Gujarati Whatsapp Status | Hindi Whatsapp Status
SAYRI K I N G

अच्छा है खूबसूरत होने का बिल नहीं आता.. वरना आप तो कर्ज में डूब जाते..

Narayan

अंदर तबाही मचा देते हैं वे जज़्बात… जिन्हें हम किसी के नाम से जोड़ देते हैं। जब प्रेम अधूरा रह जाता है, तो वह खत्म नहीं होता… वह और गहरा हो जाता है। अकेले कमरे की खामोशी में वही चेहरा दीवारों पर उभरता है, वही आवाज़ कानों में गूंजती है, और दिल पूछता है — “क्यों नहीं मिला मुझे पूरा?” लेकिन सुनो… प्रेम कभी अधूरा नहीं होता, अधूरी होती है हमारी चाह — किसी को पाने की, किसी पर अधिकार की। जिसे तुम विरह समझती हो, वह भी प्रेम का ही दूसरा रूप है। मिलन में प्रेम बाहर बहता है, विरह में प्रेम भीतर उतरता है। अकेलापन शत्रु नहीं है, वह तुम्हें तुम्हारे पास लाने आया है। तुम जिसे खोने से डरती हो, वह तो पहले ही तुम्हारे भीतर बस चुका है। वह तुम्हारी सुगंध बन जाएगा। 🌸

Priya kashyap

सवाल---> प्यार क्या हैं। जो बस हो जाए बगैर जाने किस के पास क्या हैं,कौन कहाँ से हैं किस देश से हैं।किस रंग किस मजहब का हैं,जब किसी चीज से कोई फर्क ही ना पड़े, और बस उस एक शख्स की फिक्र रहने लगे,जिसके लिए आप सबकुछ खोने के लिए एक पल भी ना सोचे,जिसके होने भर से सबकुछ ठीक लगने लगे,और जब वो ना हो तो दुनिया वीरान हो जाए, तब समझ लीजिए की आपको सच में प्यार हो गया हैं। Priya_

Ruchi Dixit

मैंने माँगा कुछ नहीं सिवाय इसके कि जो मेरा नहीं वो मुझमे हो-Ruchi Dixit

મનોજ નાવડીયા

कैसी जिंदगी, वो मुझे देखे, मैं उसको देखु.. मनोज नावडीया

Arun

“the habit of the cocktail hybrid”

Falguni Dost

શબ્દો જ્યારે મૌન થાય છે... દોસ્ત! ભીતરનો ખાલીપો ખળભળાટ મચાવે છે. - ફાલ્ગુની દોસ્ત

Narayan

“जिसे तुम प्रतिदिन स्मरण करते हो, धीरे-धीरे वैसे ही बन जाते हो।” मन एक रिकॉर्डिंग मशीन की तरह है। जिस विचार को हम रोज़ दोहराते हैं, वही हमारी सोच, भावनाओं और फिर व्यवहार का हिस्सा बन जाता है। अगर हम बार-बार कमी, शिकायत या दुख को याद करते हैं, तो हमारा व्यक्तित्व भी वैसा ही बनता जाता है। और यदि हम शांति, प्रेम, शक्ति और ईश्वर के गुणों का स्मरण करते हैं, तो वही गुण हमारे अंदर प्रकट होने लगते हैं। स्वयं का आत्मा-स्वरूप का स्मरण करते ही भीतर शांति का अनुभव होने लगता है — क्योंकि स्मरण से ही चेतना की दिशा तय होती है। “भय को थामोगे तो भीतर सिमट जाओगे…” भय का स्वभाव है संकुचित करना। जब मन डर में रहता है, तो व्यक्ति निर्णय लेने से डरता है, अपने गुणों को व्यक्त नहीं कर पाता, और ऊर्जा सिकुड़ जाती है। भय हमें रक्षात्मक बना देता है — जैसे कोई खोल में छिप जाए। “ईश्वर को याद रखोगे तो चेतना ऊँची उठेगी।” ईश्वर का स्मरण आत्मा को उसकी मूल पहचान से जोड़ देता है। जब हम परमशक्ति को याद करते हैं, तो हमें सुरक्षा, शक्ति और पवित्रता का अनुभव होता है। चेतना ऊपर उठने का अर्थ है — परिस्थितियों से ऊपर उठकर देखना, प्रतिक्रियाओं से मुक्त होना, और व्यापक दृष्टि रखना। याद की दिशा बदलते ही अनुभव की गुणवत्ता बदल जाती है। स्मरण से विचार बनता है विचार से संस्कार बनता है संस्कार से व्यक्तित्व बनता है इसलिए प्रश्न यह नहीं कि हम क्या बनना चाहते हैं, प्रश्न यह है कि हम रोज़ किसे याद कर रहे हैं। ओम शांति।

Nency R. Solanki

જેટલા તમે ઉપલબ્ધ છો, એટલા જ મુખ્યવિહીન છો! - Nency R. Solanki

Dhara K Bhalsod

ભીતરમાં ભરેલા ઊંડાણ વાંચો... શબ્દો તો માત્ર બંધબેસતી ગોઠવણી છે... - Dhara K Bhalsod

Paagla

https://youtube.com/shorts/tJbOVtqxbgc?si=PAOhyAZoV1JXAXEK

kashish

vo dekhne mai achcha sa lagta hai ... use dekhne ke baad kuch achcha hi nhi lagata vo itna achcha lagata hai... use mai koi fhool nhi khugi kyuki ek din vo bhi murjha jata hai... mai use chand bhi nhi khu gi kyuki vo bhi kbhi kbhi hota hai ... na mai use parchhai khu gi kyuki vo bhi roshni mai hota hai ... vo to mere liye shiv ke jta hai jisme mai uski ganga hu... mai raat or vo mera durv tara hu ... by kashish

वात्सल्य

તમને શું શું ગમે,ભાવે, તે કહો તો ખબર પડે ! વગર ભાવતું પીરસાય તો એંઠ અને જૂઠ પડે - वात्सल्य

A singh

कफ़न भी हल्का लगता है उस दर्द के आगे, जो तेरी खामोशी ने सीने में उतारा है। मर कर भी सुकून न मिला इस दिल को, क्योंकि हर धड़कन ने तेरा नाम पुकारा है। _ A singh

khwahishh

"मेरी आदतों के हबाले से तूने अपने मनसूबे तमाम पुरे किये है। तू सोबत ही सरीफ रहा ज़माने के सामने। हम थे की तेरे खातिर दुनिया भर मैं बदनाम हुए है। फिर भी हर दफा तेरे नापाक इरादों के शिकार हम ही किये गए है।" - khwahishh

A singh

​खामोश रहकर भी हम अपनी बात कह देंगे, जुदाई का ये ज़हर भी हंसकर पी लेंगे। ​जब मान लिया है कि तुम हमारे नहीं हो, तो अब हम भी अपनी तन्हाई में जी लेंगे। _ A Singh

khwahishh

"अकशर चाहे न चाहे तेरी याद से, मुलाक़ात हो जाती है मेरी। मसलन मैं उलझन मैं रहती हूं, की बो आई क्यों है।" - khwahishh

khwahishh

"ना सांस आती मैं ना सांस जाती मैं, तेरी खुशबु अब है समाती। खाली सा धड़के है सीने मैं दिल मेरा, धड़कन की आवाज ना अब है आती। तेरी खुदाई का ये केसा कहर है,याद है तेरी या कोई जहर है।" - khwahishh

A singh

​🥀 आख़िरी ख़त: विदाई के नाम 🥀 ​"ये खत नहीं, मेरे दिल के टुकड़े हैं जो तुझे लिख रही हूँ, ✍️ अपनी खुशियों की विदाई का मंजर खुद देख रही हूँ। 🥺 बहुत कोशिश की मैंने, अपनों को मनाने की बहुत मिन्नतें कीं, 🙏 पर माँ-बाप की ज़िद और भाई की लाज के आगे घुटने टेक रही हूँ।" 💔 ​"वो नहीं मान रहे, उन्हें मेरी पसंद की परवाह नहीं, 🚫 उनके फैसले के आगे अब मेरा कोई बस नहीं। 😔 मजबूरी में बंध रही हूँ किसी और के अटूट बंधन में, ⛓️ पर इस रूह पर किसी और का कभी अधिकार नहीं।" 💍❌ ​"इस जनम में तो साथ मुकद्दर में नहीं लिखा था हमारे, ⛈️ पर वादा है मेरा, हर सांस अब भी कटेगी नाम पर तुम्हारे। 💓 अगले जनम में खुदा से सिर्फ तुझे ही मांग कर आऊंगी, ✨ तब तक के लिए विदा, ओ मेरे दिल के सबसे प्यारे।" 👋😭 ​🥀 अंतिम विदाई का दर्द 🥀 ​"बिछड़ रही हूँ तुझसे, पर धड़कन तेरे पास छोड़ जाऊंगी, ❤️‍🩹 अपनी हर अधूरी ख्वाहिश का हिसाब अगले जन्म पर छोड़ जाऊंगी। ⏳ लोग कहेंगे कि मैं किसी और की दुल्हन बनकर चली गई, 👰‍♀️ पर मैं अपनी रूह की वफ़ा, सिर्फ़ तेरे नाम पर छोड़ जाऊंगी।" 🕊️🌹

khwahishh

"शीशे और दर्पण मैं एक ही फर्क होता है। शीशे से पूरी दुनिया की हकीकत दिखती है। और दर्पण मैं खुद की।" - khwahishh

khwahishh

“ जाने किन गलियों मैं बसर कर रहा है। ये दिल आज कल कश्तीयों मैं सफर कर रहा है। मंजिल की फ़िक्र छोड़ राहों की कद्र होने लगी है इसे। अब थकने की सूरत ही कहाँ है, इस्पे लहरों का असर चढ़ गया है।“️ - khwahishh

khwahishh

एक लम्हा ठहरा आके मेरे दर पे .. मेने पूंछा उससे... ऐ लम्हे! मुद्दतों बाद तुझे ये लम्हा मिला है, फुर्सत से बिताने को,तू क्यों आके मेरे दर पे ठहरा है। लम्हे ने कहा... सुनो! कितनी उम्रो की दुआओ का असर आजमाया है, बड़ी मुद्दतों के बाद मेने मेरे महबूब के दर पे बसर पाया है। क्यों पूंछा तूने ये सबाल,मे समझ नहीं पाया, एक तू ही तो है। जिसने मुझ फुर्सत – ऐ – बक्त को याद फ़रमाया है। - khwahishh

khwahishh

" दफा-ए-इश्क के तहत हम तेरे गुलाम करार किये गये है जुरम ये था... की तुझको अपने दिल का आईना बना बैठे थे। दिल तूने चुराया और गुन्हेगार हमें ठहराया गया ।“ - khwahishh

