Gujarati Whatsapp Status | Hindi Whatsapp Status
Chaitanya Joshi

શિવનું શરણ મારે એક આધાર. શિવનું શરણ મારે ભવજળપાર. સંકટો ટળતાં શિવકૃપાથી, આશિષ મળતા શિવકૃપાથી. શિવનું શરણ મારે જીવનસાર...1 રીઝે ભોળાનાથ ભયહારી, સ્તુતિ પ્રાર્થના મુખે ઉચ્ચારી. શિવનું શરણ મારે સફળ અવતાર...2 અંતરવેદના શિવજી સમજતા. મૂક વરદાન શિવજીના મળતા. શિવનું શરણ મારે હરપળ વિચાર...3. ભૂલીને દોષો હરજી સ્વીકારે. જીવમાત્રને એ સહેજે આવકારે. શિવનું શરણ મારે હરખ અપાર....4 આશુતોષ અવિનાશી પ્રભુ પ્રેમથી રીઝતા શિવશંકર શંભુ. શિવનું શરણ મારે સફળ સંસાર...5 - ચૈતન્ય જોષી. " દીપક " પોરબંદર.

Ajit

તને ફાવે ત્યારે તું મોઢું ફેરવી દે એને તું પ્યાર કહે છે...... તને યાદ મારી આવે ત્યારે તું આંસુ ખેરવી દે એને તું પ્યાર કહે છે.... આ વચ્ચેના સમયમાં મને સાચવી લે એને યાર કહે છે...... જિંદગી ની "યાદ"

Neha kariyaal

Dark Blue 🖤 ( मोह ही दुःख का कारण है) आज फ़िर मैंने एक ग़लती कर दी, हर रोज़ सोचती हूँ कुछ गलत नहीं करूंगी। पर रोज़ कुछ न कुछ कर देती हूं। आज जो हुआ वो अच्छा नहीं था और शायद कोई मुझे माफ़ न करें क्योंकि मैं ख़ुद को दोषी समझती हूं। पर हम कुछ भी जानबूझ कर नहीं करते, बस हो जाता है। मैंने किसी को हानि नहीं पहुंचाई लेकिन लगता है सब मेरी गलती है। मेरा मोह मुझे ये करने पर मजबूर कर रहा था, ना चाहते हुए भी मैंने फ़िर से खुद को ठेस पहुंचाई। अपनी ही नज़रों में मैंने ख़ुद को छोटा बना दिया। अब मैं फिर से सब ठीक करूंगी, प्रकृति की चीजें उसे वापस कर दूंगी। मैं जानती हूँ कुछ भी पहले जैसा नहीं होगा। लेकिन मुझे अपने हिस्से का काम करना होगा जो मेरा नहीं है मैं उसे नहीं ले सकती! मेरे अंदर का दुःख मुझे तोड़ रहा है एक बोझ है सीने पर, जो शायद कभी कम न हो, पर मैं कोशिश करूंगी कुछ भी ठीक करने की। और मुझे समझ आ चुका है कि मोह केवल दुःख का कारण बनता है। वो एक पल की खुशी तो दे सकता है लेकिन साथ ही दुखों का तूफ़ान लाता है। हम चाहे कितनी भी कोशिश कर लें लेकिन गलतियों से नहीं बच सकते। और सच्चाई है कि गलतियों से ही हम कुछ नया सीखते हैं। Nk✍️

રોનક જોષી. રાહગીર

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Imaran

मोहब्बत की शमा जला कर तो देखो, ये दिलो की दुनिया सज़ा कर तो देखो, तुझे हो न जाए मोहब्बत तो कहना, ज़रा हमसे नजरे मिला कर देखो. 🫶imran 🫶

prit tembhe

सिर्फ तुम....❣️✍️ तुम्हे कहूँ तो लब्ज़ हो तुम, तुम्हें पढ़ूँ तो किताब हो तुम। तुम्हें सुनूँ तो दिल की धड़कन, तुम्हें लिखूँ तो मेरी कलम हो तुम। लोगों की होंगी अपनी-अपनी प्रेम कहानियाँ हज़ार, मेरे जीवन की हर साँस में बस एक ही इंतज़ार हो तुम। ख़ुदा भी तुम, दुआ भी तुम, मेरे हर ख़्वाब का आधार हो तुम। सबसे अच्छा मेरा यार हो तुम, फिर भी अधूरी-सी एक बात हो तुम। ख़ुदा भी तुम, जीवन भी तुम, सबसे प्यारा मेरा यार हो तुम। दुनिया पढ़े चाहे लाख किताबें, मेरी तो ख़ुद की शायरी हो तुम। जो दूर रहकर भी पास लगे, वो यादों की वो बेकरारी हो तुम। मुस्कान में छुपा दर्द और आँखों की नमी हो तुम। सब कुछ होकर भी जो ना मिले, मेरी सबसे बड़ी कमी हो तुम…

kavitha

నదిలా పారుతున్న కన్నీటి చుక్కను ప్రశ్నించాలని ఉంది, నీ కదలికకు కారణమేమిటని. అగ్నిపర్వతం లాంటి నా గుండెను, ప్రశ్నించాలని ఉంది, నీ అలజడికి మూలం ఎవరని.

Saroj Prajapati

खूब इम्तिहान ले रही है तू जिंदगी! अब एक आध नतीजा मेरे हक में भी निकाल दे इतना भी मैं नाकाबिल ना था जितना कि लोग अब मुझे समझने लगे। सरोज प्रजापति ✍️ - Saroj Prajapati - Saroj Prajapati

Kaushalyaba Gohil

જયારે કોઈ ઘર માં એક પરણિત પુરુષ ( કે જે કોઈ નો દીકરો કે ભાઈ છે) અમુક નિર્ણયો પોતાની જાતે લેવાં માંડે છે પોતાનાં વડીલો ને પૂછ્યા વગર પોતાની બુદ્ધિ થી ત્યારે લાગતા વળગતા ની સલાહ આવવાં માંડે છે કે બાયું ( તેની પત્ની)ની ભુદ્ધી થી કામ લેશો તો આગળ નહી આવો.વળી આવી સલાહ આપવા વાળા બાયું જ હોય 😂. અને આ બાબત નો ખ્યાલ આવતા એ સ્રી ઘર ના કોઈ પણ નિર્ણયો માં બોલવાનું બંધ કરે અને તે ફકત પોતાનાં બાળકો અને પતિ માટે વિચારવાનું શરૂ કરે ત્યારે એ જ સલાહ આપવા વાળા ને માંઠું લાગે કે તારી બાય એ પૂછ્યું નહી કે કીધું નહી. જ્યારે તમારાં નબળાં સમય માં એ સ્રી એ સાથ આપ્યો હોઈ અને એ કોઈ ખોટી વાત નો વિરોધ કરવા જાય ત્યારે જો તમને બાયું ની બુદ્ધિ યોગ્ય ના લાગતી હોય તો તમને અમુક અમુક બાબત મા એ ડહાપણ બતાવે એવો આગ્રહ હોવો યોગ્ય છે? એની કદર નથી કરતા કાઈ વાંધો નહીં પણ એના કારણે જ બઘું થયું એમ કહેવા પછી એની પાસે થી ડહાપણ ભર્યા વ્યવહાર ની અપેક્ષા રાખવી કેટલી યોગ્ય??

महेश रौतेला

मरने के बाद तीता(कड़ुआ) भी मीठा लगने लगता है, चुप्पी में प्यार आने लगता है मन मुटाव हँसाने लगता है, अधैर्य, धैर्य बन जाता है। मरने के बाद तीर्थ एकान्त लगता है काँटे फूल से दिखते हैं, अँधेरे में दिखने लगता है सूनापन आजाद हो जाता है। *** महेश रौतेला

RM

सच्चा प्यार जुनून नहीं.. ❤️❤️ सुकून है.... 🤗🤗

kashish

Baad mai... baad mai kya hi ho jye gaa baad mai khile hoi fhool murjha jye gaa baad mai reste or bigar jye gaa baad mai log apne rang dikhne lage ge baad mai chai tandi ho jye gi baad mai kya kuch nhi ho jye gaa ...

Gautam Patel

જય શ્રીરામ

वात्सल्य

મારે માત્ર તુ જ જોઈએ.બીજું હું જાતે મેળવી લઈશ.અગર તારો સાથ હશે તો જીવનમાં કોઈ કમી નહીં રહે,બસ તુ મારી સાથે હશે.... - वात्सल्य

Vedanta Life Agyat Agyani

यह जीवन का गहरा अनुभव है, जो आत्मा की आवाज़ को व्यक्त करता है। मैं इसे कविता, दोहा, गीत, गज़ल और काव्य के रूप में प्रस्तुत करता हूँ, ताकि इसकी गहराई और सुंदरता और भी निखर सके। **अध्याय 1: जीवन का अनुभव** जी रहा हूँ मैं, अज्ञानी सा, कल का पता नहीं, जीवन है आज का धागा। बोध का प्रकाश है, यही ईश्वर का मार्ग, यह पल है सत्य, यही है सच्चा भाग। **दोहा** जीवन का रंग अनमोल, ना धन से कोई मोल, बोध की रीत में है सुख, यही है जीवन का कुल। **अध्याय 2: आत्मा का विश्वास** कोई गुरु नहीं, कोई धर्म नहीं, बस भीतर का प्रकाश है, यही मेरे लिए सच्चाई। सिख रहा हूँ, सीख रहा हूँ, आनंद में जी रहा हूँ, यह पल है मेरा, यही जीवन की रीत है। **गजल** मन की बात सुन ले, भीतर की आवाज़ को, सुख-दुख दोनों का संग, यही जीवन का राज़ है। मुक्ति का रास्ता खुलता है, जब हम जागरूक हो जाते हैं, जीवन का संगीत है, यही सही सच्चाई का रास्ता। **अध्याय 3: मृत्यु और जीवन का सच** मृत्यु का देख लेंगे चित्र, जन्म का नहीं देखा, यह पल ही है सत्य, जो कभी ना मिटे, यह देखा। दुख आए तो जीवन का नया रंग देखेंगे, सुख आए तो जीवन का अनमोल संग देखेंगे। **दोहा** मृत्यु का भय नहीं, यह तो जीवन का सार है, सुख-दुख दोनों में ही जीवन का उपहार है। **अध्याय 4: विश्वास और कर्म** विश्वास नहीं, पर भीतर है सब कुछ, कर्म की गति से है जीवन की यात्रा। सुख-दुख दोनों को अपनाकर चलना, यह है जीवन का सबसे बड़ा उपहार। **गीत** आओ चलें इस जीवन के सफर पर, सुख-दुख का संग है सच्चे पर, भीतर की आग में जलते रहो, यही कर्म का संगीत है, यही जीवन का प्यार। **अध्याय 5: अस्तित्व का नियम** सुख और दुख दोनों आते हैं, यह तो जीवन का स्वाभाव है, आगे बढ़ते रहो, रुकना नहीं, यही है जीवन का सबसे बड़ा रहस्य। **कविता** चलते रहो, बिना डर के, सुख-दुख दोनों का स्वागत कर, आत्मा की शांति में तैरते रहो, यही है जीवन का असली सार। ᐯEᗪᗩᑎTᗩ 2.0 ᒪIᖴE — ᑌᒪTIᗰᗩTE ᒪIᖴE, IᑎᗪEᑭEᑎᗪEᑎT ᒪIᖴE.

mohansharma

आँखों से दूर हुआ पर दिल से ना हुआ दूर.. कोई काम तो मोहन तूने ढंग से किया होता..

