
“मेत्ता (मैत्री), करुणा, मुदिता, उपेक्षा” (चार ब्रह्मविहार)
अर्थ:
सभी प्राणियों के प्रति
प्रेम (मैत्री),दया (करुणा)
आनंद (मुदिता) समभाव (उपेक्षा)
यह विश्व को श्रेष्ठ बनाने का मानसिक और आध्यात्मिक आधार है।
निष्कर्ष
बौद्ध धर्म का मूल संदेश है:
सब प्राणी सुखी हों (Metta)
करुणा और प्रेम से द्वेष समाप्त करो
बहुजन हित और सुख के लिए कार्य करो
स्वयं को सुधारो, विश्व सुधरेगा
अर्थात् —संपूर्ण विश्व का उत्थान और कल्याण
यही “कृण्वन्तो विश्वमार्यम्” का मूल रूप है।
(यहूदी धर्मग्रन्थ,तनाख) में प्रमाण--
1. तनाख से प्रमाण
(1)
“Love your neighbor as yourself.”
लैव्यव्यवस्था 19:18 (Leviticus 19:18)
अर्थ:
अपने पड़ोसी से वैसे ही प्रेम करो जैसे अपने आप से करते हो।
यह सार्वभौमिक प्रेम और नैतिक श्रेष्ठता का मूल सिद्धांत है।
(2)
“Seek peace and pursue it.”
भजन संहिता 34:14 (Psalms 34:14)
अर्थ:
शांति की खोज करो और उसका अनुसरण करो।
यह समाज और विश्व में शांति स्थापित करने का संदेश है।
(3)
“What does the Lord require of you? To act justly, love mercy, and walk humbly with your God.”
मीका 6:8 (Micah 6:8)
अर्थ:
ईश्वर तुमसे क्या चाहता है? — न्याय करो, दया से प्रेम करो, और विनम्रता से चलो।
यह नैतिक जीवन द्वारा विश्व को श्रेष्ठ बनाने का मार्ग है।
(4)
“Justice, justice shall you pursue.”
व्यवस्थाविवरण 16:20 (Deuteronomy 16:20)
अर्थ:
न्याय का ही अनुसरण करो।
यह समाज को धर्मपूर्ण और श्रेष्ठ बनाने का आधार है।
(5)
“He has told you, O man, what is good…”
मीका 6:8 (Micah 6:8) (ऊपर का ही विस्तृत भाग)
यह बताता है कि अच्छा जीवन जीकर समाज का उत्थान करना ही धर्म है।
2. यहूदी परम्परा (Talmud)
(6)
“What is hateful to you, do not do to your fellow.”
(जो तुम्हें अपने लिए बुरा लगे, वह दूसरों के साथ मत करो)
तलमूद – Shabbat 31a
यह प्रसिद्ध उपदेश हिलेल का है।
यह “Golden Rule” का नकारात्मक रूप है,
जो सार्वभौमिक नैतिकता सिखाता है।
निष्कर्ष--
यहूदी धर्म में मुख्य सिद्धांत हैं:
पड़ोसी से प्रेम (Love)
न्याय और धर्म (Justice)
दया और विनम्रता (Mercy & Humility)
शांति का अनुसरण (Peace)
अर्थात् —
समाज और विश्व को नैतिक, न्यायपूर्ण और श्रेष्ठ बनाना
यही “कृण्वन्तो विश्वमार्यम्” का मूल रूप है।
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Manjibhai Bavaliya મનરવ
हाइकु
कन्या शुकून
परिवार की शोभा
शृंगार भाव
softrebel
दो दोस्तों में प्रेम पनप सकता है
किन्तु दो दोस्तों के बीच उत्पन्न प्रेम दोस्ती को भी दूषित कर देता है।
- softrebel
softrebel
दो दोस्तों में प्रेम पनप सकता है
किन्तु दोस्ती के उपरांत हुआ प्रेम दोस्ती को भी दूषित कर देता है।
- softrebel
Bhavna Bhatt
જય બજરંગબલી 🙏
Beyondwords
કર્મનો સગાથી મારો કોઈ નથી,
બાકી બધા તો માર્ગના મુસાફર છે.
હિસાબ તો અંદરનો જ ચાલે છે,
બહારના સંબંધો બધાં અસ્થાયી છે.