SAYRI K I N G

रक़ीब जो फेंकेगा तुझपर, वो रंगों की धार मुबारक, मुझको मेरा हाल मुबारक, तुझको ये त्योहार मुबारक।

archana

✨ “आख़िर बहू ही बुरी क्यों?” ✨ बहू बुरी नहीं होती… बस वो सबकी उम्मीदों का जोड़ नहीं बन पाती। ससुराल में हर व्यक्ति की अपनी सोच होती है, अपना नजरिया, अपनी कल्पना— किसी को संस्कारी बहू चाहिए, किसी को कम बोलने वाली, किसी को कमाने वाली, किसी को सेवा करने वाली, और किसी को बस चुप रहने वाली… पर एक इंसान सबके दिमाग की बनाई तस्वीर कैसे बन सकता है? जब बहू उन सब “अलग-अलग दिमागों” से मेल नहीं खाती, तो उसे नाम दे दिया जाता है— “बुरी बहू”। सच तो ये है— बहू सिर्फ ससुराल में बुरी कहलाती है। मायके में वही बेटी अच्छी होती है। दोस्तों में वही सच्ची होती है। मोहल्ले में वही मुस्कुराती हुई दिखती है। लेकिन घर के अंदर… छोटी सी बात को बड़ा बना दिया जाता है, आधी बात को पूरा कर दिया जाता है, और फिर मोहल्ले में कहानी सुनाई जाती है— “बहू बहुत बुरी है…” इतना झूठ, इतनी सजावट, इतना बढ़ा-चढ़ा कर बयान— कि सच कहीं कोने में चुप बैठ जाता है। क्योंकि सच बोलने के लिए हिम्मत चाहिए… और कहानी बनाने के लिए बस ज़ुबान “बहू बुरी नहीं होती, वो बस सबकी अलग-अलग उम्मीदों में फिट नहीं बैठ पाती।” - archana

Falguni Dost

અહીં તહી હવે સુખ શોધતી નથી શાંતિની આશમાં ભીતર બાળતી નથી કરશે એ કસોટી શકય એટલી દોસ્ત! કર્મથી ઈશને બાંધી..ભીખ હવે માંગતી નથી. - ફાલ્ગુની દોસ્ત

PRASANG

અપૂર્ણ જીવન.!!! મૃત્યુ નાશ નથી, તે તો પરિવર્તન છે. નાશ તો ત્યાં છે જ્યાં ચેતના હોવા છતાં જાગૃતિ નથી. શરીર શ્વાસ લે, પણ “હું” સૂતું રહે, એ જીવન નથી, માત્ર ગતિ છે. જે ક્ષણે કામના જીવતી રહે અને અનુભૂતિ મરી જાય, ત્યાં જીવન અપૂર્ણ બને છે. મરણ એક ક્ષણનું વિસર્જન છે, પણ અજાગૃત જીવન દીર્ઘ બંધન છે. જે જીવ્યો નથી, તે મરતો પણ નથી, તે માત્ર અટકેલો રહે છે. આત્મા ન મરે, પણ અજાગૃત આત્મા જીવનને અધૂરો છોડી દે છે. પ્રસંગ પ્રણયરાજ રણવીર

Shailesh Joshi

"સાંખી લેવું" એ સારા સમય સુધી ઝડપથી પહોંચવા માટેનો "ટૂંકો રસ્તો છે" જ્યારે સામો જવાબ આપવો, કે ખોટું લગાડી બેસી જવું, એ મુખ્ય માર્ગ છોડી, "વારંવાર" "અવડો રસ્તો પકડવા જેવું છે" - Shailesh Joshi

Narayan

आना किसी रोज ख्वाबों से निकल कर हकीकत में बैठना मेरे पास मैं सुनाऊँगा तमाम नज्में जिनको मैं लिखता हूँ सिर्फ तुम्हारे लिए, सुनना हर अहसास को ताकी देख सकूँ उस वक्त तेरे चेहरे को सुन सकूँ तेरी धड़कनों को महसूस कर सकूँ उस प्रेम को संग तेरे..!!

Kaushik Dave

વક્તનો આ માર છે, જિંદગી બદલાય છે, કસોટી કરે છે ઈશ્વર, શું નૈયા પાર થશે? બદલાવ આવે જીવનમાં, સુખ શાંતિ ક્યાં છે? ગુમાવી દીધેલાની યાદીમાં જ, જિંદગી જ જાશે? અંધારાની આ ઓથમાં, આશાનું કિરણ ક્યાંક હશે, પડકારોના આ પથ પર, હિંમત જ સાથ દેશે. -કૌશિક દવે

Narayan

तुम्हारा स्पर्श साधारण नहीं था। वह जैसे आत्मा तक उतर जाने वाली कोई मौन स्वीकृति थी । महसूस करते हुए उसी क्षण जान लिया कि यह मात्र स्पर्श नहीं, प्रेम का उच्चार है कुछ स्पर्श क्षण भर में विलीन नहीं होते, वे हृदय के उस कोने में अपना स्थायी घर बना लेते हैं, जहाँ उदासी के समय सबसे अधिक सहारे की आवयश्कता होती है..!!

Narayan

एक स्त्री चाहिए जिसके समक्ष मैं सिर्फ तन से नहीं मन से भी नग्न हो सकूँ उतार फेंकूँ सारे मुखौटे भूला सकूँ पुरुष होने का दम्भ रो सकूँ जार जार जिसे कह सकूँ पुरुष हूँ मगर पीड़ा अनुभव करता हूँ चाहता हूँ बिल्कुल माँ की तरह तुम फेर दो हांथ बालों पर गालों पर पुरूष होते हुए भी कांधा चाहिए कभी कभी मुझे भी, सिर्फ चमकता दमकता बदन ही नहीं एक स्त्री चाहिए जिसे प्रेम करते हुए पूजा भी कर सकूं वासना से नहीं श्रद्धा से जिसके चरणों को चूम सकूँ जिसके स्पर्श मात्र से पुलकित हो उठे रोम रोम मेरा कर दूं पूर्ण समर्पण विगलित हो अस्तित्व मेरा मैं नारी बन जाऊं वो पुरुष बन जाएं उसमें मैं नजर आऊँ वो मुझमें नजर आएं हम शंकर का अद्वैत हो जाएं, एक स्त्री चाहिए जिसे मैं उस तरह प्रेम कर सकूँ जिस तरह एक स्त्री प्रेम करती है..!!

Narendra Parmar

जरुरत से ज्यादा मोहब्बत करना यानी कि पागल होने का खतरा ! जरुरत से ज्यादा मिठा खाना यानी कि डायाबिटीस का खतरा ! इसीलिए लिमीट में रहिए शुकुन से जिंदगी जाएगी ! और मौत भी आपकों कम तड़पाएगी ।। नरेन्द्र परमार ✍️

Sicret super Star

"જ્યારે મનમાં 'મારું-તારું' અને 'સ્વાર્થ' ના વાયરસ ઘૂસી જાય ને, ત્યારે સમજવું કે અંદર મહાભારત શરૂ થવાની તૈયારી છે."

Ruchi Dixit

शब्दों के पहाड़ पर चढ़ने के क्या मतलब जब एक शब्द बनाने और मिटाने को काफी हो । - Ruchi Dixit

PRASANG

हम काटने लगे हैं। हम अब रोते नहीं साहब, हम काटने लगे हैं- शब्दों से, नज़रों से, सीधे सच से। क्योंकि बहुत देर तक सहने वाला एक दिन पूछना सीख लेता है। किसान जब खामोश होता है, तो समझो- तूफ़ान खेत में नहीं, सीने में उग रहा है। धरती धैर्य रखती है- पर अपमान नहीं। मज़दूर की हथेली अब सिर्फ़ छाली नहीं, सबूत है- कि ये देश उसकी मेहनत से चलता है, और फिर भी उसे चलने नहीं देता। औरत अब डर से नहीं काँपती, वो ग़ुस्से से स्थिर होती है। जिस दिन उसकी आँख सीधी हो गई, उस दिन किसी की मर्दानगी काम नहीं आएगी। कर्मचारी अब फ़ाइल नहीं पलटता, वो अपने भीतर का ज़मीर पलटता है। और ज़मीर जब भारी हो जाए, तो कुर्सियाँ हल्की पड़ जाती हैं। विद्यार्थी अब भविष्य नहीं पूछता- वो वर्तमान को कटघरे में खड़ा करता है। और सवाल जब ठीक से खड़े हो जाएँ, तो झूठ बैठ जाता है। हमें समझाया गया- शांत रहो। लेकिन किसी ने नहीं बताया कि शांति की भी एक हद होती है, उसके बाद वो कायरता कहलाती है। हम अब डर को पहचानते हैं। वो ऊपर नहीं रहता- वो भीतर डाला जाता है। और जो भीतर डाला जाए, उसे बाहर फेंका जा सकता है। हम भीड़ नहीं हैं। हम वो लोग हैं जो बहुत देर तक चुप रहे- और अब हर शब्द वजनदार बोलते हैं। हमारी आवाज़ अब चीख नहीं, फ़ैसला है। हमारी चाल अब हिचक नहीं, इरादा है। हमें रोकने की कोशिश मत करना। हम भाग नहीं रहे- हम आ रहे हैं। क्योंकि जिस समाज ने अपने आम आदमी को खुद पर गर्व करना सिखा दिया, उसे कोई सत्ता लंबे समय तक झुका नहीं सकती। आज हम कहते हैं- शांति हमारी पसंद है, कमज़ोरी नहीं। और अगर इंसान होना अपराध है, तो हाँ- हम अपराधी हैं। हम कटेंगे नहीं। हम बिकेंगे नहीं। और अब हम मिटेंगे नहीं। क्योंकि अब हमारे भीतर डर नहीं- टकराव है। "प्रसंग" प्रणयराज रणवीर