Falguni Dost

कतरा कतरा टूट कर बिखर जाने के बाद पता चला कि चाहत क्या होती है। - फाल्गुनी दोस्त

Shraddha Panchal

જીવન માં આવવા વાળા , દરેક વ્યક્તિ “હોળી” ના તહેવાર જેવા હોય છે , કોઈ રંગ બદલી નાખે છે , તો કોઈ રંગ ભરી ને જીવન રંગીન બનાવી દે છે 🎨🧡🩵🩶🩷💙💚💛💜

Ruchi Dixit

हज़ारों की भी में भी संवाद होता है लगाव हमेशा भारी पड़ता है व्यस्तता पर । - Ruchi Dixit

archana

हम पुरानी सोच के हैं आजकल प्रेम को आज़ादी का नाम दिया जाता है। प्रेमी बनना, फिर प्रेम छोड़ देना, और बाद में किसी और का पति या पत्नी बन जाना — इसे ही आधुनिक सोच कहा जाता है। पर हम पुरानी सोच के हैं। और इस पर हमें कोई शर्म नहीं। हमने प्रेम के नाम पर कभी अपने शरीर को किसी की वस्तु नहीं बनने दिया। न किसी को अधिकार दिया, न किसी को छूने दिया — सिवाय उस इंसान के जो हमारा होने वाला पति होगा। प्रेम करना गलत नहीं है, लेकिन प्रेम के नाम पर मर्यादा खो देना हमें स्वीकार नहीं। आज कहा जाता है — “पहले प्रेमी बनो, फिर पति या पत्नी बन जाना।” लेकिन किसी का हक़ मारकर अपना सुख बनाना हमारी संस्कारों में नहीं। हम अपने धर्म के मार्ग से नहीं हटेंगे अगर हमारा होने वाला पति या हम, उसकी होने वाली पत्नी— कभी प्रेम के नाम पर किसी और से जुड़ाव रख चुके हों, तो वह उनका कर्म है। उसे वे स्वयं सँभालेंगे, या उसी का फल झेलेंगे। हम किसी के अतीत पर फैसला सुनाने नहीं बैठे। हर इंसान अपने कर्मों का खुद उत्तरदायी होता है। लेकिन एक बात बिल्कुल साफ़ है— हम अपने धर्म के मार्ग से नहीं हटेंगे। प्रेम के नाम पर गलत कदम उठाना हमारी सोच नहीं। किसी का अधिकार छीनकर अपना घर बसाना हमें स्वीकार नहीं। आज अगर इसे “पुरानी सोच” कहा जाता है, तो कहते रहो। कम से कम इतना सुकून तो है कि हमने अपनी मर्यादा, अपना आत्मसम्मान और अपना धर्म कभी नहीं छोड़ा। अच्छा जीवनसाथी न लव मैरिज से तय होता है, न अरेंज मैरिज से। सब कुछ परिस्थितियों, कर्मों और भाग्य का खेल है। हम अपने हिस्से का धर्म पूरी निष्ठा से निभाएँगे। बाक़ी, हर किसी को अपने कर्मों का उत्तर खुद देना होगा।

Little Angle

कृष्ण कहते है, यदि लोग समझाने से समझ जाते तो मैं महाभारत होने ही ना देता - Little Angle

Ruchi Dixit

प्रेम लगाव अपनापन उम्मीद अपेक्षा एक साथ मिलकर शिकायत का रुप ले लेती है किन्तु बेवजह विवाद बहस और आदर न होने पर बीच से उम्मीद अपेक्षा पीछे हटने लगती है और सब संतुलन में आ जाता है-Ruchi Dixit

Soni shakya

लाख शिकायतों के बावजूद, आज भी रूह तक सुकून दे जाती है-- "तेरी आवाज" - Soni shaky

ArUu

जो लिखते हैं कड़वा सा, कभी तो उनका हृदय भी नाज़ुक रहा होगा, किसी अधूरी उम्मीद ने शायद उन्हें यूँ सख़्त बनाया होगा। शब्दों में भले चुभन हो उनकी, पर भीतर कहीं कोई कोमल कोना होगा, जिसने हर बार टूटकर भी ख़ामोशी से खुद को जोड़ा होगा। हर तीखी बात के पीछे एक अनकहा सा डर छुपा होगा और हर कठोर मुस्कान में कोई पुराना दर्द सोया होगा शायद वो भी कभी मासूम सपनों में खोए होंगे, किसी की बातों पर हँसे होंगे, किसी के लिए रोए होंगे। उसने भी चाहा होगा कभी बिना डर के मुस्कुराना, पर वक़्त ने सिखा दिया होगा हर एहसास को दिल में छुपाना। कड़वाहट अक्सर सच नहीं होती, वो तो बस एक परत होती है, अंदर कहीं गहराई में एक नर्म सी चाहत सोती है।

Imaran

एहसास के दामन में आंसू गिरा कर देखो, प्यार कितना है कभी हमे आज़मा कर देखो, बिछड़ कर तुमसे क्या होगी दिल की हालत, कभी किसी आईने पर पत्थर गिरा कर देखो. 🩵imran 🩵

ArUu

ये जो लिखते है कड़वा सा कभी तो किसी के लिए उनका हृदय भी नाजुक रहा होगा ArUu ✍️

S Sinha

रिश्तों की नाज़ुक डोर न टूटे कहीं इसके लिए बहुत कुछ सहना पड़ा था खता न थी फिर भी सिर झुकाना पड़ा था

Saliil Upadhyay

पति पत्नि का जन्मो जन्म का नाता  एक मित्र ने पूछा : अगर पति-पत्नी का रिश्ता सात जन्मों का है तो अभी कौन सा जन्म चल रहा है और कितने जन्म बाकी हैं? ये कैसे पता चलेगा? उत्तर भी एक अनुभवी से प्राप्त हुआ... जब पत्नी कहती है, कि मैं तो तुम्हें समझ ही नहीं पा रही हुं? तुम क्या चीज हो? तो समझो पहला जन्म चल रहा है...! और यदि वह कहे, मैं तुम्हारी रग रग से परिचित हूं, तो समझ लो यह सातवां जन्म है.... !!! 😀😀😀

Dada Bhagwan

Do you know that you do not have to forget, you just have to remain in the present? Forgetting is a burden. You cannot forget even if you want to, and besides, the more you try to forget something, the more you will remember it. Read more on: https://dbf.adalaj.org/seKgL9WE #liveinpresent #facts #trending #DadaBhagwan

SAYRI K I N G

प्रेम कहिए तो राधा कृष्ण इश्क़ मोहब्बत प्यार कहिए तो कलयुग के लोग जो अपनो के भी नहीं होते है

Thakor Pushpaben Sorabji

જય શ્રી કૃષ્ણ

SAYRI K I N G

ताउम्र जलते रहे धीमी आँच पर, इसलिए "इश्क़" और "चाय" दोनों मशहूर हुए ।

Parag gandhi

*जिन्दंगी को समझना बहुत मुशकिल हैं कोई सपनों की खातिर अपनों से दूर रहता हैं, और ...* *कोई अपनों के खातिर सपनों से दूर*....!!! *🙏नमस्कार 🍆🌹🙂☕*

SAYRI K I N G

सुना है कि तुम मुस्कुराने लगे हो हार की खुशी पहले मनाने लगे हो

GANESH TEWARI 'NESH' (NASH)

दुख ही दुख है जगत में, सुख का यहाँ अभाव। सुख का फिर संसार में, क्यो रखता तू भाव ?। दोहा --४२६ (नैश के दोहे से उद्धृत) -----गणेश तिवारी 'नैश'

Ravinder Sharma

har har mahadev

GANESH TEWARI 'NESH' (NASH)