- Beyondwords✍️
Beyondwords
किसी मुश्किल मोड़ पर
तुम मेरा हाथ छोड़कर चली गई…
मैं उस पल टूटा नहीं था,
बस खामोशी से अंदर ही अंदर बिखर गया था।
बहुत कुछ कहना था,
चीखना था, रोकना था तुम्हें…
पर अजीब है ना—
मेरी आवाज़ भी तुम्हारे साथ ही चली गई।
तब समझ आया—
मोहब्बत में दरवाज़े हम खोलते हैं,
मगर उन्हें बंद करने वाले
वही होते हैं… जिन पर हम सबसे ज़्यादा यकीन करते हैं।
जिसे मैंने अपना सुकून समझा,
वही मेरी बेचैनी बन गया…
जिसे अपना घर कहा,
वही मुझे बेघर कर गया।
और आज भी…
उस दरवाज़े के बंद होने की आवाज़
मेरे अंदर गूंजती रहती है—
हर बार मुझे थोड़ा और तोड़ जाती है।
हाँ, एक खिड़की खुली थी कहीं…
मगर वहाँ से कोई उजाला नहीं आया,
बस मेरा अपना अकेलापन
मुझे घूरता रहा।
सच तो ये है—
तुम्हारा ना मिलना इतना दर्द नहीं देता,
जितना ये एहसास देता है कि
मैंने तुम्हें सच में अपना मान लिया था…
और मेरी गलती बस इतनी थी—
कि मैंने तुम्हें चाहा…
सिर्फ चाहा नहीं,
पूरी तरह से तुम्हारा हो गया था…
- beyond_word l✍️
bhagwat singh naruka
आज कल के रिश्ते बहुत नाजुक है समय समय पर वक्त देते रहे वरना वो टूट जाते है ।🙏🙏🙏♥️♥️♥️♥️♥️♥️♥️♥️♥️♥️♥️🙏🙏🙏🙏🙏♥️♥️♥️♥️♥️
bhagwat singh naruka
जो बीत रहा है वो वक्त नहीं ,,,जीवन है ♥️♥️♥️♥️♥️🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏
Beyondwords
સ્પર્શ કરીને પાણી જયારે વહી જતું હશે,
ત્યારે એ પથ્થરને પણ કંઈક લાગણી તો થતી જ હશે…
ચુપ રહીને સહન કરવાનું એનું સ્વભાવ હશે,
એટલે જ તો એનું દુઃખ ક્યારેય દેખાતું નહીં હશે…
ક્યારેક લાગણીઓ શબ્દોમાં નથી ઉતરતી,
પણ મૌનમાં ઘણું બધું બોલાતું જ હશે…
જેને આપણે નિર્જીવ ગણીએ છીએ,
કદાચ એ પણ અંદરથી રડતું જ હશે…
- શબ્દો_ની_પાર✍️
Sonam Brijwasi
“तेरा नाम लेते ही बदल जाता हूँ मैं,
किसी और का ख्याल आए तो जल जाता हूँ मैं…
प्यार है तुझसे बेहिसाब, ये मान ले,
पर तुझे खोने के डर से थोड़ा पागल भी हो जाता हूँ मैं…”
Ajit
મૂકવા આવે છે સ્નેહીજનો સ્મશાન સુધી મર્યા પછી પણ......
તમે તો પ્રેમના નામે બિનવારસી હાલતમાં છોડી દીધો ને સંતાઈ ગયા.....?
જિંદગી ની "યાદ"
Vibhuti Desai
નર્મદા તટે
શિવશરણે જતાં
ભાવિકો રાજી.
વિભૂતિ દેસાઈ ઘાસવાલા.
બીલીમોરા.
Rinal Patel
"તમને જે જોઈએ છેે એ તમને તમારી ક્ષમતા પ્રમાણે મળશે જ"
એવો અભિગમ તમનેે તમારી એ વસ્તુ તમને અપાવશે જ પણ જો ,
તમને જે જોઈએ છે એ વસ્તુ "હું એ મેળવીને જ રહીશ"
એવો અભિગમ તમનેે હાનિ પહોંચાડી શકે.
અંતરની દ્રષ્ટિએ.
Rinall.
Archana Singh
" खेल तो
क़िस्मत रही हैं ...
हमें तो
ज़माना बीत गया " ...!!
अर्चना सिंह ✍🏻
- Archana Singh
Rashmi Dwivedi
इतना भी कभी कुछ नहीं बिगड़ेगा कि तुम उसे ठीक ना कर पाओ हर हर महादेव ❤️
- Rashmi Dwivedi
Jyoti Gupta
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kattupaya s
Goodnight friends.. Thanks for the support towards my stories.
