Gujarati Whatsapp Status |
Hindi Whatsapp Status
archana
अब ठान लिया है कुछ करके दिखाना है,
जो हँसते थे नाम पर, उनका गुरूर मिटाना है।
हे ईश्वर, बस इतनी सी दुआ है मेरी,
हर मोड़ पर मेरा हाथ थामे रखना।
जब हौसले डगमगाएँ, मुझे थाम लेना,
जब रास्ते अंधेरे हों, खुद रौशनी बन जाना।
मेहनत मेरी हो, भरोसा तुझ पर रहे,
हार भी आए तो सीख बनकर जाए।
और एक दिन मेरी चुप साधना को,
सफलता की सबसे ऊँची आवाज़ मिल जाए। 🙏✨
- archana
Archana Singh
जिसकी नजरें हमेशा
घड़ी की सुइयों पर टिकीं रहती हैं ...
लोग उसे वक्त का पाबंद
रहने की सीख दे रहे हैं ...!!
अर्चना सिंह ✍🏻
- Archana Singh
Archana Singh
काश ! बचपन की
पेंसिल-रबर की तरह ....
ज़िंदगी की हर गलतियों को
मिटा सकतें ...
तो जिंदगी यूं बोझ न होती ...!!
अर्चना सिंह ✍🏻
- Archana Singh
મનોજ નાવડીયા
ઝીણું સ્મિત આપી ગયાં,
હૃદયને શાંત કરી ગયાં,
શબ્દો બોલ્યા નહીંને,
આંખોથી હસાવી ગયાં,
મૌન હતું બધુંજ ત્યાં,
વાતો સમજાવી ગયાં,
મીઠી લાગણીઓ સાથે,
મનને આનંદ આપી ગયાં..
મનોજ નાવડીયા
#vishvyatri #heetkari #vishvkhoj #manojnavadiya #child #children #childlife #goodthinking #saravichar #maravichar
Neha kariyaal
शायद मैं कल और गलती करूं, शायद मैं कल और डरूं, पर मैं मेरे कल के 'मुझ' को भी उतना ही प्यार करूंगी, जितना आज के 'मुझ' को करती हूं।
રોનક જોષી. રાહગીર
https://www.facebook.com/share/p/1C7YDBGm45/
kattupaya s
ok guys lot of love stories failed when you overdoses love poems. keep distance. live long. c u soon
kattupaya s
every moment iam living with your memories. I can't live without that.
kattupaya s
I sensed love at the moment I saw you. but you relalised my love at the moment of my death. how fortunate it is like titanic
kattupaya s
iam waiting for you anonymously over the years. you have to find me. no other way my dear love
kattupaya s
mm that's the beauty of love
kattupaya s
This one is drama
ek archana arpan tane
મહેણાં ટોણાં મારી કોઈ ને મારવા કરતાં,મરેલા ને ખભો આપવા ભેગા થવા કરતાં જીવતાં ને ખભો દઈ ઉભો કરો તો માણસ માં જ ભગવાન કેમ ન મળે?
- ek archana arpan tane
kattupaya s
iam keen with your interests , likes, sorrows., happy moments. pls forgive me for replacing you with me.
kattupaya s
hug me tightly. so that my soul may get rest in peace .