ऋगुवेद सूक्ति-(१६)-की व्याख्या-- "मान्तः स्थूर्नो अरातयः" — १०/५७/१ भावार्थ -- हमारे अन्दर कंजूसी न हो। पद विच्छेद -- मान्तः — भीतर, अन्तर में स्थूः/स्थुर्नः — स्थिर न रहें, ठहरें नहीं अरातयः — अराति = दान न करने की वृत्ति, कृपणता, शत्रुता, संकुचित भाव शब्दार्थ-- हे देव! हमारे अन्तःकरण में अराति (कंजूसी, दान न करने की वृत्ति, संकीर्णता) स्थिर न हो। अर्थात — मेरे भीतर कृपणता न रहे। वेदों से प्रमाण-- १. ऋगुवेद (क)--१०/११७/४ “केवलाघो भवति केवलादी।” भावार्थ — जो अकेला खाता है (साझा नहीं करता), वह पाप का भागी होता है। यहाँ कृपणता और स्वार्थ की निन्दा है। (ख) ५/६१/५ "अदातारं परित्यजैत" भावार्थ --जो दान न दे, उसका त्याग करो। वेद में दानी पुरुष की प्रशंसा है और कृपण की निन्दा की गई है। समाज में कंजूस का सम्मान नही। आपके मन्त्र “मान्तः स्थूर्नो अरातयः” (Rigveda १०.५७.१) — हमारे भीतर अराति (कृपणता/अदानशीलता) स्थिर न हो। इसके समर्थन में ऋग्वेद से ही दस श्लोक (मन्त्र) सहित प्रमाण हेतु प्रस्तुत हैं-- (१) ऋग्वेद १०.११७.१ न स सखा यो न ददाति सख्ये सचाभुवे सचमानाय पित्रे। अपास्मात् प्रेयान् न तदोक आस्ते पृणन्तमन्यमरणं चिदिच्छेत्॥ अर्थ: जो मित्र होकर भी मित्र को नहीं देता, वह सच्चा मित्र नहीं। ऐसे अदाता से दूर रहना चाहिए। (२) ऋग्वेद १०.११७.२ न वा उ देवा क्षुधमिद्वधं ददुः उताशितम् उप गच्छन्ति मृत्यवः। उतो रयिः पृणतो नोपदस्यति उतापृणन् मरदितारं न विन्दते॥ अर्थ: देवताओं ने भूख को मृत्यु नहीं बनाया; दानी का धन घटता नहीं, परन्तु अदाता को कोई सहायक नहीं मिलता। (३) ऋग्वेद १०.११७.४ केवलाघो भवति केवलादी केवलादी पाप एव भवति। न स मित्रं कृणुते केवलादी अश्नन्नन्यं स ददाति नृभ्यः॥ अर्थ: जो अकेला खाता है, वह पापी होता है; वह सच्चा मित्र नहीं। (४) ऋग्वेद १०.११७.५ अन्नं बहु कुर्वीत तद्व्रतम्। (भावानुसार उद्धरण) अर्थ: अन्न अधिक बनाओ और बाँटो — यही श्रेष्ठ व्रत है। (५) ऋग्वेद १.१२५.५ यो नो दाता स नः पिता। अर्थ: जो हमें देता है वही हमारा पिता समान है। दाता की सर्वोच्च प्रतिष्ठा। (६) ऋग्वेद ५.६१.५ अदातारं परि त्यजेत्। (भावानुसार) अर्थ: जो दान न दे, उसका संग त्याज्य है। (७) ऋग्वेद ८.१.५ महे च न त्वामद्विवः परा शुक्लाय देयाम्। अर्थ: श्रेष्ठ और योग्य को ही दान देना चाहिए। (८) ऋग्वेद १.८९.१ आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतः। अर्थ: हमारे पास सब ओर से कल्याणकारी संकल्प आएँ। संकीर्णता नहीं, उदार-बुद्धि। (९) ऋग्वेद ६.२८.१ गावो भगा गाव इन्द्रा मघोनः। अर्थ: गौ (समृद्धि) सबके पोषण का साधन है। धन लोक-पोषण के लिए। (१०) ऋग्वेद ३.३२.१० (भावानुसार) इन्द्र संकीर्णता और शत्रुता का नाश करते हैं। निष्कर्ष-- ऋग्वेद बार-बार कहता है— (क) जो बाँटता है वही धर्मी है। (ख) जो अकेला भोग करता है, वह पापी है। (ग) दानी का धन घटता नहीं। (घ) उदारता ही वैदिक धर्म है। इस प्रकार “मान्तः स्थूर्नो अरातयः” — मेरे भीतर कृपणता न हो । इसका भाव स्वयं ऋग्वेद के ही अनेक मन्त्रों में स्पष्ट प्रतिध्वनित है। अन्य वेदों से प्रमाण-- यजुर्वैद-- ४०/२ (ईशावास्य उपनिषद् मन्त्र) “कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः” भावार्थ — कर्तव्यपूर्वक कर्म करते हुए जीना चाहिए। वेद का कर्ममार्ग यज्ञ और दान से जुड़ा है, न कि संचय से। ४. अथर्ववेद --३/२४/५ (भावार्थ) वेद प्रार्थना करता है — “हम दानी बनें, उदार बनें, और धन का सदुपयोग करें।” धन समाज के कल्याण के लिए है। निष्कर्ष-- वेदों का स्पष्ट संदेश है — १- धन का संग्रह केवल अपने लिए न हो। २- यज्ञ, दान, और साझेदारी ही श्रेष्ठ मार्ग है। ३- कृपणता (अराति) आन्तरिक शत्रु है। इस प्रकार “मान्तः स्थूर्नो अरातयः” का भाव पूरे वैदिक साहित्य में प्रतिध्वनित होता है।— उपनिषदों से प्रमाण-- १-ईश उपनिषद-- मन्त्र १ “ईशावास्यमिदं सर्वं… तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम्।” अर्थ — त्यागपूर्वक भोग करो, किसी के धन में लोभ मत करो। यहाँ लोभ और संचय-वृत्ति का निषेध है; त्याग और उदारता का उपदेश। २- तैत्तिरीय उपनिषद् -- ‌ १/११ “श्रद्धया देयम्, अश्रद्धया अदेयम्… श्रीयै देयम्, ह्रियै देयम्।” अर्थ — श्रद्धा से दान करो, सम्मानपूर्वक दान करो। यहाँ स्पष्ट आदेश है कि दानशीलता ही श्रेष्ठ आचरण है। ३. छान्दोग्य उपनिषद--३/१७/४ “दानमेव तपः।” अर्थ — दान ही तप है। यहाँ दान को तपस्वी जीवन का अंग माना गया। ४. बृहदारण्यक उपनिषद् -५/२/३ “दत्त, दयध्वं, दम्यत।” (देवों के लिए ‘दम’, मनुष्यों के लिए ‘दान’, असुरों के लिए ‘दया’) ‘दत्त’ — दान करो; यह मानवधर्म बताया गया है। निष्कर्ष= उपनिषदों का संदेश स्पष्ट है — लोभ और कंजूसी आत्मिक प्रगति में बाधा हैं। त्याग, दान और उदारता ही ब्रह्मविद्या का आधार हैं। “मा गृधः” (लोभ मत करो) — यही “अराति” का निषेध है। अतः “मेरे भीतर कृपणता न हो” यह प्रार्थना उपनिषदों के सिद्धान्तों से पूर्णतः संगत है। गीता से प्रमाण= १. अध्याय ३, श्लोक १२ “इष्टान्भोगान्हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः। तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुङ्क्ते स्तेन एव सः॥” अर्थ — जो मनुष्य देवताओं द्वारा दिए गए पदार्थों को उन्हें (अर्थात् यज्ञ/साझा भाव से) लौटाए बिना स्वयं भोगता है, वह चोर है। केवल अपने लिए उपभोग करना (कृपणता) (2) अध्याय ३, श्लोक १३ “यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः। भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात्॥” अर्थ — जो केवल अपने लिए पकाते और खाते हैं, वे पाप भोगते हैं। “केवलाघो भवति” की ही गीता में पुनरुक्ति है। ३. अध्याय १६, श्लोक १३–१५ असुरी प्रवृत्ति वाले कहते हैं — “इदमद्य मया लब्धम्… इदं अस्तीदमपि मे भविष्यति…” अर्थ — यह सब मेरा है, और भी मेरा होगा। यह संचय और लोभ की वृत्ति (अराति) का वर्णन है, जिसकी गीता निन्दा करती है। ४. अध्याय १७, श्लोक २० “दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे… तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम्।” अर्थ — कर्तव्य समझकर, योग्य स्थान पर, बिना प्रत्युपकार की अपेक्षा से दिया गया दान सात्त्विक है। उदारता को सात्त्विक धर्म कहा गया है। ५. अध्याय १८, श्लोक ५ “यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत्।” अर्थ — यज्ञ, दान और तप त्याज्य नहीं हैं; इन्हें करना ही चाहिए। दान जीवन का अनिवार्य कर्तव्य है। निष्कर्ष-- गीता का स्पष्ट सिद्धान्त है — (1) केवल अपने लिए जीना और संचय करना पाप है। (2) यज्ञभाव, दान और उदारता ही सात्त्विक मार्ग है। (३) लोभ और कृपणता असुरी वृत्ति है। अतः “मेरे भीतर कंजूसी न हो” — यह प्रार्थना गीता के सिद्धान्तों से पूर्णतः संगत है। महाभारत से प्रमाण -- १. अनुशासन पर्व (दानधर्म) “दानं धर्मस्य लक्षणम्।” अर्थ — दान धर्म का लक्षण है। जहाँ दान है, वहीं धर्म है; कृपणता अधर्म है। २. अनुशासन पर्व “अदत्तं नोपभुञ्जीत।” अर्थ — जो बाँटा न गया हो, उसे अकेले न भोगे। केवल अपने लिए संचय व भोग निन्दनीय है। ३. शान्ति पर्व “त्यागेनैके अमृतत्वमानशुः।” अर्थ — त्याग से ही अमृतत्व की प्राप्ति होती है। संचय नहीं, त्याग श्रेष्ठ है। ४. अनुशासन पर्व- “यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत्।” (यह सिद्धान्त महाभारत में भी प्रतिपादित है।) दान अनिवार्य कर्तव्य है। ५. अनुशासन पर्व (भीष्म-युधिष्ठिर संवाद) भीष्म कहते हैं — दान से धन शुद्ध होता है, कृपणता से पाप बढ़ता है। दानशील पुरुष लोक में यश और परलोक में सुख प्राप्त करता है। महाभारत का यह स्पष्ट संदेश है कि-- १-- दान धर्म का मुख्य अंग है। २-- कृपणता पाप और अधर्म है। ३-- त्याग और उदारता से ही कीर्ति और मोक्ष का मार्ग खुलता है। इस प्रकार ऋग्वेद का भाव — “मेरे भीतर कंजूसी न हो” — महाभारत से पूर्णतः समर्थित है। पुराणों में प्रमाण -- “मान्तः स्थूर्नो अरातयः” — मेरे भीतर कृपणता (अराति) न हो — इस भाव के समर्थन में पुराणों से श्लोक तथा अर्थ सहित प्रमाण प्रस्तुत हैं: १-भागवत महापुराण (क) १०.८४.३८ यावद् भ्रियेत जठरं तावत् स्वत्वं हि देहिनाम्। अधिकं योऽभिमन्येत स स्तेनो दण्डमर्हति॥ अर्थ: जितने से पेट भर जाए उतना ही मनुष्य का अधिकार है; जो उससे अधिक को अपना मानता है वह चोर है। संचय और लोभ की स्पष्ट निन्दा। (ख) ११.१९.३३ दानं तपश्च यज्ञश्च पावनानि मनीषिणाम्। अर्थ: दान, तप और यज्ञ ज्ञानी पुरुषों को पवित्र करने वाले हैं। दान को आत्मशुद्धि का साधन कहा गया। (२) विष्णु पुराण -- ३.१२ (दानप्रशंसा) धनं भोगो नाशस्तिस्रो गतयो भवन्ति वित्तस्य। यो न ददाति न भुङ्क्ते तस्य तृतीया गतिर्भवति॥ अर्थ: धन की तीन गतियाँ हैं — भोग, दान या नाश। जो न दान देता है, न भोग करता है, उसका धन नष्ट होता है। कृपणता व्यर्थ है। (३) पद्य पुराण -- (दानमाहात्म्य) अन्नदानं परं दानं विद्यानानमतः परम्। अन्नेन क्षणिका तृप्तिर्विद्यया अमृतं भवेत्॥ अर्थ: अन्नदान श्रेष्ठ है, और विद्या-दान उससे भी श्रेष्ठ; अन्न से क्षणिक तृप्ति, विद्या से अमृतत्व। दान को सर्वोच्च पुण्य बताया गया। (४) गरुड़ पुराण --(प्रेतकल्प) अदत्तदानो यो नित्यं कृपणो धर्मवर्जितः। स याति नरकं घोरं दुःखभोगाय मानवः॥ अर्थ: जो दान नहीं देता और कृपण है, वह घोर दुःख को प्राप्त होता है , कंजूसी का दुष्परिणाम। (५) स्कंद पुराण -- (दानखण्ड) दानं भोगो नाशो वा वित्तस्य त्रिविधा गतिः। दानं श्रेष्ठं ततो नाशः पश्चाद् भोगः प्रकीर्तितः॥ अर्थ: धन की तीन गतियाँ हैं — दान, भोग या नाश; इनमें दान श्रेष्ठ है। उदारता को सर्वोपरि बताया। निष्कर्ष-- पुराणों का एकमत संदेश है — (१) लोभ और संचय (अराति) आत्मिक पतन का कारण हैं। (२) दान, त्याग और परोपकार ही धर्म का सार हैं। (३) जो बाँटता है वही यश, पुण्य और शान्ति पाता है। इस प्रकार ऋग्वेद की प्रार्थना — “मेरे भीतर कंजूसी न हो” — पुराणों द्वारा पूर्णतः समर्थित है। (१) चाणक्य नीति- (क) “त्यजेदेकं कुलस्यार्थे ग्रामस्यार्थे कुलं त्यजेत्। ग्रामं जनपदस्यार्थे आत्मार्थे पृथिवीं त्यजेत्॥” अर्थ — बड़े हित के लिए छोटे का त्याग करो। यहाँ त्याग और व्यापक हित की भावना है, न कि स्वार्थपूर्ण संचय। (ख) “धनं भोगो नाशस्तिस्रो गतयो भवन्ति वित्तस्य।” अर्थ — धन की तीन गतियाँ हैं — भोग, दान या नाश। यदि दान नहीं, तो अंततः नाश ही है। २. भर्तृहरि-- (क)“दानं भोगो नाशस्तिस्रो गतयो भवन्ति वित्तस्य। यो न ददाति न भुङ्क्ते तस्य तृतीया गतिर्भवति॥” (वैराग्य शतक) अर्थ — जो न दान देता है, न भोग करता है, उसके धन की तीसरी गति (नाश) होती है। कृपणता व्यर्थ है। (ख)“क्षीणं न वित्तं परितोषहेतोः…” (भावार्थ) सन्तोष और दान से ही जीवन सार्थक है। (ग)“संतोषामृततृप्तानां यत्सुखं शान्तचेतसाम्। कुतस्तद्धनलुब्धानां इतश्चेतश्च धावताम्॥” अर्थ — संतोषी और शांतचित्त मनुष्यों को जो सुख है, वह धन के लोभियों को कहाँ? लोभ (अराति) दुःख का कारण है। (घ)“न ददाति न भुङ्क्ते स जीवति न जीवति।” अर्थ — जो न दान देता है, न भोग करता है, उसका जीवन व्यर्थ है। कृपणता जीवन को निष्फल बना देती है। सार-- आर्ष नीतिग्रन्थों का स्पष्ट संदेश है (१) धन का संचय ही लक्ष्य नहीं; दान और लोकहित सर्वोपरि है। (२) लोभ और कृपणता दुःख तथा अपयश का कारण है। (३)त्याग, संतोष और उदारता ही श्रेष्ठ जीवनमार्ग हैं। इस प्रकार ऋग्वैदिक प्रार्थना — “मेरे भीतर कंजूसी न हो” — चाण्क्य, भर्तृहरि आदि सभी आर्ष ग्रन्थों में पूर्ण समर्थन पाती है। ------+--------+--------+-------+---