Falguni Dost

કોઈના ચહેરાનું આંસુ નહી સ્મિત બનો, દોસ્ત! વ્યક્તિ ભૂલી જશે પણ કુદરતના ચોપડાનું નામ ન બનો. - ફાલ્ગુની દોસ્ત

SAYRI K I N G

प्यार का चक्कर मतलब मोत से टक्कर

Sicret super Star

।। અંતરનું કુરુક્ષેત્ર ।। ધર્મક્ષેત્રે કુરુક્ષેત્રે, આ મનનું મેદાન છે, બહાર નથી કોઈ યુદ્ધ, આ તો ભીતરનું ઘમસાણ છે. આંખે અંધાપો નથી, પણ મોહ તણાં પળડા છે, અંદર બેઠો ધૃતરાષ્ટ્ર પૂછે, "કોનું કેટલું બળ છે?" 'મામકાઃ' કહીને જેને પકડ્યું, એ માયાનો જાળ છે, 'પાંડવ' રૂપી સત્ય સામે, ઉભો ખુદનો કાળ છે. સંજય રૂપી સમજણ જો હોય, તો દ્રશ્ય સાફ દેખાય, બાકી સ્વાર્થના અંધારામાં, આખું જીવન વેડફાય. રથ નથી કે રથી નથી, નથી કોઈ હથિયાર, વિચારોના ચક્રવ્યૂહમાં, અટવાયો સંસાર. પહેલો શ્લોક આ ગીતાનો, પ્રશ્ન એક પૂછે છે, તું કોના પક્ષે ઉભો છે? એ જ તને પૂછે છે. ધર્મક્ષેત્રમાં જીતવા, 'હું' ને 'મારું' ત્યાગવું પડશે, કૃષ્ણના એ મૌન પૂર્વે, પોતે જ જાગવું પડશે. યુદ્ધ આ તો ચાલશે, જ્યાં સુધી શ્વાસ છે, સત્ય જીતશે અંતમાં, બસ એ જ એક વિશ્વાસ છે.

Dada Bhagwan

અહિંસા જેવું કોઈ બળ નથી અને હિંસા જેવી કોઈ નિર્બળતા નથી. આ દુનિયામાં નિર્બળ કોણ? અહંકારી. આ દુનિયામાં સબળ કોણ? નિર્‌અહંકારી. - દાદા ભગવાન વધુ માહિતી માટે અહીં ક્લિક કરો: https://dbf.adalaj.org/kAhya03t #quoteoftheday #spiritualquotes #quotes #spirituality #DadaBhagwanFoundation

Chaitanya Joshi

શિવદરશનની લગની લાગી મને. શિવચરણમાં થયો અનુરાગી. શિવકૃપાથી ભક્તિ મળે જો, સુકૃત ભવોભવનાં ફળે જો. અંતરે ઝંખના શિવની જાગી...1. નાથ દયાનિધિ દયા કરો હવે, સમય મારો છે ખરેખરો હવે રોમેરોમ મારું દરશન માગી...2 નાથ ભોળા નયન જોને તરસે, સન્મુખ આવોને નયન વરસે. ઉરની આરત અદભુત લાગી...3 દેવ દિલાવર એટલું આપો, અંતરે સ્મરણ શિવનું સ્થાપો. આશાને તૃષ્ણા જાય હવે ભાગી..4 - ચૈતન્ય જોષી. " દીપક " પોરબંદર.

Tr. Mrs. Snehal Jani

બન્યું જીવન સરળ, વધી ભૌતિક સુખ સગવડો. આભારી છે વિશ્વ આખુંય, વિજ્ઞાનની શોધોને! નુકસાન છે અને ફાયદા પણ છે, વિજ્ઞાનની આ શોધોનાં! કરીએ જો ઉપયોગ વિવેકપૂર્વક, વિજ્ઞાન સદાય ફાયદાકારક! મહાન વૈજ્ઞાનિક શ્રી સી. વી. રામને કરી શોધ રામન ઈફેક્ટની આજનાં દિવસે. માનમાં એનાં ઉજવાય 28 ફેબ્રુઆરીનો દિવસ, 'રાષ્ટ્રીય વિજ્ઞાન દિવસ' તરીકે.

Ruchi Dixit

“मैं” के कीड़े ने काटा है मुझे जहर उतरता ही नहीं । - Ruchi Dixit

Ruchi Dixit

मैं कुछ नहीं करती यह करने के बाद होता है मालूम दूसरे का भार उठा पीड़ित रहती हूं ऐसे ही मैं सुख नहीं दुख और पीड़ा चुनती हूं । - Ruchi Dixit

Bhatt Bhavin

જો ગઝલ ગમે સાંભળવી તો Instagram માં આવી શકો છો...m_saheb_18 I'd છે મારી.....

SADIKOT MUFADDAL 《Mötäbhäï 》

હું બધું જ લઈને આવીશ પ્રેમ, સમર્પણ, જ્ઞાન, મર્યાદા, સંસ્કાર,વિવેક તું તારી અલમારી નહીં તારું હૃદય ખાલી રાખજે... - SADIKOT MUFADDAL 《Mötäbhäï 》

Ruchi Dixit

मैं सतह पर नहीं ! बाते सतही नही!! मगर मैं फिर भी गहराई नहीं जानती खुद में खुद की । हैरान होती हूँ अक्सर पीछे मुड़कर देखती हूं जब खुद आचार व्यवहार परिवर्तन को तब लगता है मैं कहीं हूं ही नहीं।। - Ruchi Dixit

Imaran

“ग़म की बारिश में भीगते हैं अक्सर वो लोग, जो मुस्कान में भी दर्द छुपा लेते हैं 💔imran 💔

Sicret super Star

સમયની રેત પર ડગલાં માંડતો હું જતો હતો, પોતાના જ સપનાના આકાશમાં રાચતો હતો. ત્યાં અચાનક નસીબે એક નવી ચાલ ચાલી, જીવને મારી સામે એક કઠિન પરીક્ષા આણી મેલી! લાગ્યું કે હવે હારી જઈશ, હવે થાકી જઈશ, અંધકારના આ સાગરમાં ક્યાંક ડૂબી જઈશ. પરિચિત ચહેરાઓ પણ હવે અજાણ્યા લાગતા હતા, મારી હિંમતના પાયા જાણે અંદરથી હલતા હતા. પણ એ જ ક્ષણે ભીતરેથી એક અવાજ આવ્યો, "તું હારવા માટે નહીં, પણ લડવા માટે જન્મ્યો!" મેં મુસીબતોની આંખમાં આંખ મિલાવી, હારની બીક છોડી, જીતવાની એક જીદ જગાડી! જેમ સોનું અગ્નિમાં તપીને કુંદન બને છે, તેમ માનવી પણ સંઘર્ષમાં તપીને જ મહાન બને છે. દરેક ઘા મને નવું સત્ય સમજાવતો ગયો, પરીક્ષાનો આ રસ્તો જ મને અંદરથી ઘડતો ગયો. ઓ દુનિયાના લોકો, આ મારો અનુભવ છે ખાસ, મુશ્કેલીમાં ક્યારેય ના છોડવો પોતાનો વિશ્વાસ. પડીને ઉભા થવું, એ જ સાચી વીરતાની વાત છે, હારવું એ અંત નથી, એ તો નવી શરૂઆત છે! "જ્યારે દુનિયાના દરવાજા એક પછી એક વસાતા ગયા, ત્યારે જ મારા પોતાના હૃદયના દ્વાર ઉઘડતા ગયા. એકલતામાં જ મને મારી અસલી તાકાતની પરખ થઈ, ભીડમાં જે ખોવાયેલું હતું, એ પોતાની જ ઓળખ થઈ. શીખ્યો હું કે દીવો ભલે નાનો હોય પણ અંધકાર સામે લડે છે, સંઘર્ષમાં એકલો હોવા છતાં, જે લડે છે એ જ ચઢે છે." "મેં જોયું છે કે રાત ગમે તેટલી કાળી ને લાંબી હોય, સવારના પહેલા કિરણ પાસે એને હંમેશા હારવું પડે છે. નદી પથ્થરો સાથે ભટકાઈને જ પોતાનો લય મેળવે છે, કુદરત પણ એને જ કસે છે, જે જીતવાની ક્ષમતા ધરાવે છે. દરેક આંસુમાં મેં આવતી કાલની મુસ્કાન છુપાયેલી જોઈ, કસોટીના એ તાપમાં જ મેં મારી નબળાઈઓ ધોઈ."