kattupaya s
whenever you talking with me I make a mistake in my reply. I do it intentionally.you became my dictionary. you remember all my mistakes
OLD KING
matrubharti app me paise milte hain ya nahi ager milte hain to kab or kaise 🤔
kattupaya s
I want to be like you. I want to represent you. love me more I will get you more
kattupaya s
I care about you but it doesn't mean love. oneday my care will become love. pls wait for the magic after all my heart is not a love machine
kattupaya s
music and beauty
sunshine
मुझे तो लागे से मैं बावरा से
वो समझाती है मने वो 2 बच्चों की मां है
में समझता नहीं हु 😢
kattupaya s
Good evening friends.. have a nice time
Mamta Trivedi
ममता गिरीश त्रिवेदी की कविताएं
https://youtu.be/7gwcdK9E_6s?si=RYM-XbVnvgHaSNuz
Paagla
https://youtube.com/shorts/qd9dBLh5G1k?si=nsQdKqMWoIYE93lL
Imaran
दिल से रोये मगर होंठो से मुस्कुरा बैठे,
यूँ ही हम किसी से वफ़ा निभा बैठे,
वो हमे एक लम्हा न दे पाए प्यार का,
और हम उनके लिये जिंदगी लुटा बैठे
💔imran 💔
Zakhmi Dil AashiQ Sulagte Alfaz
https://youtube.com/shorts/_J5lYG2OIHA?si=nksc7OFuaq7n6jll
🦋...𝕊𝕦ℕ𝕠 ┤_★__
बिछा कर लफ़्ज़ काग़ज़ पर, मैं अपना
हाल लिखता हूँ,
पढ़ेंगे सब इसे पर मैं सिर्फ तेरा ख़याल
लिखता हूँ,
ज़माने भर को दिखती है, महज़
कारीगरी मेरी,
मैं हर इक शेर में तेरी छुपी इक ढाल
लिखता हूँ,
मेरी तहरीर में शामिल है तेरी साँस
की खुशबू,
मैं अपने लफ़्ज़ में तुझको, मिसाल-
ए-हाल लिखता हूँ,
हज़ारों शोर दुनिया के मुझे छू कर
निकल जाए,
मैं सन्नाटे में भी तेरे लबों की चाल
लिखता हूँ,
नहीं है ये कोई काग़ज़, ये टुकड़ा है
मेरे दिल का,
मैं लफ़्ज़ों की शक्ल में तेरा दीदार
लिखता हूँ…🔥
╭─❀💔༻
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♦❙❙➛ज़ख़्मी-ऐ-ज़ुबानी•❙❙♦
#LoVeAaShiQ_SinGh☜
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Soni shakya
"सारी दुनिया की मुलाकात एक तरफ
तुमसे बात करना तुम्हें देखना एक तरफ"
- Soni shakya
Archana Singh
अगर किसी की तबीयत ख़राब हो , तो ..
उससे दिन में दो बार मिलिए !
अगर उसका वक्त ख़राब हो , तो ..
उससे दिन में तीन बार मिलिए !
पर अगर उसकी नियत ख़राब हो , तो ..
उससे सपने में भी मत मिलिए ...!!
🙏🏻🙏🏻💐💐
- Archana Singh
Akanksha srivastava
आज की नारी
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तुझे निर्भर नहीं स्वयं आत्मनिर्भर बनना है।
यही निर्भरता तेरी गुलामी की निशानी है, जिसे अब ढहना है।
तुझे दूसरों के बल से नहीं अपने आत्मबल से चलना है।
तुझे झुकना नहीं, तुझे लड़ना है, बनकर अडिग अचल।
हर उस परिस्थिति से लड़ जहाँ तुझे समझौता करना पड़े,
तु उठ खड़ी हो ऐसे की सामने मुश्किल भी ना अड़े।
दूसरों की वजह से नहीं खुद की वजह से स्वाभिमानी बन।
पिंजरे की कैद नहीं, तु स्वछंद गगन का जीव बन।
तुझमे है लक्ष्मी - सा वैभव और दुर्गा - सी शक्ति।
तुझमे है भक्ति मीरा- सी और हो तुम राधा सी त्याग की परछाई।
फिर क्यों तुझे झुकना है और क्यों तुझे अब दबना है?