softrebel

आसमान भी नसीब नहीं इन अंधेरी रातों को ताकने के लिए, हम तो जगे हैं यूँ ही, बेसुध-से, पर इन आँखों को कौन बोला हमारे साथ जागने के लिए?! - softrebel

softrebel

आसमान भी नसीब नहीं इन अंधेरी रातों को ताकने के लिए, हम तो जगे हैं यूँ ही, बेसुध-से, पर इन आँखों को कौन बोला हमारे साथ जागने के लिए?! - softrebel

Chaitanya Joshi

ખાટીમીઠી પળો જીવનની બસ માણી લઈએ. ને એકમેકને રુચે એવી મધમીઠી વાણી કહીએ. નથી હોતું સમાંતર માનવજીવન કદી ક્યારેય, વળી વળાંક લેતા ટ્રેકમાં જીવનને ગોઠવી દઈએ. મતભેદને મનભેદ લગી ભૂલેચૂકે ના પહોંચાડીએ, જ્યાં હો ઘર્ષણ ત્યાં સ્નેહનું ઊંજણ પૂરાવીએ. હારીને જીતવુંને વળી જીતીને હારવાની જિંદગી, પહેલ કરી મેલી અહમ્ રૂઠેલાંને સત્વરે મનાવીએ. તો વરસવાના આશિષ ચોક્કસ વિનસના મનમૂકી, ઊભયના દામ્પત્યને સમજશક્તિથી વિકસાવીએ. સંપ, સ્નેહ, સહકાર, સત્ય, સામાધાન સીડી એની, પડકારીને નહિ કિન્તુ સ્વીકારીને જીવન દીપાવીએ. બની જાય જિંદગી મઘમઘતી પ્રેમપ્રાબલ્ય પરિબળે, લક્ષ્મીનારાયણ સમું વીતે જીવન એવું સૌ ઉચ્ચારીએ - ચૈતન્ય જોષી. " દીપક " પોરબંદર.

Bhavna Bhatt

મહાદેવની પાલખી યાત્રા

ibusamee

love is everything everything is you - ibusamee

ibusamee

Always keep silent telling about a truth about a love and jelous because no one is encouraged any one

Jyoti Prajapati

मातृभारती वाले लेखकों से कमाई तो करते हैं लेकिन लेखकों को क्या देते हैं बदले में? उनकी मेहनत का थोड़ा फल तो उन्हें भी मिलना चाहिए।

AKHILABALARAJ

whenever I feel isolated.I imagine more and I think more. that didn't happened and that won't be done tooo.My imaginary world is different to this world.yep good night guysssss.

sonika bhawsar

khawaish kehti hai chalo sath rahe kismat kehti hai duriya achi hai irada kehta hai mar jaye chalo pyar me padh gaye

kashish

Mai bharat hu ... ha vhi jise sone ki chidiya kha jata tha ha vhi jispe kayi mhaveero ne janam liya jaise rani Lakshmi bayi ,dr bhimrao ambedkar ji, bhagat singh, rajgru or na jane kon kon mai ek dharmnipeksh vala desh hu jha sab ek hai kon hindu kon muslim lekin fir aaye kuch aise log jihno ne ye bol kar jagra kiya ki teri cast to choti alag hai to tu muslim hai tu hindu lekin khu ?? jha yumuna ko ma bola jiye usi mai kachra phekh kar nala bana diya jye khu ?? jha ladkiyo ko devi mana jye lekin vhi rep bana asan chahye vo choti bachchi ho ya ek dr. lekin khu?? jha ke log bukhmari se logo ki jye Zaan jye ilaz karne ke paise na ho vhi sharbh milna aasan kise ?? mai ye vala bharat nhi hu .

વૈભવકુમાર ઉમેશચંદ્ર ઓઝા

બાગ તો આ રહ્યો આખો ફૂલોનો, પણ ગમતું ફૂલ એમાં એક જ તું. - સ્પંદન

Saroj Prajapati

लगी हल्के सी ठोकर और तू घबर गया अभी तो है मीलों  लंबा सफर और तू हवा के एक झोंके से ही लड़खड़ा गया। बातों से भी क्या कभी हालात बदलते हैं अपनी धुन के पक्के ही किस्मत के लेख पलटते हैं। मत छोड़ना उम्मीद ,मत होना तू हताश जो नहीं मिला उसे सोच होता तू क्यों उदास! सब्र को बना साथी और खुद पर रख तू विश्वास जो होगा तेरा वह एक दिन खुद आएगा तेरे पास । एक राह बंद हुई तो क्या दस राहें नई खुलेंगी तेरी जिद के आगे हार भी एक दिन हार मानकर झुकेगी।। सरोज प्रजापति ✍️ - Saroj Prajapati

InkImagination

Good night 🌃🌌

રોનક જોષી. રાહગીર

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kajal jha

"जो चीज़ आपको तोड़ती है, वही आपको बनाती है। दर्द छुपा लेना आसान है, समझना मुश्किल। लेकिन वही समझ ही आपको सच में जीना सिखाती है। हर चोट, हर आघात, हर अधूरी ख्वाहिश आपकी रूह को मजबूत बनाती है। जो आपको गिरा सकती है, वही आपको ऊँचाई भी दिखाती है। इसलिए डरना मत, सहना मत छोड़ो— क्योंकि हर अँधेरा, एक नई रोशनी का पैग़ाम रखता है।" - kajal jha