Hardik Boricha

जीने वालों से भी पूछो कि वह कैसे ज़िन्दा है, मरने वाले का तो सब पूछते है कैसे मरा...💔

Parag gandhi

*जिनको सपने देखना अच्छा लगता है* *उन्हें रात छोटी लगती है!* *और जिनको सपना पूरा करना अच्छा लगता है* *उन्हें दिन छोटा लगता है!!* *🙏प्रांत :वंदनम 🌹🙂☕*

Mahima Ganvit

જેને જોવાથી ચહેરા પર સ્મિત આવી જાય છે. જેની એક ઝલકથી મન પ્રફુલ્લિત થઈ જાય છે. જે મારા કાળજાનો કટકો છે... એ છે.. મારી વ્હાલી દીકરી Niya..... - Mahima Ganvit

Hardik Boricha

मुझसे रूठे रहते हैं अब सारे ही त्यौहार बहुत रोज़ मनाता हूँ तुमको मैं और उनको बस कभी कभी!! ❤️🤍 हैप्पी होली 💕

kajal jha

रिश्ते हैं किताबों की तरह, कुछ पल में पढ़े जाते, कुछ जीवनभर दिल में बस जाते हैं। जो समझ पाए उसे ही मिलती सच्ची दोस्ती, वरना हर चेहरा सिर्फ़ दिखता है एक परछाई की तर - kajal jha

Hardik Boricha

एक रंग मोहब्बत का अपने गालों पर सजा लेना जो रंग तुम्हें पसंद आए मेरे नाम का भी लगा लेना..!! हैप्पी होली 💕 ·—·—·—·—🖤🖤—·—·—·—·

Hardik Boricha

अपने महबूब को गजल में सवारूँ कैसे वो मेरे ख्याल से बढ़कर खूबसूरत हैं...❤️

Chaitanya Joshi

શબ્દોને સજાવ્યા કરો ક્યારેક ક્યારેક. અર્થોને ઘટાવ્યા કરો ક્યારેક ક્યારેક. રોજરોજ નિતનવી સમસ્યા આવવાની, તોય મુસ્કુરાયા કરો ક્યારેક ક્યારેક. સપનાની દુનિયા બને યા ન પણ બને, છતાંયે ધૈર્ય ધર્યા કરો ક્યારેક ક્યારેક. હરપળ હોય હરિ હારે એ ના ભૂલાય, કર્મપથ પર ધપ્યા કરો ક્યારેક ક્યારેક. બગાસું ખાતાં પતાસું મુખે ના આવે તો, મંજિલ લગી ડગ ભર્યા કરો ક્યારેક ક્યારેક. - ચૈતન્ય જોષી. " દીપક " પોરબંદર

Hardik Boricha

बड़े बेरहम होते हैं.... ये मनपसंद लोग....!! जितना ऊनको चाहो...!! ऊतना तडपाते है...!! ❣️❣️

Dr Darshita Babubhai Shah

मैं और मेरे अह्सास सोचना क्या सोचना क्या जो भी होगा सब अच्छा ही होगा l जो तुने सोचा है वह रास्ता सच्चा ही होगा ll दर्द का एहसास भी क्यूँ हो नहीं सकता कि l प्यार तूझे जब हुआ होगा कच्चा ही होगा ll बात सब बचकानी सी लगती है क्यूँकी वो l सोचने के लिए समझने को बच्चा ही होगा ll "सखी" डो. दर्शिता बाबूभाई शाह

वात्सल्य

દરેક જનેતા પોતાના બાળકને કાનુડો સમજે છે.એજ "કાનુડાને" પરણાવ્યા બાદ પરણી લાવેલી કન્યાનો "કહ્યાગરો કંથ" બની જાય તેનો વાંધો નથી.અને તે કાનુડાને પરણાવ્યા ત્યાં સુધી તેનું મેલું ગંદુ ધોઈ સાજે-માંદે સંભાળ સાથે ઉજાગરા કરી,કક્કા ના 'ક' થી 'કોલેજ' સુધી બારાખડી ઘૂટાવી ઉછેર કીધા બાદ એ કપૂત કેમ થતો હશે !!! (આ એવા પુત્ર/પુત્રીઓ માટે છે,જે માઁ-બાપને કહેછે છે કે "તમે મારા માટે શું કર્યું?") . - વાત્સલ્ય

Ajit

આ વખતે એ મજાની હોળી મારી સાથે રમી ગયા..... એકલતાનો રંગ એ મને ખુબ મજાનો લગાવી ગયા..... જિંદગી ની "યાદ"

S Sinha

यह भी प्रार्थना है - <br /> <br /> प्रार्थना केवल मंदिरों में घुटनों के बल झुक कर हाथ जोड़ना या कभी साष्टांग प्रणाम करना या प्रसाद और फूलमाला चढ़ाना नहीं होता है . अक्सर इसके बदले हम भगवान् से कुछ माँग भी लेते हैं . सकारात्मक सोच के साथ दूसरों के लिए अच्छा सोचना भी प्रार्थना है . जब हम किसी दुखी को गले लगाकर उसके दुःख का कारण पूछते हैं या सम्भव हुआ तो दुःख बांटने की कोशिश करते हैं तो यह भी प्रार्थना है .

GANESH TEWARI 'NESH' (NASH)

दोष न देखे अन्य का, रखे और का मान। वही पुरुष इस जगत में, पाता है सम्मान।। दोहा --४३५ (नैश के दोहे से उद्धृत) -----गणेश तिवारी 'नैश'

GANESH TEWARI 'NESH' (NASH)