खुले गगन की उड़ान है तू,
तुझे क्यों पिंजरे में थमना है,
सिद्ध कर दे आज की हम औरतें, दर्द देना नहीं जानती।
पर सहना भी अब स्वाभिमान के विरुद्ध है ये दुनिया मानती।
अब ना कोई समझौता होगा, ना कोई लाचारी होगी।
तेरी अपनी शक्ति ही अब तेरी सबसे बड़ी सवारी होगी।
Annu jangra
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Saurya
"जीवनसाथी का चुनाव हमारे पूरे जीवन को प्रभावित करता है। सही साथी न केवल हमारे सुख-दुःख का भागीदार बनता है, बल्कि हमारे व्यक्तित्व, करियर और मानसिक शांति पर भी गहरा प्रभाव डालता है। इसलिए एक अच्छे जीवनसाथी का चयन बहुत सोच-समझकर करना चाहिए।"
kattupaya s
it's time for little nap. c u guys
Soni shakya
गम हैं कि जिंदगी में कुछ नहीं पाया मैंने,
दर्द ये दिल से निकल जाए
अगर तुम मिलने आ जाओ..
तमन्ना फिर मचल जाए,
अगर तुम मिलने आ जाओ..
मौसम फिर रंगीन हो जाए,
अगर तुम मिलने आ जाओ..
नहीं होते हो तुम तो बहुत हमदर्द होते हैं
सारे हमदर्द दुर हो जाए,
अगर तुम मिलने आ जाओ..
दुनिया भर की झंझट, झगड़े
हर बला टल जाए,
अगर तुम मिलने आ जाओ..
- Soni shakya
kattupaya s
being hungry during jobless days was all i remember whenever I'm eating food
kattupaya s
Hope all of you enjoyed your lunch.. little late for me
M BOSS मुस्ताक अली शायर
तुमसे जुदा नहीं हूँ मैं
तुमसे जुदा नहीं हूँ मैं।
बस ख़ामोश सा सही हूँ मैं।
तेरी हर एक याद में अब भी,
धड़कन की तरह कहीं हूँ मैं।
तू सामने नहीं है तो क्या,
तेरे हर एहसास में ही हूँ मैं।
लोग समझे बिछड़ गया हूँ तुझसे,
सच ये है कि यहीं हूँ मैं।
तेरे जाने का ग़म नहीं रोता,
तेरे होने का यक़ीं हूँ मैं।
वक़्त ने ओढ़ा दी दूरी की चादर,
दिल के सबसे क़रीब वही हूँ मैं।
मुस्ताक़, ये दुनिया चाहे जो कह ले,
तुमसे जुदा नहीं हूँ मैं।
Kamini Shah
ક્ષણો મિલનની સંઘરી હતી
જે હ્રદયમાં
આજ કામ આવી ગઈ સઘળી
વિરહમાં…
-કામિની
Kinjal Chudasama
સવારે ઉઠી ને જેનાં મેસેજ ની રાહ જોવાતિ હોય, ત્યાજ એનો મેસેજ આવે એટલે ચેહરા ની ખુશી કંઇ અલગજ હોય.... - Kinjal
Sonam Brijwasi
बारिश ने जब पत्तों को छूकर सरगोशी की,
हर बूंद ने मिट्टी से अपनी बंदगी की।
एक पत्ता भीग कर चुपचाप गिर गया ज़मीन पर,
जैसे किसी ने खामोशी से अपनी कहानी पूरी की। 🍃🌧️
- Sonam Brijwasi
Deep Kumar
सपनों से हक़ीकत तक
सपनों की राह में चलता रहा,
हर मोड़ पर कुछ नया मिलता रहा।
कुछ नया मिलने से मैं सीखता रहा,
जिसमे तजुबी बड़ता रहा ।।
तजुर्बा जोड़ा तो हौसला बढ़ गए,
सपने अब और भी चमकन लग गए।
चमकने लगे तो बेहतर बन गए,
जिंदगी में आनंद आ गए ।।
आनंद में रंग ऐसे घुलने लगे,
हर एक पल अब और प्यारे लगने लगे।
प्यार से लोग हमें अपना बनाने लगे,
सपनों की तलाश को हम हकीकत बनाने लगे ।।
राहों में अब कोई रुकावट नहीं,
सपनों के संग अब कोई भी जंग नहीं।
जिंदगी की इस किताब का हर पन्ना सजा,
हमने खुद को जीने का तरीका पा लिया ।।
Anup Gajare
इति:
____________________
हमारा कोई इतिहास नहीं
हम खुद एक इतिहास है।
ट्रेन में खडे लोग
बैठे लोगों को देखते है
वे भी इतिहास में लिखे जाएंगे
उनका भी कोई इतिहास होगा।
_____________________________
Shailesh Joshi
📢ચેતવણી✍️
માનો કે ના માનો
પરંતુ આપણી સાથે કોઈ વ્યક્તિથી વિશ્વાસઘાત થવામાં મુખ્યત્વે આ બેજ કારણો જવાબદાર હોય છે,
એક તો એવા વ્યક્તિ કે જેમને આપણે પૂરેપૂરા ઓળખ્યા ના હોય,
અને બીજા નંબરે જે વ્યક્તિ આવે છે, એ એવા હોય છે કે જેમણે
આપણને પૂરેપૂરા અને સારામાં સારી રીતે ઓળખી લીધા હોય છે.