Ashish jain

॥ भगवान बाहुबली स्तुति ॥ दोहा प्रथम तीर्थंकर आदिप्रभु, ऋषभदेव के लाल। त्याग मूर्ति बाहुबली, नमो-नमो हर काल॥ अडिग खड़े गोमटेश्वर, पर्वत शिखर विशाल। शांत सौम्य मुखमुद्रा, आशीष झुकाए भाल॥ स्तुति (लयबद्ध गायन हेतु) अचल खड़े तुम वन के भीतर, वर्ष बीत गए भारी, तन पर लिपटी बेलें अद्भुत, महिमा तुम्हारी न्यारी। पैर जमे हैं पृथ्वी के भीतर, मन है अम्बर पार, वंदन बारम्बार प्रभुवर, वंदन बारम्बार ॥ १ ॥ काम-क्रोध और मान-मोह को, क्षण में तुमने त्यागा, चक्रवर्ती का सुख तज करके, संयम पथ पर जागा। भरत चक्र के द्वंद्व को जीता, फिर भी मन वैराग्य, धन्य हुआ वह स्वर्ण-कलश, और धन्य हुआ सौभाग्य ॥ २ ॥ सर्प लपेटे देह खड़ी है, पक्षी नीड़ बनाते, मौन तपस्या देख तुम्हारी, देव सुमन बरसाते। ना हिलते ना डुलते स्वामी, योग-अग्नि उजियारी, बाहुबली तुम संकट-भंजन, मंगल-रूप अविकारी ॥ ३ ॥ केवलज्ञान की ज्योति जली जब, मिटा तिमिर का साया, सिद्ध-शिला पर जा विराजे, छोड़ मोह की माया। हम भी आए शरण तुम्हारी, दे दो विमल स्वभाव,आशीष मांगे मुक्ति पद, कर दो प्रभु निस्तार ॥ ४ ॥ दोहा विंध्यगिरि की गोद में, खड्गासन भगवान। बाहुबली के चरणों में, आशीष करे प्रणाम॥

Archana Singh

" काश ... ! इन आंसुओं की तरह याद आने वाले भी आ जाते "...!! अर्चना सिंह ✍🏻 - Archana Singh

ek archana arpan tane

હિંમત કયારેય હારવી ન જોઈએ સુરજ ભલે ધગધગતો તપે પણ સમંદર ને સુકવી શકતો જ નથી. - ek archana arpan tane

Dewy Rose

NFAK🙌

Imaran

जिक्र करता है ये दिल सुबह शाम तेरा, बहते हैं आँसू और बनता है नाम तेरा, किसी और को क्यों देखे ये आँखे मेरी, जब दिल पर लिखा है मेरे नाम तेरा. 🫶imran 🫶

Arun Mishra

प्रिय मित्र अच्छा यह बताए अगर किसी भी रिश्ते में अगर 4 साल हो गए हो , ओर लड़की शादी के लिए अपने घर वालों को नहीं बता पा रही हो तो क्या उस रिश्ते से उम्मीद रखनी चाहिए या खत्म कर देना चाहिए , लड़के को आगे दूसरी जगह कर लेना चाहिए या इंतजार करना चाहिए 🙏🙏🙏🙏

Shraddha Panchal

कौन जाने किसके अंदर क्या है? इंसान एक गहरे समंदर सा है किनारे पर तो बस लहरो का शोर है पर भीतर गहराई का इंसान कोई और है 🌋

उषा जरवाल

क्रोध को कभी क्रोध समाप्त नहीं कर पाया । शक्ति को भी शिव ने सदैव झुककर मनाया । उषा जरवाल ‘एक उन्मुक्त पंछी’

Aachaarya Deepak Sikka

Reciting Hanumanji’s 12 names brings an end to all sorrows and problems. Let’s explore the 12 names of Hanumanji. Why observe a Tuesday fast and the method of worship. How to get relief from Shani Sade Sati and Dhaiya. Rules and precautions to keep in mind while reciting on a rosary. How to recite Hanumanji’s 12 names. Why is a flag offered to Hanumanji. How to recite Bajrang Baan. Hanuman Pingaksha Anjanisut Amitvikrama Vayuputra Uddhikraman Mahabala Rameshta Sitashokavinashana Dashagrivadarpana Phalgunsakha Lakshmanapranadata *How to recite the names?* Recite these 12 names of Hanumanji in the morning, evening, and before sleeping at night. As soon as you wake up in the morning, sitting on your bed, recite these names 11 times without stopping. Benefits of recitation: A person who regularly recites Hanumanji’s names attains their desired goals. Reciting these 12 names 11 times after waking up gives the person longevity. Reciting Hanumanji’s name in the afternoon brings wealth. Reciting in the evening brings family happiness. Reciting at night brings victory over enemies. *Rules and precautions while reciting on a rosary:* 1. Ensure that the rosary has at least 27 and a maximum of 108 beads, with a knot between each bead. 2. The rosary should be covered with a cloth while reciting the mantra. 3. Before starting the mantra recitation, offer a prayer for its success. 4. Do not wear the rosary used for mantra recitation. 5. After the recitation, store the rosary in a temple. 6. Always use your own rosary and do not share it with others. *Benefits of Bajrang Baan recitation:* Reciting Bajrang Baan protects from enemies' conspiracies. Recite with a pure heart for 21 days, sitting in one place, and resolve to follow the path of truth as Hanumanji only supports the virtuous. When to start the Tuesday fast? You can begin the fast on the first Tuesday of any Shukla Paksha (waxing phase of the moon). Along with starting the fast, resolve to observe it for 21 or 45 Tuesdays. Method of worship during the Tuesday fast: After completing your morning duties, set up an idol or picture of Hanumanji in the northeast corner of your home. Offer red flowers, a garland, and sindoor to Hanumanji. Then offer a sweet like boondi laddoo or a mixture of chickpeas and jaggery. Light incense and a ghee lamp, and recite the Sundarkand or Hanuman Chalisa. After the recitation, perform the aarti and ask for forgiveness for any mistakes. Break the fast after sunset with a meal. *Methods to please Hanumanji:* Offering sindoor and jasmine oil to Hanumanji is beneficial. Offering a red flag at a Hanuman temple on Tuesday brings prosperity and success in legal matters. Offering Tulsi garlands to Hanumanji ensures continued prosperity. Reciting Ram’s name brings great joy to Hanumanji. Shani’s Sade Sati and Dhaiya: Shani stays in each zodiac sign for about 2.5 years, affecting that sign, the one before, and the one after, known as Sade Sati. Shani's slow movement brings challenges like illness, fear, loss, and other difficulties. To mitigate the effects of Shani’s Sade Sati and Dhaiya, perform japa (recitation), havan (fire ritual), and charity. Reciting Shani mantra or Hanuman Chalisa, wearing a ring made of iron from a horse’s nail, and offering water and lighting a lamp at the base of a Peepal tree on Saturdays can bring relief. Apka Apna Aachaarya Deepak Sikka Founder of Graha Chaal Consultancy

Paagla

https://youtube.com/shorts/mGsmI_Pqrb0?si=ADeZOJZu4FTOIqg7

Paagla

https://youtube.com/shorts/Ok3cf-whqfs?si=5bmNPUc5SYm-8mqk

Ruchi Dixit

जिसे धीरे - धीरे पता चल रहा हो वह क्या है वह दूसरों के मूल्यांकन का मोहताज नही होता ।- Ruchi Dixit

Soni shakya

दिल में जो दफन है, उसका शोर मत पूछो ..! हम खामोश है--इसका मतलब ये नहीं कि खाली है..!! - Soni shakya

Nirali patel

हम वो हैं जो क़िस्मत के चाँटों के शोर पे नाचते हैं जितनी ज़ोर का चाँटा, हम उतनी ज़ोर से नाचते हैं... -Nirali

prit tembhe

🗒️✍️❣️

prit tembhe

रॉंह.... राह पर चलते चलते कुछ अजनबी हसीन मिल गए...... ठोकर खाकर भी आगे थे ऐसे भी कुछ नकाब मिल गए.... सोचा,की खैर अब आया ही हूँ तो आगे निकल जाऊ..... तरह तरह के लोग होते है दुनिया में.. उनसे थोड़ा अब मुकर ही जाऊ.... सवाल उठा था मन में, मैं तो आगे जाने वाल था.....? तभी कोई फंदा गले में आके फंसा.. वरना जवाब को छूकर बस लौटने ही वाल था..... कुदरत ने भी क्या खेल रचा, जैसे मौत के कुएं से लौट बचा.... मंजिल की तलाश में थे हम, रास्ता तो हमारे लिए अपने आप सजा......!

Miss Chhoti

#રમકડું અને લાગણી આજના સમયમાં માણસના સંબંધો પણ 'ટેડી બિયર' જેવા થઈ ગયા છે. જ્યારે કોઈ એકલું હોય, મન ભરાઈ આવ્યું હોય ત્યારે એ આપણને ગળે લગાવે છે. એ સમયે આપણે એમના માટે દુનિયાની સૌથી વહાલી વ્યક્તિ હોઈએ છીએ. પણ જેવું એમનું મન ભરાઈ જાય અથવા જિંદગીમાં કોઈ નવું આકર્ષણ આવે, એટલે એ જ ગળે લગાવનાર હાથ આપણને એક ખૂણામાં ધકેલી દે છે. આ લેખનો સાર એટલો જ છે: બીજા માટે નરમ અને પ્રેમાળ જરૂર બનો, પણ એટલા 'સોફ્ટ' ન બનો કે લોકો તમને પોતાની મરજી મુજબ વાપરીને મૂકી દે. યાદ રાખો, તમે કોઈના મન બહેલાવવાનું સાધન નથી, પણ એક જીવતું-જાગતું વ્યક્તિત્વ છો. https://www.matrubharti.com _Miss chhoti ✍️

MASHAALLHA KHAN

तू आया तो मुझको सूकं है मिला दिल की धड़कन बड़ी और दिल को जनूं है मिला, तेरी रहमत के हम हमेशा कर्जदार है हमे आज भी तुमसे उतना ही प्यार है, कोई वजाह ही होगी जो जुदा थे हम वरना हम आज भी वफादार है, और बस तुझसे मोहब्बत थी और कभी ना था गिला बस तुझको बताने का वक्त ही ना मिला .