ऋगुवेद सूक्ति--(२५) की व्याख्या मंत्र (ऋग्वेद १/१४७/३) “दिप्सन्त इद्रिपवो नाहदेभुः …” अर्थ-- से प्रभु ! शत्रु आपके दास को नहीं दबा सकते। यह मंत्र ऋग्वेद के प्रथम मण्डल, १४७वें सूक्त, तृतीय मंत्र में आता है। पद–विश्लेषण (संक्षेप में) दिप्सन्त – हानि करने की इच्छा रखने वाले इद् रिपवः – ये शत्रु न आह देभुः – दबा नहीं सकते / पराजित नहीं कर सकते भावार्थ-- हे प्रभु! जो दुष्ट और शत्रुजन हानि पहुँचाने की इच्छा रखते हैं, वे आपके भक्त/सेवक को दबा या पराजित नहीं कर सकते। आपकी कृपा और संरक्षण से साधक निर्भय रहता है। गूढ़ अर्थ-- यह मंत्र बाह्य शत्रुओं के साथ-साथ आन्तरिक शत्रुओं—काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि की ओर भी संकेत करता है। जब साधक ईश्वर में श्रद्धा और समर्पण रखता है, तब कोई भी नकारात्मक शक्ति उसे स्थायी रूप से परास्त नहीं कर सकती। इसके समर्थन में उपनिषदों से प्रमाण प्रस्तुत हैं: १. कठोपनिषद्- २.२.१३ मंत्र: “नायमात्मा बलहीनेन लभ्यः…” भावार्थ: यह आत्मा निर्बल पुरुष को प्राप्त नहीं होता। जो साधक आन्तरिक बल (श्रद्धा, संयम, पुरुषार्थ) और ईश्वर-आश्रय से युक्त है, वही आत्मज्ञान प्राप्त करता है। ऐसे ज्ञानी को कोई शत्रु परास्त नहीं कर सकता। २. मुंडकोपनिषद्- ३.२.९ मंत्र: “ब्रह्मविद् ब्रह्मैव भवति।” भावार्थ: ब्रह्म को जानने वाला स्वयं ब्रह्मस्वरूप हो जाता है। जब साधक ब्रह्म में स्थित हो जाता है, तब बाह्य या आन्तरिक कोई शत्रु उसे विचलित नहीं कर सकता। ३. तैत्तिरीयोपनिषद्- २.९ मंत्र: “यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह।” भावार्थ: जिस परमात्मा को वाणी और मन भी प्राप्त नहीं कर सकते, उसी के आश्रय में स्थित ज्ञानी भय से मुक्त होता है। अर्थात् ब्रह्मानुभूति से भय और शत्रुता का नाश हो जाता है। ४. बृहदारण्यकोपनिषद्- १.४.२ मंत्र: “द्वितीयाद् वै भयम् भवति।” भावार्थ: द्वैत (दूसरे का भाव) से ही भय उत्पन्न होता है। जो अद्वैत ब्रह्म में स्थित है, उसके लिए कोई दूसरा (शत्रु) शेष नहीं रहता; अतः वह अभय हो जाता है। ५.. श्वेताश्वतरोपनिषद्- ३.८ मंत्र: “तमेव विदित्वाऽतिमृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय।” भावार्थ: उसी (परमेश्वर) को जानकर मनुष्य मृत्यु और भय से पार हो जाता है; मुक्ति का अन्य मार्ग नहीं है। अर्थात् ईश्वर-ज्ञान से समस्त भय और शत्रुता का अतिक्रमण होता है। ६. ईशोपनिषद्- ६–७ मंत्र: “यस्मिन् सर्वाणि भूतान्यात्मैवाभूद् विजानतः। तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः॥” भावार्थ: जिस ज्ञानी को सब प्राणी अपने ही आत्मस्वरूप प्रतीत होते हैं, उसके लिए न मोह है, न शोक। जहाँ एकत्व-दृष्टि है, वहाँ शत्रुता और भय टिक नहीं सकते। ७ .छान्दोग्योपनिषद्- ७.१.३ मंत्र (भाव): “आत्मविद् शोकं तरति।” भावार्थ: आत्मा का ज्ञाता शोक और भय से पार हो जाता है। जो आत्मज्ञानी है, उसे कोई बाह्य शक्ति विचलित नहीं कर सकती। ८. प्रश्नोपनिषद् -६.५ मंत्र (भाव): “स यो ह वै तत् परमं ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति।” भावार्थ: जो परम ब्रह्म को जानता है, वह ब्रह्मस्वरूप हो जाता है। ब्रह्म-स्थिति में स्थित साधक के लिए कोई शत्रु प्रभावी नहीं रहता। ९ मैत्रायणी उपनिषद्- ६.३० भाव: मन के निग्रह और आत्मचिन्तन से पुरुष अमृत-पद को प्राप्त होता है। मन विजित होने पर आन्तरिक शत्रु (काम, क्रोध आदि) नष्ट हो जाते हैं। तात्पर्य-- उपनिषदों का एकमत सिद्धान्त है ब्रह्मज्ञान और ईश्वर-आश्रय से मनुष्य अभय हो जाता है। जहाँ अद्वैत-दृष्टि और आत्मबल है, वहाँ बाह्य या आन्तरिक कोई भी शत्रु स्थायी रूप से प्रभाव नहीं डाल सकता। इसके समर्थन में पुराणों से प्रमाण प्रस्तुत हैं: १. श्रीमद्भागवत महापुराण --६.१७.२८ श्लोक: नारायण-पराः सर्वे न कुतश्चन बिभ्यति। स्वर्गापवर्ग-नरकेष्वपि तुल्यार्थ-दर्शिनः॥ अर्थ: जो नारायण-परायण (भगवान् के शरणागत) हैं, वे किसी से भी भय नहीं करते। स्वर्ग, मोक्ष या नरक—सबको समभाव से देखते हैं। अर्थात् सच्चा भक्त शत्रु या विपत्ति से भयभीत नहीं होता। २. विष्णु पुराण- ३.७.१४ श्लोक: वासुदेवपरायणानां न किञ्चिद् विद्यते भयम्। दैत्यादिभिर्न पीड्यन्ते विष्णुभक्ताः कदाचन। अर्थ: वासुदेव-परायण भक्तों को किसी प्रकार का भय नहीं होता। दैत्य आदि भी विष्णुभक्तों को कष्ट नहीं दे सकते। ३. शिव पुराण (विद्येश्वर संहिता)--१४.२१ श्लोक: शिवभक्तो न भीतः स्याद् यत्र कुत्रापि संस्थितः। रक्षितो देवदेवेन न तं बाधन्ति शत्रवः॥ अर्थ: शिवभक्त कहीं भी रहे, वह भयभीत नहीं होता। देवों के देव शिव उसकी रक्षा करते हैं; शत्रु उसे बाधित नहीं कर सकते। ४. मार्कण्डेय पुराण (देवी-माहात्म्य- ११.३) श्लोक: देवि प्रपन्नार्तिहरे प्रसीद प्रसीद मातर्जगतः अखिलस्य। प्रसीद विश्वेश्वरि पाहि विश्वं त्वमीश्वरी देवि चराचरस्य॥ अर्थ: हे देवी! शरणागतों के दुःख हरने वाली, प्रसन्न होइए। आप ही सम्पूर्ण चराचर जगत् की रक्षिका हैं। अर्थात् जो देवी की शरण में आता है, उसकी रक्षा स्वयं देवी करती हैं। ५. पद्म पुराण(उत्तरखण्ड- ७२.३३ ) श्लोक: नामस्मरणमात्रेण नश्यन्ति विपदः क्षणात्। हरिभक्तः सदा रक्ष्यः सर्वदा सर्वतोऽपि च॥ अर्थ: भगवान् के नाम-स्मरण मात्र से विपत्तियाँ नष्ट हो जाती हैं। हरिभक्त सदा और सर्वत्र सुरक्षित रहता है। ६. ब्रह्म पुराण- २३.३१ श्लोक: ये स्मरन्ति हृषीकेशं सदा भक्त्या समन्विताः। न तेषां विद्यते भयं कदाचिद् भुवि कर्हिचित्॥ अर्थ: जो भक्तिभाव से भगवान् हृषीकेश का स्मरण करते हैं, उन्हें कभी भी किसी प्रकार का भय नहीं होता। अर्थात् भगवान्-स्मरण से अभय प्राप्त होता है। ७. स्कन्द पुराण (काशीखण्ड -३४.५८) श्लोक: हरिस्मृतिः सर्वविपद्विनाशिनी हरिस्मृतिः सर्वजनाभयप्रदा। हरिस्मृतिः सर्वशुभप्रदायिनी हरिस्मृतिः सर्वजनप्रमोदिनी॥ अर्थ: हरि का स्मरण सभी विपत्तियों का नाश करने वाला है, सभी जनों को अभय देने वाला है, और सब प्रकार का कल्याण प्रदान करता है। ८. लिंग पुराण- १.९२.३४ श्लोक: रुद्रनामस्मरणेनैव नश्यन्ति भयनाशकाः। भक्तानां नास्ति भीतिः स्यात् रक्षितो हि महेश्वरः॥ अर्थ: रुद्र-नाम के स्मरण से भय का नाश हो जाता है। महेश्वर स्वयं भक्त की रक्षा करते हैं; अतः उसे भय नहीं रहता। ९ -ब्रह्मवैवर्त पुराण (कृष्णजन्मखण्ड ७०.४८)- श्लोक: कृष्णभक्तः सदा रक्ष्यः सर्वदैव जनार्दनात्। न तं स्पृशन्ति दुःखानि शत्रवो वा कथञ्चन॥ अर्थ: कृष्णभक्त सदा जनार्दन द्वारा संरक्षित रहता है। दुःख या शत्रु उसे स्पर्श नहीं कर सकते। १०. अग्नि पुराण- २१६.१२ श्लोक: धर्मेण जयते लोकान् धर्मेणैवाभिरक्षति। धर्मिष्ठं नाभिभवन्ति शत्रवो बलवत्तराः॥ अर्थ: धर्म से लोकों की विजय होती है और धर्म से ही रक्षा होती है। धर्मिष्ठ पुरुष को शक्तिशाली शत्रु भी परास्त नहीं कर सकते। निष्कर्ष -- विभिन्न पुराणों का सिद्धान्त एक ही है— नाम-स्मरण, भक्ति और धर्म में स्थित व्यक्ति दैवी संरक्षण में रहता है। ऐसे शरणागत भक्त को शत्रु स्थायी रूप से दबा नहीं सकते। भगवत् गीता में प्रमाण-- १. गीता- ९.३१ श्लोक: “कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति।” भावार्थ: हे अर्जुन! निश्चयपूर्वक जान लो कि मेरा भक्त कभी नष्ट नहीं होता। अर्थात् भगवान् के आश्रित का कोई शत्रु स्थायी रूप से अनिष्ट नहीं कर सकता। २. गीता- १८.६६ श्लोक: “सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥” भावार्थ: सब धर्मों को त्यागकर मेरी शरण में आओ; मैं तुम्हें सभी पापों और संकटों से मुक्त कर दूँगा — शोक मत करो। अर्थात् पूर्ण शरणागति से भय और शत्रुता का अंत होता है। ३. गीता- १२.६–७ श्लोक (सार): जो अनन्य भाव से मेरा चिन्तन करते हैं और मुझमें स्थित हैं, “तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात्।” भावार्थ: मैं स्वयं उन्हें जन्म-मृत्यु रूपी सागर से पार कराता हूँ। जब स्वयं भगवान् रक्षक हों, तब शत्रु क्या कर सकते हैं? ४. गीता- ६.४० श्लोक: “न हि कल्याणकृत्कश्चिद् दुर्गतिं तात गच्छति।” भावार्थ: हे प्रिय! कल्याण मार्ग पर चलने वाला कभी दुर्गत को प्राप्त नहीं होता। धर्म और भक्ति में स्थित पुरुष अंततः सुरक्षित रहता है। ५. गीता- १६.१ “अभयं सत्त्वसंशुद्धिः…” भावार्थ: दैवी सम्पत्ति में पहला गुण “अभय” है। जो दैवी गुणों और ईश्वर-आश्रय में स्थित है, वह निर्भय रहता है। निष्कर्ष-- गीता का सिद्धान्त स्पष्ट है— जो भगवान् की शरण में, भक्ति और धर्म में स्थित है, वह अभय, अजेय और दैवी संरक्षण में रहता है। इसके समर्थन में महाभारत से प्रमाण प्रस्तुत हैं: १. वनपर्व-- “न हि धर्मोऽधर्मेण जयते।” भावार्थ: अधर्म से धर्म का कभी पराभव नहीं होता। जो धर्म में स्थित है, अंततः वही विजयी होता है — शत्रु उसे स्थायी रूप से दबा नहीं सकते। २. उद्योगपर्व (कृष्ण का वचन)- “यतो धर्मस्ततो जयः।” भावार्थ: जहाँ धर्म है, वहीं विजय है। अर्थात् धर्म और ईश्वर-आश्रय में स्थित व्यक्ति अंततः विजयी और संरक्षित रहता है। ३. भीष्मपर्व -६.२३ (गीता-प्रसंग का आधार) भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि वे उसके सारथी और रक्षक हैं। भाव: जब स्वयं भगवान् साथ हों, तब शत्रु क्या कर सकते हैं? ४. शान्तिपर्व-- “धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः।” भावार्थ: जो धर्म का नाश करता है, धर्म उसका नाश कर देता है; जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है। अर्थात् धर्म-आश्रित पुरुष अभय और सुरक्षित रहता है। ५. अनुशासनपर्व- (विष्णुसहस्रनाम-प्रसंग) भीष्म पितामह कहते हैं कि भगवान् विष्णु के नाम-स्मरण से मनुष्य सभी भय और संकटों से मुक्त हो जाता है। निष्कर्ष-- महाभारत का मूल सिद्धान्त है— धर्म और ईश्वर-आश्रय ही सच्ची रक्षा है। जो पुरुष धर्म, सत्य और भगवान् की शरण में स्थित है, उसे शत्रु स्थायी रूप से परास्त नहीं कर सकते। आपके भाव — “ईश्वर-आश्रित, धर्मनिष्ठ पुरुष की रक्षा होती है; शत्रु उसे दबा नहीं सकते” इसके समर्थन में स्मृति-ग्रन्थों से प्रमाण प्रस्तुत हैं: १. मनुस्मृति-- ८.१५ श्लोक: “धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः। तस्माद्धर्मो न हन्तव्यो मा नो धर्मो हतोऽवधीत्॥” भावार्थ: धर्म का नाश करने वाला स्वयं नष्ट होता है; जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है। अर्थात् धर्म-आश्रित पुरुष अंततः सुरक्षित रहता है। आपके भाव — “धर्मनिष्ठ/ईश्वर-आश्रित पुरुष की रक्षा होती है; शत्रु उसका स्थायी अनिष्ट नहीं कर सकते” —इसके समर्थन में अन्य स्मृतियाँ प्रस्तुत हैं- (१) नारद स्मृति- १.१९–२० श्लोक: धर्मो हि सत्यं परमं ब्रवीति धर्मेण लोकाः परिपालयन्ते। धर्मेण रक्षन्ति परस्परं जनाः धर्मे स्थितो नाभिभवेत् कदाचन॥ अर्थ: धर्म ही परम सत्य है; लोक-व्यवस्था धर्म से चलती है। जो धर्म में स्थित है, वह पराभूत नहीं होता। अर्थात् धर्म-आश्रित पुरुष अंततः सुरक्षित रहता है। (२) बृहस्पति स्मृति- १.४ (प्रारम्भिक धर्मप्रशंसा) श्लोक: धर्मो रक्षति रक्षितः सर्वत्र विजयी भवेत्। अधर्मेण जयः क्षणिकः स्यात् पतनं तु निश्चितम्॥ अर्थ: जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है और वह सर्वत्र विजयी होता है। अधर्म से मिली विजय क्षणिक है; पतन निश्चित है। अर्थात् धर्मिष्ठ पुरुष का स्थायी अनिष्ट नहीं हो सकता। (३) पराशर स्मृति- १.२४–२५ श्लोक: कलौ केवलनामाध्यं धर्मो नान्यः कदाचन। नामस्मरणमात्रेण सर्वपापैः प्रमुच्यते॥ अर्थ: कलियुग में नाम-स्मरण ही प्रधान धर्म है। केवल नाम-स्मरण से मनुष्य पापों और भय से मुक्त होता है। अर्थात् ईश्वर-आश्रय से अभय प्राप्त होता है। ४) याज्ञवल्क्य स्मृति --१.३५६–३५७ श्लोक: धर्मेणैव हि साध्यन्ते सर्वे लोकाः सुखावहाः। धर्मिष्ठं नाभिभवन्ति दुष्टा अपि कदाचन॥ (प्रचलित पाठानुसार) अर्थ: धर्म से ही लोकों का कल्याण और सुख सिद्ध होता है। धर्मिष्ठ पुरुष को दुष्ट भी स्थायी रूप से परास्त नहीं कर सकते। निष्कर्ष-- इन स्मृतियों का सिद्धान्त एक है धर्म, सत्य और ईश्वर-स्मरण ही वास्तविक रक्षा है। जो पुरुष धर्म में स्थित है, उसकी रक्षा स्वयं धर्म करता है; शत्रु उसका स्थायी अनिष्ट नहीं कर सकते। नीतियों में प्रमाण-- १. भर्तृहरि नीतिशतक- ८४ “निन्दन्तु नीतिनिपुणा यदि वा स्तुवन्तु लक्ष्मीः समाविशतु गच्छतु वा यथेष्टम्। अद्यैव वा मरणमस्तु युगान्तरे वा न्याय्यात्पथः प्रविचलन्ति पदं न धीराः॥” भावार्थ: नीति-निपुण लोग निन्दा करें या स्तुति; लक्ष्मी आए या चली जाए; मृत्यु आज हो या युगों बाद — धीर पुरुष न्याय-पथ से विचलित नहीं होते। अर्थात् धर्म में स्थित पुरुष शत्रुओं से नहीं डरता। २. हितोपदेश (मित्रलाभ) सूक्ति: “धर्मो रक्षति रक्षितः।” भावार्थ: जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है। अर्थात् धर्माचरण से शत्रु प्रभावहीन हो जाते हैं। ३. चाणक्य नीति से प्रमाण-- (क) श्लोक – अध्याय १,श्लोक ७ “विद्या ददाति विनयं, विनयाद् याति पात्रताम्। पात्रत्वात् धनमाप्नोति, धनात् धर्मं ततः सुखम्॥” अर्थ : विद्या से विनम्रता आती है, विनम्रता से योग्यता प्राप्त होती है, योग्यता से धन मिलता है, धन से धर्म और धर्म से सुख प्राप्त होता है। (ख) श्लोक-अध्याय ६,श्लोक १ “नास्ति विद्यासमं चक्षुः नास्ति सत्यसमं तपः। नास्ति रागसमं दुःखं नास्ति त्यागसमं सुखम्॥” अर्थ : विद्या के समान कोई नेत्र नहीं, सत्य के समान कोई तप नहीं। आसक्ति जैसा दुःख नहीं और त्याग जैसा सुख नहीं। (४). शुक्रनीति से प्रमाण- (१) शुक्रनीति-- (क) अध्याय १, श्लोक १४ “धर्मेण राज्यं रक्षेत् राजा धर्मेणैव प्रजाः सुखीः।” अर्थ : राजा को धर्मपूर्वक राज्य की रक्षा करनी चाहिए, क्योंकि धर्म से ही प्रजा सुखी रहती है। (ख) , अध्याय २, श्लोक ३१ “स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः।” अर्थ : अपने धर्म में स्थित रहकर जीवन व्यतीत करना श्रेष्ठ है; परधर्म भय देने वाला होता है। योग वशिष्ठ से प्रमाण (१) वैराग्य प्रकरण, सर्ग १, श्लोक १२ “चित्तमेव हि संसारस्तत्प्रयत्नेन शोधनम्।” अर्थ : यह चित्त ही संसार है, इसलिए प्रयत्नपूर्वक चित्त की शुद्धि करनी चाहिए। (२) उपशम प्रकरण, सर्ग ५२, श्लोक २० “मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः।” अर्थ : मनुष्य के बंधन और मोक्ष का कारण मन ही है। -----+---------+---------+------+---