સમજાય એને વંદન, અને
ના સમજાય એને વિનંતી
kattupaya s
Good afternoon friends.. have a nice afternoon
Shailesh Joshi
આપણને નહીં મળવાવાળી મદદમાંથી
90 ટકા + મદદ નહીં મળવાનું કારણ
આપણો સ્વભાવ હોય છે,
પછી આ વાત માનવી કે ના માનવી
એ પણ આપણા દરેકના
અલગ અલગ સ્વભાવ પર જાય છે.
- Shailesh Joshi
Nasim Fatima
tumse apna rabt purana gham se gehri yari Hai
jitne bhi hain jaan k dushman sabse rishtedari Hai
pyas ki Farhat tum kya jano logon pyas ke sehra mein
tumne do din Kate honge humne umr guzari Hai.
Saroj Prajapati
आज फिर चला यादों का काफ़िला
जाने कितनी दूर तलक तक जाएगा
आज फिर सारी रात कटेगी आंखों में
जाने कितना भूला बिसरा फिर याद आएगा।
सरोज प्रजापति ✍️
- Saroj Prajapati
Anup Gajare
खामोशी की सज़ा.
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घर में कोई बुज़ुर्ग नहीं था
जो कह देता—
“इतना काफ़ी है, अब रुक जाओ।”
जो हुआ
वह कम नहीं था,
और जो मेरे लिए किया गया
वह वजह के बहुत पास था—
इतना पास
कि दोष और दया
एक-दूसरे से गले मिल बैठे।
मैं पूछता रहा—
क्या था ये?
क्यों किया मैंने?
और मेरी खामोशी
सारे जवाब खा गई।
अगर कोई मुझे उकसाता,
तो मेरे तन में लगी आग
मैं खुद ही बुझा देता—
पर आग को बुझाना भी
क्या गुनाह होता है?
क्या ये नसीब था
या बस
मेरा होना
न होने के बराबर?
इसने मुझे बदल दिया।
आख़िरी उम्मीद का दिया बुझ गया—
पर राख में हाथ डालकर
मैं फिर उसे जलाऊँगा,
क्योंकि
राख मेरी नाकामयाबी नहीं
मेरी आख़िरी उम्मीद है।
किसने मारा मुझे?
मैं तो ज़िंदा हूँ—
फिर भी
अंदर कुछ मर चुका है।
जिसने मेरे लिए कुछ किया,
उसका अहसान
मैं पूरा न चुका सका—
शायद इसलिए
थकान अब
मेरी पहचान बन गई है।
क्या मुझे अभी मर जाना चाहिए
और बुझते हुए
लिखते रहना चाहिए?
मैंने कभी किसी को नहीं मारा,
फिर ये सब
मेरे साथ क्यों?
क्या मैं इंसान नहीं?
क्या मेरी भावनाएँ
गिनती में नहीं आतीं?
मैं भी रास्ते काटता हूँ—
पर जिसने मुझे तोड़ा
उसके साथ क्या हुआ?