Priya kashyap

हमसे नफरत भी जरा ध्यान से करना जरा सी चूक हुई तो मोहब्बत हो जायेगी...

yeash shah

નવ ગ્રહોના ગુણો અને સુખી જીવનના ઉપાયો * સૂર્ય - સ્વાસ્થ્ય: (યોગ અને કસરત) * ચંદ્ર - શાંતિ અને પ્રસન્નતા: (ધ્યાન અને પ્રાણાયામ) * મંગળ - સાહસ: (રમતગમત) * બુધ - વાકચાતુર્ય: (સંવાદમાં નિખાર/વાતચીતની કળા) * ગુરુ - જ્ઞાન: (પુસ્તકો અને કોર્સ) * શુક્ર - પ્રેમ અને આકર્ષણ: (સારી રીતે તૈયાર થવું/સુવ્યવસ્થિત રહેવું) * શનિ - ધૈર્ય અને સંતોષ: (જે કાર્યો આંતરિક ખુશી અને શાંતિ આપે તેવા કર્મો કરવા) * રાહુ/કેતુ - ભય અને વ્યસન મુક્તિ / પીડા મુક્તિ અને સહજતા: (પ્રસન્નતા અને ખુશી આપનારા વ્યક્તિઓ તથા વિચારોની સંગત કરવી) > જે વ્યક્તિ નિત્ય આ નવ ગ્રહોના નવ ગુણોને નિખારે છે, તે હંમેશા સુખી રહે છે.

Kamini Shah

એક વાત કહું તને મા તું મને બહુ ગમે… -કામિની

Simple__girls__9894

🌸🎀🦩💕🌷 नज़र को नज़र से नज़र ना लगे, कोई अच्छा भी इस कदर ना लगे तुझे देखा है इस नज़र से, जिस नज़र से तुझे मेरी नज़र ना लगे𓏧🤍᪲᪲᪲ᥫ᭡⃝🧚🏻‍♀️ 🩰˚˖𓍢 🦢✧˚.🎀

shree

ase to muje gehno ka boj lagta hai, pr tumhare payar me me sajna chahti hu... tham kar hath tumhara tumhare nam ki chudiya pehna chahti hu.. shokh nahi hai sringar ka muje pr tumhare payr me me 16 sringar chahti hu lagakar sindur tumhare nam ka me tumhare rang rangna chahti hu ase to boj lagte hai gehne muje pr tumhare pyar me me sajna chahti hu... ♥️

Hetu P

"લોકો કહે છે મીરાં પાગલ છે, પણ એને ક્યાં ભાન છે, એના ઝેરના પ્યાલામાં પણ છુપાયેલો એનો કાન છે. નથી જોઈતું રાજપાટ કે નથી જોઈતી કોઈ માયા, મીરાં તો બસ શ્યામની મૂર્તિમાં ખોવાયેલી એક કાયા છે."

Shailesh Joshi

આપણું ઘર હોય, કે પછી આપણું મન, બહારની દુનિયાની ઝાકમઝોળ કરતા, આપણા ઘરની, અને આપણા મનની શાંતિ, એ આપણી સૌથી પહેલી અને સૌથી મોટી જવાબદારી છે. - Shailesh Joshi

Narendra Parmar

✔️💯

Imaran

सच्चा प्यार वही है जो… आँखों से काजल बहने न दे…. और होठो पर लिपस्टिक रहने न दे….. कोई कहता है प्यार नशा बन जाता है, कोई कहता है प्यार सज़ा बन जाता है, पर प्यार करो अगर सच्चे दिल से, तो प्यार जीने की वजह बन जाता है 💞imran 💞

રોનક જોષી. રાહગીર

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SADIKOT MUFADDAL 《Mötäbhäï 》

मूर्ख और शंख दूसरों के फूंक मारने से ही बजते हैं - SADIKOT MUFADDAL 《Mötäbhäï 》

Manjibhai Bavaliya મનરવ

ગીત મંજરી,પ્રેમ ની યાદ લય મેળ કાવ્ય ગીત રચના વહે વેળા ને એમ વહી વાશુ, ફરતા રહે જોબનને જરી જાશું. યૌવન ભરી જેહ મલકે છે સોણલાં. નભ ઘેરાય મેઘ ને ટહુકે છે મોરલા. મળે જો મેળ તો મન મોહી જાશું... ભરાયે ઉમંગ ને યાદો ના ઓણલા. રુપ ઘેલા રંગ માં હેત ના હોરલા. પરમ ની પ્રિત ને પાંગરી ગાશું...... હળતા હૈયા માં ગમ્મત ગુલાલ ના. ઉઘડે સવાર અને મોતી ધુમ્મસના. શીતળતા ની સુવાસે પ્રસરી પાશુ..... ઘરી ધીર એ નરમાઈ નીરવની. પુરણ પ્રિત પાંગરે છે પ્રણયની. અંજવાળી રાત ને રંગ ભરી જાશું. મનરવ ના મેળ મુલ મલકના. તનરવ ના તંગ તંગ ચલકના. ખગ કલરવ નાદે ખંખોળી ખાવું....‌ મનજીભાઈ કાળુભાઇ મનરવ

Thakor Pushpaben Sorabji

ગામડાની સવાર ગામડું તો ગામડું જ છે...... વાત જ એની કંઈક નોખી છે!............ સવારની સોહામણી સળવળ છે  મંદિરની ઝાલરને પંખીના સાદ છે!........ ખેતરે ઝાકળ કેરી રૂપેરી ચાદર છે"પુષ્પ" તેમાં સૂરજના કિરણોના રૂડા તે નૂર છે!..... દોહવાતા દૂધણા‌ના મીઠા એ સૂર છે  ભાંભરતા વાછડાના કેવા મીઠેરા નાદ છે!.... ઝાડવે કેવા પેલા પંખીઓના ગાન છે જુદા એ સૂરોમાં અનોખો આનંદ છે!......... ખળ ખળ વહેતાં પાણીડાની ધાર છે  ઊડતી વરાળનો નજારો નયનરમ્ય છે!....... ખેતરેને વગડે શબનમ કેરી ઓઢી ચાદર છે  તુષારની એ બૂંદોમાં રવિના તેજનો પ્રકાશ છે!... ખીલતી ઉષાની શોભા પળ બે પળની છે  માણો પ્રકૃતિ તો ધરતી પર જ સ્વર્ગ છે!....... જય શ્રી કૃષ્ણ:પુષ્પા.એસ.ઠાકોર

Dada Bhagwan

हम बचपन से ही स्वर्ग और नर्क के बारे में सुनते आए हैं। लेकिन हम नहीं जानते कि हमें स्वर्ग या नर्क कैसे मिलता है और वास्तव में स्वर्ग और नर्क कहाँ हैं। आइए, इन गूढ़ प्रश्नों के उत्तर पूज्यश्री दीपकभाई से विस्तार से जानते हैं। https://youtu.be/i3TIHbAOoic #Spirituality #video #trending #DadaBhagwanFoundation

Dada Bhagwan

हम बचपन से ही स्वर्ग और नर्क के बारे में सुनते आए हैं। लेकिन हम नहीं जानते कि हमें स्वर्ग या नर्क कैसे मिलता है और वास्तव में स्वर्ग और नर्क कहाँ हैं। आइए, इन गूढ़ प्रश्नों के उत्तर पूज्यश्री दीपकभाई से विस्तार से जानते हैं। https://youtu.be/i3TIHbAOoic

Saliil Upadhyay

आज की हंसी बीवी पति के साथ मंदिर गयी और मन्नत का धागा बांधके मन्नत माँगी फिर हड़बड़ाई और धागा खोल दिया...! पति : क्या हुआ धागा क्यों खोल दिया ? पत्नी : मैंने मन्नत माँगी थी कि आपकी ज़िंदगी की तमाम मुश्किल दूर हो जाये, फिर अचानक ख्याल आया कहीं मैं ही ना निपट जाऊं....!

mohansharma

मोहन कबहू ना कीजिये बेमेलों से मेल.. मेल जोल करके सदा ये कर जाते खेल..

वात्सल्य

તમને જોયાં ને મન પીગળી ગયું... ઝઘડો છોડી મન માની ગયું. - वात्सल्य

Dr Darshita Babubhai Shah

मैं और मेरे अह्सास प्रेम विवाह प्रेम विवाह का बंधन निराला होता हैं l दिल से जुड़ा रिसता सुहाना होता हैं ll दिवाने मोहब्बत का वास्ता है कि l जज़्बातों का यकी दिलाना होता हैं ll जिसकी चाहतों में जुडे हों उसकी l आगोश में ख़ुद को मिटाना होता हैं ll १६-२-२०२६ "सखी" डो. दर्शिता बाबूभाई शाह

Aruna N Oza

🙏🙏

Meghna Sanghvi

જીવંત રહેવા માટે કંઈક ને કંઈક લખતાં - વાંચતા રહેવું ખુબ જરુરી છે. કારણકે, અમુક શબ્દો આપણને જીવવાં માટે ફરી પ્રેરિત કરી જતાં હોય છે. 😊😊😊 - Meghna Sanghvi

Gajendra Kudmate

ख़ुशीयाँ बाँटने से बढ़ती हैं कहता रहा सारा जहाँ हमसें इस हीं गलतफ़हमी में पड़कर साहब हम सबकुछ अपना लुटा चुके हैं गजेन्द्र

Tr. Mrs. Snehal Jani

પ્રિય ટપાલ, તારો પણ એક જમાનો હતો. સુખદુઃખનાં સંદેશાઓ આપી તુ બધાને ખુશ કે નિરાશ કરતી હતી. વાર્ષિક પરીક્ષાનાં પરિણામ માટે અમે તારી રાહ જોતાં હતાં. તારા પર પડેલું આંસુનું એક ટીપું લખનારની વ્યથા આડકતરી રીતે જણાવતું હતું. વાર તહેવારે શુભેચ્છા સંદેશાઓ તારા થકી જ મળતાં હતાં. ભલે તને આવતાં વાર લાગતી હતી, પણ રાહ જોવાની મજા હતી. હજુ પણ એ જમાનો પાછો આવે એની રાહ જોઉં છું. ભલે આંગળીનાં ટેરવે હવે સંદેશાઓ પહોંચે છે, પણ લાગણીઓ એમાં અનુભવાતી નથી. તને અમે સાચવી શકતાં હતાં. આ ડિજિટલ સંદેશાઓ તો ક્યારે ડીલીટ થઈ જાય છે ખબર પણ નથી પડતી. આશા રાખું કે તું સદાય માટે લુપ્ત ન થઈ જાય. તારું અસ્તિત્વ કાયમ માટે રહે.