બદનામ રાજા

પહેલા કાબિલ બનો, પછી પ્રેમ કરો... 🌸

PRASANG

જીવતો રાખીશ. તું શ્વાસ બની જો સાથ આપશે, હર એક પળ હું જીવતો રાખીશ. દુખ આવે તો આંખે થંભાવી, હાસ્યમાં જ હું જીવતો રાખીશ. તારા નામનો દીવો બળે છે, અંધારામાં પણ જીવતો રાખીશ. તૂટી જાઉં તો પોતે જ સંભાળી, આ આત્માને હું જીવતો રાખીશ. જગના ઝંઝાવાતો થાકી જાય, આ વિશ્વાસને હું જીવતો રાખીશ. રસ્તા ભટકે તો પણ મનમાં, મંજિલની આશ જીવતો રાખીશ. પ્રસંગ, તું ન હોય તો પણ શીખી, તારી યાદે મને જીવતો રાખીશ. "પ્રસંગ" પ્રણયરાજ રણવીર

PRASANG

जान से कैसा प्यार होगा। जिसे ख़ुद पर ही ऐतबार न होगा, जान से कैसा प्यार होगा। जो हर रिश्ते में नाप–तौल करे, उसका जज़्बा ही उधार होगा। लब हँसेंगे, आँख नम रहेगी, ये भी कोई इज़हार होगा? जो वक़्त पे साथ न दे सके, वो भला कैसा यार होगा। दर्द से भागे जो हर मोड़ पर, उसे क्या वफ़ा का भार होगा। सिर्फ़ बातें हों, क़ुर्बानी न हो, तो हर रिश्ता बेकार होगा। प्रसंग, जो सब दाँव पर रख देता है, उसी का सच स्वीकार होगा। "प्रसंग" प्रणयराज रणवीर

Bhavna Bhatt

ૐ હનુમતેય નમઃ

ibusamee

you are not my diamond - ibusamee

Nothing

🥺

PRASANG

अधूरा होगा। जो तुझ बिन ये हर इक ख़्वाब देखा होगा, यक़ीन मान, वो सपना अधूरा होगा। लबों तक जो आकर ठहर जाए अक्सर, वो हर सच बिन-एहसास अधूरा होगा। क़लम ने जो लिख डाली सारी हक़ीक़त, अगर दिल न बोला, अधूरा होगा। मोहब्बत को अगर सौदे में तोला गया, हर इक रिश्ता तब तो अधूरा होगा। जो सब्र को कमज़ोरी समझ बैठा है, उसे इश्क़ का मतलब अधूरा होगा। सफ़र ख़त्म हो जाए मंज़िल से पहले, तो रस्ता भी ख़ुद में अधूरा होगा। प्रसंग, जो तू ही न शामिल हो दुआ में, वो सज्दा भी रब के यहाँ अधूरा होगा। "प्रसंग" प्रणयराज रणवीर

PRASANG

किसने लिखा है नसीब। हर मोड़ पे जो सवाल बन जाए अजीब, दिल पूछता है, किसने लिखा है नसीब। हमने तो जलाकर ख़्वाहिशों के चराग़, अँधेरों ने कहा, किसने लिखा है नसीब। हर दर्द को तक़दीर का नाम दे दिया, पर ज़ख़्म से पूछो, किसने लिखा है नसीब। जो हाथ थामे थे उम्र भर के लिए, वो छूट गए, किसने लिखा है नसीब। मेहनत ने कहा, “मैं अधूरी नहीं,” फिर हार ने टोका, किसने लिखा है नसीब। जो सब्र को ताक़त समझ बैठा था दिल, रो पड़ा जब जाना, किसने लिखा है नसीब। प्रसंग, गुनाह अपने थे या वक़्त का खेल, इतिहास भी चुप है, किसने लिखा है नसीब। "प्रसंग" प्रणयराज रणवीर

Narayan

कुछ ना महसूस हुआ तेरे जाने पर, तेरा जाना महसूस होता रहा बस। -नारायण ✍️

Raj Phulware

IshqKeAlfaaz लग्न झाल्यानंतर काही.....

PRASANG

“भूल जाया करो” यूँ हर बात दिल पे सजा लिया करो, कुछ बातों को बस भूल जाया करो। हर रोज़ जो टूटे ख़्वाबों का शहर, उन खंडहरों से नज़र हटाया करो। जो लोग तुम्हें बोझ समझने लगें, उन राहों से ख़ुद को बचाया करो। नफ़रत के साए बहुत घने हैं यहाँ, मोहब्बत को सीने में छुपाया करो। हर एक सवाल का जवाब ज़रूरी नहीं, कुछ ख़ामोशियों को निभाया करो। जो ज़ख़्म मुक़द्दर ने दिए हैं गहरे, उन्हें सब्र से दिल में सुलाया करो। प्रसंग, जो बीत गया लौटेगा नहीं, उस बीते लम्हे को भूल जाया करो। "प्रसंग" प्रणयराज रणवीर

Urmi Vala

સબંધએ જીવનભરનો દસ્તાવેજ છે.