किसने उसे छोड़ा?
ढेर सारे नक्शे बुझ गए—
मेरी तरह।
क्या कोई फर्क नहीं पड़ता?
क्या लिखना
माफी नहीं हो सकता?
क्या मैं गलती नहीं कर सकता?
मैं भी इंसान हूँ—
क्या उसने ये नहीं सोचा
कि किसलिए
मुझे मारा जा रहा है?
मैं खामोशी की सज़ा में बँधा हूँ।
किसने उसे उकसाया
कि वह मारते-मारते
और उद्विक्त हो गया?
उसके शब्दों में जादू था—
लब्जो में अल्फ़ाज़ नहीं,
बस मैं था—
और मैं ही
काफ़ी था टूटने के लिए।
ये मुझे छोड़ता नहीं—
कभी नहीं छोड़ेगा।
फिर मैं फ़िक्र क्यों करूँ
उसकी
जो अब है ही नहीं?
जीना क्या
जीवन से हार के
फासले तय करना नहीं होता?
दुःख के रास्ते पर
जो फूल खिला है—
उसका स्वाद
कितना कड़वा होता है,
क्या तुमने चखा है?
मैं मासूम नहीं
कि फिर से जुड़ जाऊँ।
यह फैसला
किसी और के लिए होगा—
मेरे लिए
ये ठहराव था।
इसने मुझे सिखाया
कि ज़रूरत
कभी जीवन से बड़ी नहीं होती।
पर ये भी भूल गया
कि कभी
मैं भी था।
मैं जो हूँ—
उसका स्वाद
वह कबका चख चुका है।
उसकी अंतिम इच्छा
मैं नहीं जानता—
पर जब तक मैं हूँ,
मेरे पास
कुछ नहीं होना चाहिए।
क्या उसके चलते
मैं रुक जाऊँ?
हरगिज़ नहीं।
कब तक सीखूँ
कि मर कर
न मरना भी
मरना ही होता है?
काफ़िर ज़िंदगी
कितनी मुश्किल है—
जब किसी के पास
अब कुछ नहीं बचता
सिवाय
उसके।
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silent Shivani
Manifestation is not magic.
It’s not about wishing and waiting.
It’s about clear intention, consistent effort,
and trusting yourself even when things feel slow.
What you work for, you slowly attract.
Shailesh Joshi
જેનાં મન અને મોઢાની વાત એક હોય,
એના જીવનમાં ખુશીયો અનેક હોય,
ને કોઈવાર
આવી પડે કોઈ ઓચિંતું દુ:ખ,
તો એમાંથી નીકળવાના,
રસ્તા પણ અનેક હોય.
- Shailesh Joshi
nidhi mishra
Gulab Ka Sabak
Ek gulab ne mujhse kaha, tu kyun darti hai kaanton se,
Zindagi ki asli pehchan hoti hai, inhi imtihanon se.
Dekh mera surkh rang, ye junoon ki nishani hai,
Par in kaanton ke beech hi, meri har kahani hai.
Log kehte hain gulab ho toh kaante bhi jhelne honge,
Par main kehti hoon, kaante hi toh humein ladna sikhate hain.
Bina kaanton ke toh phool bhi murjha jaye jaldi,
Ye chubhan hi toh hai, jo jeene ka jazba jagate hain.
Maana ki raahon mein kaante bichhe hain hazaar,
Par tu dekh us khushbu ko, jo hai behisaab aur apaar.
Gulab tabhi banta hai, jab dhoop aur tufaan se ladta hai,
Insaan bhi wahi hai, jo mushkilon mein hi nikharta hai.
Tu ban ja wahi gulab, jo har haal mein muskuraye,
Chahe kismat kitne bhi kaante, teri raah mein bichhaye.
Kaante teri hifazat hain, teri kamzori nahi,
Teri jeet ki dastaan mein, ye rukawat koi nahi!