GANESH TEWARI 'NESH' (NASH)

हानि-लाभ, जीवन-मरण, यश-अपयश में भेद। कभी नहीं ज्ञानी करे, रखता भाव अभेद।। दोहा--४२५ (नैश के दोहे से उद्धृत) -----गणेश तिवारी 'नैश'

GANESH TEWARI 'NESH' (NASH)

ऋगुवेद सूक्ति-- (१५) की व्याख्या तवेद्धि सख्यम् स्तृतम्। १/१५/५ भावार्थ -प्रभो ! आपकी ही मैत्री सच्ची है। पद-विश्लेषण-- तव = तेरा / आपका एव इद्धि (एव इद्धि/एव हि) = निश्चय ही, वास्तव में सख्यम् = मित्रता, मैत्री, सखा-भाव स्तृतम् (स्तृत) = विस्तृत, फैलाया हुआ, स्थापित भावार्थ-- “निश्चय ही आपकी (हे प्रभु!) मैत्री ही सर्वत्र स्थापित और शेष रहने वाली है।”इसे सरल शब्दों में — “हे प्रभु! अंततः आपकी ही मैत्री स्थिर और शाश्वत है।” यह भाव इस सत्य को व्यक्त करता है कि संसार की अन्य मित्रताएँ क्षणभंगुर हो सकती हैं, परन्तु ईश्वर का सखा-भाव अखंड और अटल है। गीता से साम्य-- श्रीमद्भगवद्गीता (9.18) में भगवान कहते हैं— “सुहृदं सर्वभूतानां…” अर्थात् मैं समस्त प्राणियों का हितैषी मित्र हूँ। इसी प्रकार (9.22) में भगवान कहते हैं-- “योगक्षेमं वहाम्यहम्” भावार्थ — जो भक्त अनन्य भाव से मेरा स्मरण करता है, उसके कल्याण का भार मैं स्वयं लेता हूँ। उपनिषद से साम्य-- श्वेताश्वतर उपनिषद (6.23) — “यस्य देवे परा भक्तिः…” भावार्थ — जिस साधक की ईश्वर में परम भक्ति है, उसके लिए दिव्य ज्ञान प्रकट होता है। यहाँ भी ईश्वर-सखा की निकटता का संकेत है। पुराणों से उदाहरण-- श्रीमद्भागवत महापुराण में ध्रुव और प्रह्लाद की कथा स्पष्ट करती है कि जब सबने साथ छोड़ा, तब प्रभु की ही मैत्री शेष रही और वही रक्षक बनी। "तवेद्धि सख्यम् स्तृतम्” का गूढ़ संदेश भी यही है कि संसार की मित्रता परिवर्तनशील है, परन्तु परमात्मा की मैत्री अनन्त और सर्वव्यापी है। भक्त के लिए अंतिम आश्रय केवल ईश्वर-सखा ही है।श्रीमद्भगवद्गीता से प्रमाण (1) अध्याय 9, श्लोक 18 “गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत्…” अर्थ — भगवान ही गति, पालनकर्ता, शरण और सुहृद (सच्चे मित्र) हैं। यहाँ स्पष्ट कहा गया कि परमात्मा ही वास्तविक सुहृद (हितकारी मित्र) हैं। (2) अध्याय 5, श्लोक 29 “भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम्। सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति॥” भावार्थ — जो मुझे समस्त प्राणियों का सुहृद (मित्र) जानता है, वह शान्ति को प्राप्त होता है। यह सीधे “प्रभु की ही सच्ची मैत्री” को सिद्ध करता है। (3) अध्याय 9, श्लोक 22 “अनन्याश्चिन्तयन्तो मां… योगक्षेमं वहाम्यहम्।” भावार्थ — जो अनन्य भाव से मेरा स्मरण करते हैं, उनके योग-क्षेम का वहन मैं स्वयं करता हूँ। सच्चा मित्र वही जो रक्षा और पालन करे। उपनिषदों से प्रमाण-- (१) श्वेताश्वतर उपनिषद (4.6–7) “द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया…” भावार्थ — एक ही वृक्ष पर दो सुंदर पक्षी (जीव और परमात्मा) सखा (मित्र) रूप से साथ स्थित हैं। यहाँ परमात्मा को जीव का अनादि-सखा कहा गया है। (२) कठोपनिषद् (2.2.13) “नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनानाम्…” भावार्थ — वह परमात्मा सभी नित्यों में नित्य और चेतनों में चेतन है, जो सबका पालन करता है। यही शाश्वत आश्रय और सखा है। (३) मुण्डकोपनिषद् (3.1.1) पुनः “द्वा सुपर्णा…” मन्त्र द्वारा परमात्मा को जीव का सहचर-सखा कहा गया है। निष्कर्ष-- गीता और उपनिषद दोनों यह सिद्ध करते हैं कि — परमात्मा ही “सुहृदं सर्वभूतानाम्” हैं। जीव और ईश्वर का संबंध “सखा” के रूप में अनादि है। संसारिक मैत्री क्षणिक है, परन्तु ईश्वर की मैत्री शाश्वत और अखंड है। अतः “तवेद्धि सख्यम् स्तृतम्” का भाव वेदान्त से पूर्णतः समर्थित है हे प्रभु! आपकी ही मैत्री सर्वत्र व्याप्त और अविनाशी है। अन्य उपनिषदों से प्रमाण -- (४) बृहदारण्यक उपनिषद् (4.3.21) “एष त आत्मा सर्वान्तरः…” भावार्थ — यह आत्मा (परमात्मा) सबके भीतर स्थित है। जो सर्वान्तर्यामी है, वही सच्चा निकटतम सखा है; बाह्य मित्र दूर हो सकता है, पर अन्तर्यामी नहीं। (५) छान्दोग्य उपनिषद् (6.8.7) “तत्त्वमसि श्वेतकेतो।” भावार्थ — हे श्वेतकेतु! तू वही (ब्रह्म) है। जीव और ब्रह्म का अभिन्न संबंध बताकर यह दर्शाता है कि परमात्मा से बढ़कर कोई आत्मीय नहीं। (६) तैत्तिरीयोपनिषद् (2.7) “रसो वै सः। रसं ह्येवायं लब्ध्वानन्दी भवति।” भावार्थ — वह (ब्रह्म) ही आनन्दस्वरूप है; उसी को प्राप्त कर जीव आनन्दित होता है। सच्चा मित्र वही जो परम आनन्द दे — यह गुण केवल परमात्मा में है। (७) ईशोपनिषद् (मन्त्र 6–7) “यस्मिन् सर्वाणि भूतानि आत्मैवाभूद्विजानतः…” भावार्थ — ज्ञानी के लिए सब प्राणी आत्मस्वरूप हो जाते हैं। जब सबमें एक ही परमात्मा है, तो वही सर्वव्यापी सखा है। (८) मैत्रायणी उपनिषद् (6.17) “एको देवः सर्वभूतेषु गूढः…” भावार्थ — एक ही देव सब प्राणियों में गुह्य रूप से स्थित है। वही अन्तर्यामी, वही शाश्वत सहचर। इन उपनिषदों का समवेत संदेश यह है कि— परमात्मा सर्वान्तर्यामी है। जीव का उससे संबंध अभिन्न और नित्य है। वही आनन्दस्वरूप और सच्चा हितैषी है। अतः “तवेद्धि सख्यम् स्तृतम्” का वेदान्तीय समर्थन स्पष्ट है — हे प्रभु! आपकी ही मैत्री सर्वव्याप्त, अन्तर्यामी और सच्ची है। पुराणों से प्रमाण-- (१) श्रीमद्भागवत महापुराण (क) ध्रुव चरित्र (चतुर्थ स्कन्ध) जब ध्रुव को पिता और सौतेली माता से तिरस्कार मिला, तब उन्होंने परमात्मा की शरण ली। भगवान प्रकट होकर उन्हें ध्रुवपद दिया। संदेश — जब सांसारिक संबंध छूट जाते हैं, तब प्रभु की ही मैत्री शेष रहती है। (ख) प्रह्लाद चरित्र (सप्तम स्कन्ध) हिरण्यकशिपु ने प्रह्लाद को अनेक कष्ट दिए, पर भगवान नृसिंह ने प्रकट होकर रक्षा की। “नैवोद्विजे पर दुर्व्यसनादसाधो…” (7.9.43) प्रह्लाद कहते हैं — मुझे किसी भय की चिन्ता नहीं, क्योंकि आप मेरे रक्षक हैं। परमात्मा ही नित्य सखा और रक्षक हैं। (२) विष्णु पुराण (1.19) “नारायणः परोऽव्यक्तात्…” वह नारायण सबके कारण और आश्रय हैं। जो समस्त जगत का आश्रय है, वही शाश्वत मित्र है। (३) शिव पुराण मार्कण्डेय ऋषि की कथा में जब यमराज प्राण लेने आए, तब भगवान शिव ने प्रकट होकर अपने भक्त की रक्षा की। संदेश — देवाधिदेव शिव अपने भक्त के सच्चे सखा बनकर मृत्यु से भी रक्षा करते हैं। (४) पद्म पुराण “सर्वदा सर्वभावेन भजनीयः जनार्दनः।” भावार्थ — जनार्दन (भगवान) का सर्वदा सर्वभाव से भजन करना चाहिए। क्योंकि वही परम हितैषी और अनन्त सखा हैं। निष्कर्ष-- पुराणों का समवेत संदेश यह है — भक्त का अन्तिम और अटल आश्रय केवल भगवान हैं। सांसारिक मित्रता परिवर्तनशील है, पर ईश्वर की मैत्री नित्य है। संकट में वही रक्षा करते हैं और कल्याण करते हैं। अतः “तवेद्धि सख्यम् स्तृतम्” का भाव पुराण-साहित्य से पूर्णतः समर्थित है — हे प्रभु! आपकी ही मैत्री सर्वत्र व्याप्त और शाश्वत है। महाभारत से प्रमाण-- (1) उद्योगपर्व — श्रीकृष्ण की पाण्डवों के प्रति सख्यता श्रीकृष्ण स्वयं कहते हैं कि पाण्डव उनके अत्यन्त प्रिय हैं और वे उनके हित के लिए सदा तत्पर हैं। यहाँ भगवान का सखा-भाव स्पष्ट है — वे केवल उपदेशक नहीं, बल्कि संकट में साथ खड़े होने वाले मित्र हैं। (2) भीष्मपर्व (गीता प्रसंग) अर्जुन के विषाद में श्रीकृष्ण ने सारथि बनकर मार्गदर्शन दिया। यह केवल ईश्वर का उपदेश नहीं, बल्कि सच्चे मित्र का कर्तव्य है — सखा बनकर रक्षा और मार्गदर्शन करना। (3) वनपर्व — द्रौपदी की रक्षा द्यूतसभा में जब सब मौन रहे, तब द्रौपदी ने कृष्ण को पुकारा। भगवान ने उसकी लाज की रक्षा की। संदेश — जब सांसारिक मित्र साथ छोड़ दें, तब प्रभु की मैत्री ही शेष रहती है। (4) शान्तिपर्व “न मे भक्तः प्रणश्यति” (यह भाव महाभारत में भी प्रतिपादित है) भावार्थ — भगवान अपने भक्त का कभी नाश नहीं होने देते। यही शाश्वत सखा का लक्षण है। (5) नारायणीयोपाख्यान (शान्तिपर्व) यहाँ भगवान नारायण को सब प्राणियों का परम आश्रय और हितैषी बताया गया है। परमात्मा ही अन्तिम शरण और नित्य मित्र हैं। महाभारत का संदेश स्पष्ट है— श्रीकृष्ण ने पाण्डवों के साथ सखा रूप में व्यवहार किया। संकट में रक्षा, मार्गदर्शन और आश्रय दिया। सांसारिक संबंध टूट सकते हैं, पर ईश्वर की मैत्री अटूट है। अतः “तवेद्धि सख्यम् स्तृतम्” का भाव महाभारत से पूर्णतः समर्थित है — हे प्रभु! आपकी ही मैत्री अंततः स्थिर और शाश्वत है। हितोपदेश(मित्रलाभ) -- “आपत्सु मित्रं ज्ञायते।” भावार्थ — विपत्ति में ही सच्चे मित्र की पहचान होती है। इस सिद्धान्त से स्पष्ट है कि जो हर परिस्थिति में साथ दे, वही सखा है। भक्त के लिए यह गुण परमात्मा में पूर्णतः विद्यमान है। चाणक्य नीति-- “त्यजेदेकं कुलस्यार्थे ग्रामस्यार्थे कुलं त्यजेत्।” (नीति का व्यापक सिद्धान्त — उच्चतर हित के लिए निम्न का त्याग) तथा — “आपदि मित्रं जानीयात्।” चाणक्य स्पष्ट करते हैं कि संकट में जो साथ दे वही सच्चा मित्र है। संसारिक मित्र सीमित होते हैं, पर ईश्वर का आश्रय सर्वकालिक है। नीतिशतकम् — भर्तृहरि “सज्जनाः परहितनिरता भवन्ति।” भावार्थ — सज्जन सदा दूसरों के हित में लगे रहते हैं। तथा एक अन्य नीति-वाक्य — “दुर्जनः परिहर्तव्यः…” भर्तृहरि का तात्पर्य है कि सच्चा मित्र वही है जो निष्कपट हित करे। परमात्मा “परहितनिरत” का सर्वोच्च आदर्श हैं। इन नीति-ग्रन्थों का संयुक्त संदेश है कि सच्चा मित्र संकट में पहचाना जाता है। जो निष्काम होकर हित करे वही सखा है। जो सर्वदा, सर्वत्र रक्षा और कल्याण करे वही परम मित्र है। अतः नीति-शास्त्रों की कसौटी पर भी “तवेद्धि सख्यम् स्तृतम्” का भाव सिद्ध है — हे प्रभु! आपकी ही मैत्री पूर्ण, निष्काम और शाश्वत है। ------+-------+-----+-------+------+