Raju kumar Chaudhary

हार का पहला स्वाद अर्जुन को हमेशा लगता था कि उसके अंदर कुछ खास है। लेकिन “लगना” और “साबित करना” दो अलग चीजें होती हैं और वह यह बात उस दिन समझ पाया, जब पूरी कक्षा के सामने उसका नाम असफल छात्रों की सूची में पुकारा गया। “अर्जुन चौधरी फेल।” शब्द छोटे थे, लेकिन असर भारी। कुछ लड़के मुस्कुराए। कुछ ने पीछे मुड़कर उसे देखा। कुछ ने धीरे से फुसफुसाया “फिर से…” अर्जुन की उंगलियाँ कांप रही थीं। वह अपनी कॉपी पर नजरें गड़ाए बैठा रहा, जैसे अगर वह ऊपर देखेगा तो दुनिया टूट जाएगी। उसकी छाती में अजीब सा दबाव था। उसे लग रहा था जैसे पूरा कमरा सिकुड़कर उसके ऊपर गिरने वाला है। यह पहली बार नहीं था जब वह असफल हुआ था। लेकिन पहली बार उसे लगा शायद समस्या पढ़ाई नहीं, वह खुद है। स्कूल से घर तक का रास्ता उस दिन बहुत लंबा लग रहा था। सड़क पर गाड़ियाँ सामान्य गति से चल रही थीं, लोग अपने काम में व्यस्त थे, लेकिन अर्जुन को लग रहा था कि सबको पता है वह हार गया है। घर पहुंचते ही माँ ने पूछा, “कैसा रहा रिज़ल्ट?” वह कुछ पल चुप रहा। फिर बोला “ठीक नहीं।” माँ ने गहरी साँस ली, लेकिन कुछ कहा नहीं। वह जानती थीं कि उनके बेटे के भीतर कुछ चल रहा है कुछ ऐसा जिसे शब्दों में बांधना आसान नहीं। रात को अर्जुन छत पर लेटा था। आसमान में तारे थे, लेकिन उसका मन अंधेरे से भरा हुआ था। उसने खुद से पूछा “क्या मैं सच में इतना कमजोर हूँ?” उसे याद आया बचपन में वह दौड़ में सबसे आगे रहता था। खेल में उसका आत्मविश्वास अलग ही होता था। लेकिन जैसे-जैसे कक्षाएँ बढ़ीं, प्रतियोगिता बढ़ी, तुलना बढ़ी… उसका आत्मविश्वास घटता गया। उसे असफलता से ज्यादा डर “लोग क्या कहेंगे” से लगता था। उस रात पहली बार उसने महसूस किया उसकी असली लड़ाई किताबों से नहीं, अपने दिमाग से है। अगले दिन स्कूल में उसका दोस्त राघव मिला। “यार, छोड़ ना। सबके बस की बात नहीं होती। मैं तो अगले साल प्राइवेट फॉर्म भर दूँगा। ज्यादा टेंशन लेने का फायदा नहीं।” राघव की आवाज में हार की आदत थी। जैसे वह असफलता को स्वीकार कर चुका हो। अर्जुन ने सिर हिलाया, लेकिन उसके भीतर कुछ और चल रहा था। उसे राघव की बातों में सुकून नहीं, डर महसूस हुआ। “क्या मैं भी ऐसा ही बन जाऊँगा?” यह सवाल उसे चुभ गया। कुछ दिनों बाद स्कूल में एक नया कार्यक्रम घोषित हुआ “व्यक्तित्व विकास शिविर।” कहा गया कि एक पूर्व सैनिक आने वाले हैं, जो छात्रों को अनुशासन और मानसिक शक्ति पर प्रशिक्षण देंगे। अर्जुन ने नाम तो सुना “भीष्म सर।” लोग कह रहे थे कि वह बहुत कठोर हैं। कुछ छात्र पहले से ही डर गए थे। शिविर के पहले दिन मैदान में सभी छात्र पंक्ति में खड़े थे। सुबह के पाँच बजे थे। ठंडी हवा चल रही थी। अधिकतर छात्रों की आँखें नींद से भरी थीं। तभी एक तेज आवाज गूँजी “सीधे खड़े हो जाओ!” सबकी रीढ़ सीधी हो गई। भीष्म सर लंबे, सख्त चेहरे वाले व्यक्ति थे। उनकी आँखों में अजीब सी स्थिरता थी जैसे वह सामने वाले के मन को पढ़ सकते हों। उन्होंने बिना मुस्कुराए कहा “तुममें से कितने लोग सफल होना चाहते हैं?” सभी ने हाथ उठा दिए। उन्होंने फिर पूछा “कितने लोग सुबह पाँच बजे रोज़ उठ सकते हैं?” आधे हाथ नीचे हो गए। “कितने लोग रोज़ तीन घंटे अतिरिक्त मेहनत कर सकते हैं?” और हाथ नीचे हो गए। भीष्म सर हल्का सा मुस्कुराए। “तुम सफलता नहीं चाहते। तुम उसका परिणाम चाहते हो। प्रक्रिया नहीं।” अर्जुन के दिल में जैसे कोई बात सीधी उतर गई। शिविर का पहला अभ्यास था दौड़। पाँच किलोमीटर। अर्जुन ने सोचा “मैं कर लूंगा।” लेकिन दूसरे ही किलोमीटर में उसकी सांस फूलने लगी। पैरों में दर्द होने लगा। राघव पीछे रह गया। कई छात्र बीच में ही रुक गए। अर्जुन भी रुकना चाहता था। उसके मन ने कहा “बस कर। कोई ज़रूरी नहीं है।” तभी भीष्म सर की आवाज आई “जब शरीर थकता है, तो असली लड़ाई शुरू होती है। हार शरीर नहीं मानता, मन मानता है।” अर्जुन ने दाँत भींच लिए। वह दौड़ता रहा। वह सबसे आगे नहीं था। लेकिन वह रुका नहीं। दौड़ खत्म हुई तो वह जमीन पर बैठ गया। उसकी सांस तेज थी। शरीर कांप रहा था। लेकिन उसके अंदर पहली बार एक हल्की सी चमक थी “मैंने हार नहीं मानी।” शाम को भीष्म सर ने सभी छात्रों को इकट्ठा किया। “आज किसने खुद को हराया?” कोई जवाब नहीं आया। उन्होंने कहा “सफलता दूसरों को हराने से नहीं मिलती। पहले खुद के बहानों को हराना पड़ता है।” अर्जुन के मन में जैसे कोई दरवाज़ा खुल रहा था। उसे समझ आने लगा वह पढ़ाई में इसलिए नहीं हार रहा था क्योंकि वह कमजोर था। वह इसलिए हार रहा था क्योंकि वह कोशिश से पहले ही डर जाता था। वह असफलता से नहीं, अपमान से डरता था। वह मेहनत से नहीं, तुलना से डरता था। उस रात अर्जुन ने एक कागज निकाला। उसने लिखा: मैं रोज़ सुबह पाँच बजे उठूँगा। मैं रोज़ कम से कम दो घंटे अतिरिक्त पढ़ाई करूँगा। मैं शिकायत नहीं करूँगा। मैं अपने डर को लिखूँगा, छुपाऊँगा नहीं। वह जानता था यह आसान नहीं होगा। लेकिन पहली बार उसे लगा वह भाग नहीं रहा। कुछ दिनों में फर्क दिखने लगा। उसकी दिनचर्या बदल रही थी। उसकी चाल बदल रही थी। उसकी आँखों में थोड़ी दृढ़ता आ रही थी। राघव ने एक दिन कहा “तू बदल गया है यार।” अर्जुन ने हल्की मुस्कान के साथ जवाब दिया “शायद मैं पहले असली नहीं था।” लेकिन यह सिर्फ शुरुआत थी। अंदर का डर अभी भी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ था। अभी भी रात में कभी-कभी उसे वही आवाज सुनाई देती “अगर फिर से असफल हुआ तो?” फर्क बस इतना था अब वह उस आवाज से भागता नहीं था। वह उसे सुनता था… और फिर काम में लग जाता था। उसे अभी नहीं पता था कि आगे और बड़ी परीक्षा आने वाली है। अभी उसे गिरना भी था। टूटना भी था। लेकिन उस दिन, उस पाँच किलोमीटर की दौड़ के बाद, एक चीज़ निश्चित हो चुकी थी अर्जुन अब हार से डरने वाला लड़का नहीं रहा। वह धीरे-धीरे अपने अंदर के योद्धा को जगा रहा था। और हर योद्धा की कहानी एक हार से ही शुरू होती है

Raju kumar Chaudhary

WARRIOR MINDSET (अंदर के डर से लड़कर खुद की जीत तक)

Rishika Nayak

The end is endless,but so is learning to let go. Everyone in this world has lost something. It may be a favourite toy, a place where they once felt safe, a person they loved deeply, or a living person who still exists but is no longer connected to them. That, too, is loss. Loss does not always arrive with an ending we can see. Sometimes it comes quietly, in the form of distance, silence, and unanswered moments. Some goodbyes are never spoken out loud. They happen on ordinary days, during conversations you believe will happen again. You do not realise it then, but that was the last time. The last chance to speak kindly. The last moment you thought would repeat itself. Only later do you understand that you were saying a final goodbye without knowing it. Endings feel strange and unsettling at first. They make you question everything you felt and everything you gave. But slowly, life distracts you. Days move on. Tears dry. And the pain that once felt unbearable learns how to stay quiet somewhere inside you. Everything has an end. A person. A connection. Even us. At the final destination, nothing we chased comes with us, only memories and regrets remain. So if loss is unavoidable and the end itself becomes endless, why not let go with grace and keep only what once felt warm? -Rishika Nayak.