Dada Bhagwan
Do You Know people praise and speak very highly of those who donate money? This public adoration is the donor's reward. The donor reaps the reward of his action in this very life, whereas the one who gives anonymously will reap his reward in his next life.
Read more on: https://dbf.adalaj.org/J8hBTnYs
#humanity #donation #charity #helpothers #DadaBhagwanFoundation
Zakhmi Dil AashiQ Sulagte Alfaz
🦋...𝕊𝕦ℕ𝕠 ┤_★__
एक खत ऐसा भी...
तारीख: आज की एक अकेली शाम,
पता: मन का वो कोना, जहाँ कोई
झाँकता नहीं,
सुनो,
उम्मीद है तुम बाहर से ठीक होगे
क्योंकि आजकल हम सबने ठीक
होने का एक बेहतरीन हुनर सीख
लिया है,
आज दिल कुछ भारी था, तो सोचा
तुम्हें वो बातें लिखूँ जो हम महफिलों
में हँसते हुए भी नहीं कह पाते,
तुमने सच ही तो कहा था, यहाँ हर
कोई अपना ज़ख्म छिपाए फिर रहा है,
हम सब एक ऐसे मेले में हैं जहाँ भीड़
तो बहुत है, पर हर इंसान अपनी अधूरी
कहानी का अकेला किरदार है,
हम एक-दूसरे को तसल्ली तो देते हैं पर
सच तो ये है कि हम खुद अपनी थकान
से चूर हैं,
ये जो चेहरे पर मुस्कान हम चिपकाए
रखते हैं न, वो दरअसल एक ढाल है
ताकि कोई हमारी असुरक्षा को देखकर
हमें कमज़ोर न करार दे दे,
हम उस समाज का हिस्सा हैं जहाँ टूटना
मना है और हारना उससे भी बड़ा गुनाह,
कितना अजीब है न,?
हम जानते हैं कि कोई किसी का बोझ
नहीं उठा सकता, फिर भी एक उम्मीद
की डोर पकड़े बैठे हैं,
शायद वो झूठी उम्मीद ही है जो हमें रोज़
सुबह बिस्तर से उठाती है और रात को
थपकियाँ देकर सुला देती है,
हम एक-दूसरे पर तंज कसते हैं अपनी
कुंठाएँ थोपते हैं, सिर्फ इसलिए ताकि
खुद को बेकार होने के एहसास से बचा
सकें,
भीतर एक शोर है जो कभी थमता नहीं
और बाहर एक सन्नाटा है जिसे हम
नॉर्मल कहते हैं,
हम रोज़ हारते हैं, रोज़ टूटते हैं, और
फिर अगले दिन एक नया मुखौटा पहन
कर दुनिया के सामने खड़े हो जाते हैं,
सिर्फ ये दिखाने के लिए कि हम मज़बूत हैं,
पर कभी-कभी सोचता हूँ... कब तक,?
खैर, ये खत बस एक ठहराव था,
उन चंद लम्हों की गुफ्तगू जो शायद
तुम्हारे घाव तो नहीं भरेगी, पर तुम्हें ये
ज़रूर महसूस कराएगी कि इस अंधेरे
में तुम अकेले नहीं हो, हम सब अपनी
अपनी हार को ठीक है कहकर ढो रहे हैं,
अपना ख्याल रखना
तुम्हारा ही एक अक्स,,🥀🔥
╭─❀💔༻
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♦❙❙➛ज़ख़्मी-ऐ-ज़ुबानी•❙❙♦
#LoVeAaShiQ_SinGh☜
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Saliil Upadhyay
सबकी जिंदगी के पेपर अलग हैं....!
कृपया नकल ना करे...!
- Saliil Upadhyay
Aradhana
चाहत तो थी मंजिल कि...
पर सफर में कुछ छूटा था,
पाना तो सब कुछ था ,
पर बाकी कुछ तो था ।
चाहत तो थी मंजिल कि ...
पर खोया तो सब कुछ था,
मिला तो सब कुछ था,
सोचा तो ....