गिरीश

विचार

બદનામ રાજા

वो लड़की थी साहब भुल गई सब कुछ एकबार रोने के बाद वो लड़का था, ताउम्र हंसकर भी तड़पता रहा उसे खोने के बाद... 🌸❤️‍🩹

Bhavna Bhatt

#એક વાર્તા....ભાગ -૧

Aachaarya Deepak Sikka

*RUDRAKSHA* - The Sacred Science of Divine Beads Not jewelry. Not superstition. A living spiritual technology gifted by Shiva himself. This image reveals the mystery of Rudraksha Mukhi. Let’s decode it properly. 1/ Rudraksha = "Tears of Rudra". When Shiva's compassion overflowed for humanity's suffering, his tears fell and became these sacred seeds. Each Mukhi (face/line) carries a specific frequency of Shiva's energy — like different keys unlocking different doors in your consciousness.Most people wear 5 Mukhi casually. But the real science begins when you match the bead to your current life need / karmic block. 2/ 1 Mukhi (very rare, usually Nepali half-moon shape) → Supreme consciousness, direct connection to Shiva → Destroys ego, brings absolute clarity & detachment → For serious sadhana / moksha seekers only Mantra: ॐ ह्रीं नमः3/ 2 Mukhi (Ardhanarishwar form) → Union of Shiva & Shakti → Heals relationships, removes distrust & separation wounds → Brings harmony between partners, family, inner masculine-feminine → Very powerful for marriage / love issues Mantra: ॐ नमः4/ 3 Mukhi (Agni) → Burns past-life karma & guilt → Releases self-sabotage, low self-worth, depression → Gives courage to start over → Excellent after major emotional trauma Mantra: ॐ क्लिं नमः5/ 4 Mukhi (Brahma) → Speech, creativity, knowledge → Removes stage fear, writer’s block, dull intellect → Students, teachers, speakers, artists — this is your go-to Mantra: ॐ ह्रीं नमः6/ 5 Mukhi (most common, Kalagni Rudra) → Balances all five elements → Reduces blood pressure, anxiety, overthinking → Brings general peace & stability → Safe & powerful baseline bead for almost everyone Mantra: ॐ ह्रीं नमः7/ 6 Mukhi (Kartikeya) → Willpower, charm, sexual energy balance → Helps overcome laziness, addiction, lack of direction → Attracts love & artistic success → Good for actors, performers, young people Mantra: ॐ ह्रीं हं नमः8/ 7 Mukhi (Mahalakshmi / Sapta Matrika) → Money karma, financial stability → Removes poverty consciousness, sudden losses → Attracts opportunities & sustained wealth → Business owners / people facing chronic money blocks wear this Mantra: ॐ ह्रीं क्लीं सौः9/ 8 Mukhi (Ganesh) → Removes obstacles & delays → Excellent before starting new ventures, exams, surgeries → Clears inner & outer blockages → Very fast-acting bead Mantra: ॐ ह्रीं गं नमः10/ 9 Mukhi (Durga) → Fearlessness, courage, protection from black magic / evil eye → Strengthens nervous system, overcomes phobias → For people who feel constantly attacked / insecure Mantra: ॐ ह्रीं नमः11/ 10 Mukhi (Vishnu / Yama) → Protection from planets, untimely death, accidents → Balances all dashas, especially when multiple planets are malefic → Gives overall shielding energy Mantra: ॐ ह्रीं नमः12/ 11 Mukhi (Hanuman / 11 Rudras) → Massive physical & mental strength → Victory in competition, litigation, debates → Increases stamina, discipline, celibacy power → Favorite of spiritual warriors Mantra: ॐ ह्रीं हं नमः13/ 12 Mukhi (Surya) → Radiance, leadership, self-confidence → Removes low self-esteem, father-related karma → Attracts respect, fame, authority positions Mantra: ॐ ह्रीं सूर्याय नमः14/ 14 Mukhi (Hanuman / third eye awakener) → Extremely powerful intuition & sixth sense → Opens Ajna chakra, prophetic dreams, danger warnings → One of the rarest & strongest protectors Mantra: ॐ नमः15/ 15 Mukhi (Pashupatinath) → Deep heart healing, compassion, forgiveness → Heals emotional wounds, mother-related karma → Attracts abundance through love & kindness Mantra: ॐ ह्रीं नमः16/ 16 Mukhi (Mahamrityunjaya form) → Victory over death fears, chronic illness, accidents → Emotional stability, forgiveness, divine love → Protects kidneys, reproductive system, gives inner security Mantra: ॐ ह्रीं हौं नमः17/ Gauri Shankar (naturally joined pair — Shiva + Parvati) → Ultimate relationship harmonizer → Brings peace in marriage, removes delay in marriage → Balances ida-pingala, awakens kundalini safely → Creates deep inner union first, then outer → One of the most beautiful & peaceful beads18/ Key reminders: • Authenticity matters — fake beads give zero effect (and sometimes negative) • Energy cleanses regularly (Ganga jal, moonlight, incense) • Wear with intention, not as fashion accessory *Start with 5 Mukhi if you're new.* Then go specific19/ Rudraksha is not magic. It is vibrational technology that aligns your bio-field with higher states of consciousness. When worn with shraddha + correct sadhana

Aachaarya Deepak Sikka

*AUM NAMAH SHIVAY* *FOOD FOR PLANETS* *☀️ Sun = Wheat* • Builds strength, confidence, and stamina • Grounds ego without inflating it • Ideal when self-worth or authority feels shaky *🌙 Moon = Rice* • Nourishes emotions and mental calm • Supports sleep, mood, and emotional security • Used when mind feels restless or unstable *🔥 Mars = Red Dal* • Strengthens blood, courage, and drive • Channels aggression into discipline • Helpful when anger or impulsiveness dominates *🌿 Mercury = Moong Dal* • Light, easy to digest, sharpens intellect • Improves communication and clarity • Given when overthinking or confusion rises *🌼 Jupiter = Chickpeas* • Heavy, nourishing, expansive • Symbol of wisdom, growth, and faith • Supports learning, optimism, and guidance *💎 Venus = Lima Beans* • Linked to comfort, pleasure, and harmony • Nourishes reproductive and creative energy • Used when relationships or joy feel blocked *🪐 Saturn = Sesame Seeds* • Deep, grounding, slow-digesting • Builds patience, endurance, and humility • Prescribed during fear, delay, or karmic pressure *🐍 Rahu = Black Gram* • Dense, tamasic, powerful • Grounds obsession, anxiety, and craving • Helps stabilise scattered desires *☄️ Ketu = Horsegram* • Detoxifying, heating, minimal • Encourages detachment and inner clarity • Used when confusion or spiritual imbalance appears Aapka Apna Aachaarya Deepak Sikka Founder Graha Chaal Consultancy

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