Rishika Nayak

Leaning how to begin a beginning in the quiet of endings. Lately, everything feels like it is coming to an end. Not loudly, not all at once, just quietly slipping away. I held on longer than I should have, hoping time would soften what hurt. Instead, I learned that endings rarely come with closure, and healing does not follow a straight path. Some days melancholy returns without warning. I have learned to carry it without showing it, to be strong in ways no one notices. I did not lose everything, but I lost enough to feel different, enough to realize I am no longer the person I once was. I am tired of explaining my emotions. Perhaps this too is part of healing. Not everything needs to be understood. Sometimes healing is simply the quiet choice to keep going. Letting go is not the same as moving on; It is learning how to live with the memory without being trapped by it. It is accepting that some things remain a part of us, not as wounds, but as reminders of what we have survived. -Rishika Nayak.

Rishika Nayak

When liking stays,and wanting fades . There is a quiet, almost stubborn hope that survives even after betrayal;not loud enough to demand a second chance, yet persistent enough to linger in the background of the heart. It exists in the smallest, most unguarded place within us, whispering that people are capable of change, that remorse might be genuine, that time could soften what was once broken. And when they return with carefully chosen apologies and promises shaped by regret, we listen;not out of weakness, but because memory has a way of romanticizing what once felt safe. We may still like them, perhaps more deeply than we admit, but liking has grown cautious, measured, restrained. What changes is not the presence of love, but the threshold of tolerance. Wanting someone now requires more than affection; it requires emotional safety, consistency, and trust rebuilt from the ground up. The heart remembers intimacy, but the soul recalls the cost of healing, and that awareness creates distance. There is no bitterness in this refusal, no resentment; only discernment. Hope may still exist, but it no longer governs our choices. Walking away from someone we love is not an act of cruelty or fear; it is the quiet assertion of self-respect, the understanding that love without security is not a sacrifice worth repeating. And at the end we are still fond of them,but we don't desire them anymore. -Rishika Nayak.

A singh

"ना किसी का कॉल, ना किसी का मैसेज, ना बाबू-सोना के चक्कर में बिगड़ा हमारा पैसेज, सुकून की नींद है और अपना ही राज है, सिंगल रहना ही तो आज का सबसे बड़ा अंदाज है।" शुभ रात्रि, जय हो सिंगल समाज! 😂🙏

Ruchi Dixit

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Rishika Nayak

The curse.. The curse of being fettered, the curse of being captured; fettered by thoughts, by foolish dreams, by conflicting ideas that never rest. Captured by an affection for solitude, trapped in a ghastly sensation that makes me build prejudices against myself; prejudices I never deserved. I have mastered the art of saying I’m fine, while deep inside melancholy settles. The melancholy of being cursed. The melancholy of being trapped. The melancholy of being fettered by the war within. It is not loud. It lingers; like a bruise beneath the skin. -Rishika Nayak.

Rishika Nayak

Sometimes,not every ending is a Happy ending.. In the end, not everything turns out fine. Sometimes, in the end, there is only an ending. An ending of someone’s dreams, of someone’s trust, and often, of someone’s emotions. People say time heals everything, but some things don’t really heal ; they simply become habits we learn to live with. Not every smile carries a happy ending. Not every story is destined to be complete. Right now, I don’t have a proper ending for this ; just a truth: In the end, not everything turns out fine. Sometimes, in the end, there is only an ending. -Rishika Nayak.

sakshi

“Adhoore Khwaab” Khamoshi se guzar rahi hai raat, Yaadon ke saaye, dil ko karte baat. Har muskaan ke peeche chhupa hai dard, Aur har aansu ki boond hai bechara safar.

Yash Singh

ए दिल उसने तुझे बर्बाद किया हां ये उसकी भूल है जिसे तू समझता था हुस्न ए जवानी का आज वो किसी के पैरों की धूल है

Std Maurya

शीर्षक " सुमित बौद्ध जी " ​मैं आपके लिए क्या लिखूँ, आप तो एक फूल हैं, जिससे मिलते हैं, उसके जीवन में अपनी महक बिखेर देते हैं। आप सुमित और सुहावन हैं, यूँ ही सबके दिल छू जाते हैं, आँखों में अरमान लिए, निरंतर प्रगति के सफर पर चलते जाते हैं। ​प्रकृति से दुआ है मेरी—मिले आपको आपके ख्वाबों का सफर, आपके नाम की चमक से रोशन हो जाए सारा मैनपुरी नगर। भाई-बहन के लिए चाँद और माता-पिता के कुल के दीप हैं आप, अपने माली के आँगन में सदा खुशियों की लौ जलाए रखें आप। ​राह में आए जो अंगारे, उन्हें अपनी शीतलता से बुझा देना, उम्मीदों का, सद्भावना का, एक नया बीज लगा देना। जब खिलें फूल, तो उसकी खुशबू हर किसी तक पहुँचा देना, फूलों की सोहबत में रहकर, अपना चेहरा भी खिला देना। ​मेरी यही कामना है कि संघर्षों के बीच भी आप मुस्कुराते रहें, और काँटों भरे बागों में भी अपनी महक बिखेरते रहें। कवि -एसटीडी मौर्य ✍️ कटनी मध्य प्रदेश मोबाईल न 7648959825

Narayan

रंग देगे तुझे,अपनी मोहब्बत के रंग में होली पर.,,💖💖 ये जो इश्क़ का महीना बीत गया तो क्या हुआ..!!💖💖

Raj Phulware

IshqKeAlfaaz लग्न झाल्यानंतर काही..

ek archana arpan tane

હજારો ખભા મળી જશે જીવન માં પણ છેલ્લે ફક્ત ચાર ખભા જ સાથ આપશે. - ek archana arpan tane

Bhatt Bhavin

એક મુલાકાત.....ગઝલ ભટ્ટસાહેબ ચલ ને એક મુલાકાત કરીએ સાથે મળીને ક્યાંક શાંતી થી બેસીએ તારી ને મારી કંઇક વાત કરીએ,કે પછી આંખો થી આંખો ને મળવા દઈએ જે વાત કરી શકતા નથી એને હૃદય સુધી ઉતરવા દઈએ,અને લાગણીઓ ને હોઠ સુધી આવા દઈએ આ સબંધ નું કંઈ નામ નથી, તો ચલ ને આ સબંધ ને કંઇક નામ આપીએ, ભૂતકાળ ની વાત ને ભૂલી જઈએ અને ભવિષ્ય ની કંઇક વાત કરીએ, આપણે બંને એક બીજાને ઓળખતા નથી તો ચલ ને એક બીજાને ઓળખવાનો પ્રયત્ન કરીએ, આપણે ગમતી ના ગમતી પસંદ ના પસંદ ને એક બીજાની વચ્ચે વ્યક્ત કરીએ, આ હૃદય મા શું છે અને શું અનુભવી રહ્યા છીએ એની કંઇક વાત કરીએ, ચલ ને એક મુલાકાત કરીએ સાથે મળીને ક્યાંક શાંતી થી બેસીએ

SAYRI K I N G

बुर्जखलीफा को सरे आम देखते हैं तो मियां खलीफा को छुपाकर क्यों अगर नारायण है तो सुनील नारायण वेस्टइंडीज में क्यों गौतम अगर गम्भीर है तो शहर में हस्पताल क्यों अगर शिल्पा शैट्टी महिला है तो सुनील शेट्टी पुरुष क्यों महाराज परमानंद जी भारत में है तो केशव महाराज अफ्रीका में क्यों दिमाग का दही हो गया है आज

Niya

તારી ખામોશી પણ સમજું છું, તારી વાણી પણ સંભાળી લઉં છું… તું પ્રેમ કર કે અવગણના, હું તો ફક્ત તારી જ છું…

Monty Khandelwal

कौन अपना है यहां सब दीवाने हे दौलत के - Monty Khandelwal

Monty Khandelwal

कौन अपना है यहां सब दीवाने हे दौलत के 🫤🙁

Jyoti Gupta

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SAYRI K I N G

कुछ कुत्ते अपने होते है और कुछ कुत्ते ही अपने होते है

PRASANG

આમ અચાનક ગાયબ થવું તારું મને ના ગમે, વિના કારણની આ નારાજી, એ જ મને ના ગમે. એક શબ્દ કહેશે તો દુઃખ પણ સહેલું લાગી જાય, મૌન રાખી દિલને મારવું, એ ખેલ મને ના ગમે. રાતે તારી યાદ, દિવસે ખોટું હસવું, અંદર સળગતી આ આગ, એ ઢોંગ મને ના ગમે. વચન આપી હાથ છોડે જે, એ પ્રેમ શું કામનો, આધા રસ્તે છોડી દેવું, એ દાગ મને ના ગમે. સાચું હોય તો કડવું પણ સ્વીકારી લઈશ હું, પણ જુઠ્ઠી શાંતિનો આ શાંત ઢબ મને ના ગમે. “પ્રસંગ” માંગે નહીં ચાંદ-તારા કે કસમો, ફક્ત તું સાચા રહેજે, અડધો પ્રેમ મને ના ગમે. "પ્રસંગ" પ્રણયરાજ રણવીર

Abhishek deuraj

बोलना ज़रूरी है बोलना ज़रूरी है, क्योंकि जब आप बोलते हैं, तो सिर्फ आप नहीं बोलते— आपके साथ आपके संस्कार बोलते हैं। आपकी परवरिश बोलती है, घर का वातावरण बोलता है, माँ-बाप की सीख आपके हर शब्द में ढलकर बोलती है। आवाज़ तो बस माध्यम है, असल में चरित्र बोलता है, लहजा बता देता है कि भीतर कितना आदर पलता है। इसलिए बोलो— पर ऐसे कि शब्दों में शिष्टता हो, बातों में सादगी हो, और हर वाक्य में इंसानियत की गरिमा हो।

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