महेश रौतेला
इसी प्यार के कारण
हम फिर-फिर मिलते हैं,
इसी प्यार के कारण
हम फिर-फिर लड़ते हैं।
इसी प्यार के कारण
आँसू नित बहते हैं,
इसी प्यार के कारण सब
राधे-राधे कहते हैं।
इसी प्यार की अगुवाई में
दुनिया नित चलती है,
इसी प्यार की परछाई में
राधा अब तक बैठी है।
***
*** महेश रौतेला
Kiran
"सवार को सवारी चाहिए,
ये दुनिया का उसूल है,
पर हमें तो वो चाहिए,
जो दिल से कबूल है।"
-
Piyu soul
हमारी दोस्ती का सफ़र ✨
सफर में बहुत लोग मिले, कई बातें अधूरी रह गईं,
पर हमारी दोस्ती ने हर राह में रोशनी भर दी।
हँसी में, खामोशी में, दर्द में भी साथ खड़े रहे,
जैसे हर मौसम में फूल अपनी खुशबू छोड़ते हैं।
हौसले की एक छोटी सी आग, हमारी बातें और सपनों में जगती है,
हर गिरावट के बाद उठने की ताक़त हमें देती है।
ये दोस्ती सिर्फ़ नाम नहीं, एहसास है,
जो हर मुश्किल में मुस्कान और उम्मीद बनकर साथ रहती है। 💛
by piyu 7soul
Shivraj Bhokare
Winners find a way .
losers find an excuse..
Awantika Palewale
धड़कनों में तेरा नशा उतर आता है
साँस लेते ही दिल बहक सा जाता है
तेरी नज़रों की वो हल्की सी छुअन,
बिन पिए ही मुझमें जाम उतर आता है
रात चुपके से सिमट आती है बाहों में,
तेरा एहसास जब लिबास उतर आता है
होंठ ख़ामोश हैं, पर दिल की ज़ुबाँ से,
हर एक जज़्बात बेहिसाब उतर आता है
तू पास न हो फिर भी कमी महसूस नहीं,
इश्क़ बनकर तू हर पास उतर आता है
संभलना चाहूँ भी तो सम्भल ना पाऊँ,
तेरी यादों का खुमार लाजवाब उतर आता है
नाम तेरा जो लिया मैंने,,,,,,,,,,,
हर शेर में इश्क़ बेहिसाब उतर आता है
Paagla
https://youtube.com/shorts/PUKbsLOyDf0?si=fkPtxhAvc1ycH7u7
Sneha Gupta
🐦सबसे छोटी चिड़िया🐦
घोंसले की बगिया वो मेरी नगरी,
माँ का प्यार, बड़ों का दुलार,
घर की मैं सबसे छोटी चिड़िया।
बारिश की रुकावट मगर,
बड़े पेड़ों की छाया,
अपनों के साथ संसार जगमगाया।
जन्नत के पल या दुख का मेला,
मगर टहनियों ने हर समय घेरा,
घर की मैं सबसे छोटी चिड़िया।
Created by: Sneha Gupta
Grade: 10th
Preet
kash kite ohh beete ,
wele murh aavan ,
asi fer raha vich khrhiye ,
jitho tu lenge
- Preet
jighnasa solanki
લગ્નના ચાંદલામા આવેલો નવો ટ્રેન્ડ.....😜😜
લ્યો હવે આવા દિવસો પણ જોવા મળશે......
🤣🤣🤣🤣🤣🤣
SAYRI K I N G
काश तुम थोड़ी सी सांवली होती,
sayri king
और मैं तुम्हें Lakme cream देकर
impress कर लेता मगर तुम तो पहले से ही गोरी हो !!
Ruchi Dixit
जो थी वहीं हूं
मसला तो सारा होने का ही है,,,
- Ruchi Dixit
SAYRI K I N G
दिल करता है एक पत्थर पर लिखूं
I MISS YOU और वो पत्थर तुम्हारे सर पर दे मार....
ताकि तुम्हे भी पता चले कि तुम्हारी याद कितना दर्द देती है....
Ruchi Dixit
व्यवहारिक दृश्य का वास्तविक
सत्य से निराकरण तभी हो सकता है जब आत्मबोध हो ।
- Ruchi Dixit
SAYRI K I N G
Close the door gently. If it was love once, let it leave like love.
Keep walking with love.
Ruchi Dixit
पहली बार का भरोसा
और झूठ स्थाई हो जाता है
सच के लिए हम कुछ दूर
चल तो पड़ते हैं ट्रेन के
डिब्बे की तरह मगर
पूर्ण संतुष्टि न होने पर
इंजन बार - बार रुकता
है और अनुकूलता पटरी
तोड़ने काम करती है ,,,
- Ruchi Dixit
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