मिला तो कुछ भी न था । ।
Manish Patel
તણખલા જેવડો પણ ઉપકાર કરવા મળે તો કરી લેવો,
કેમ કે એના ફળ તાડ જેટલા મોટા હોય છે
- Manish Patel
Deepak Bundela Arymoulik
हर रास्ता मंज़िल तक नहीं जाता,
कुछ रास्ते
सिर्फ़ यह सिखाने आते हैं
कि लौटना भी एक कला है।
हर सवाल जवाब नहीं माँगता,
कुछ सवाल
अंदर बैठकर
हमें चुप रहना सिखाते हैं।
जो बहुत साफ़ दिखता है
वही सबसे पहले
धोखा देता है,
और जो धुंधला है
वही अक्सर
सच की तरफ़ इशारा करता है।
हर जीत
ताली की आवाज़ नहीं होती,
कुछ जीतें
अकेले कमरे में
आँखें बंद कर
महसूस की जाती हैं।
समय
जब जवाब नहीं देता
तो समझ लो—
वह हमें
ख़ुद से मिलाने में
लगा हुआ है।
आर्यमौलिक
Imaran
मेरे कलम से लफ्ज़ खो गए सायद
आज वो भी बेवफा हो गाए सायद
जब नींद खुली तो पलकों में पानी था
मेरे ख्वाब मुझपे रो गाए सायद.
🥲imran 🥲
S A Y R I K I N G
जिसको होठों से लेते है उसको चुम्मा कहते है
आपको शर्म नहीं आती
आप शादी सुधा हो कर
हम पे लाइन मारती हो 4 बच्चों की अम्मा
S A Y R I K I N G
एक कामयाब शायरी की
आशिक़ी
है तू
लफ्ज़ तू
ख्याल तू
सोच तू
good morning good night तू
सुबह के नाश्ता चाय तू
रात का Denar तू
मेरी सबसे बड़ी कामयाबी की
कलम तू
मोहब्बत तू
इश्क़ तू
प्यार तू
जान तू
मेरा हर ख्याल तू
तू ही तू
S A Y R I K I N G
तू नहीं तो, तेरा ख़याल ही सही कोई तो मेरा हमख़याल है...
सब कुछ तो है
बस एक ही कमी है
तू तू तू
S A Y R I K I N G
जैसी करनी वैसी भरनी
आज एक शख्स ने फटा नोट दे कर
आधा किलो दूध लिया
घर जा कर दूध उबाला तो
दूध भी फट गया
Roshan baiplawat
new emotional shayari 💔🥀😥
Sakshi Sunil Rane
काही बदल स्वतःसाठी चांगले असतात…😇
Mahesh Gadhvi
હે નારી હે સન્નારી
જીવન તારું હવાનકુંડ ને
કર્મ છે તારી આહુતિ
ધૈર્ય તારો બળતો દીપક ને
સહનશીલતા ની વાટ વણી તે
અર્ધ્ય આપ્યું તે જીવન નું
જાત ને આખી હોમી ને .
સર્વ ને આશિષ આપ્યા તે
જે બેઠા તુજ સમીપે છે.
તે સર્વનું જીવન બદલ્યું છે
જીવન તારું નીચોવી ને.
રચી દુનિયા તુજ ઉદર થી
ને વાણી થી વૈભવ ભર્યા.
ઘર સંસાર ને ધન ભંડાર
સદૈવ તુજ થી ભરતા રહ્યા.
તુ સંચાર બની છે શક્તિ નો
ભલે અબળા તુને ગણતા રહ્યા.
માં,બહેન ને ભાર્યા રૂપે આશ
તને જગત નિજ પૂજતા રહ્યા.
"કવિ આશ " મહેશ ગઢવી
પોલીસ ઇન્સ્પેક્ટર
ગુજરાત
Mahesh Gadhvi
औरत नहीं बनना चाहेगी दोबारा किसी भी जन्म में औरत
क्योंकि थका चुके हैं उसे
ये समझौते जो उसकी परछाई बने बैठे हैं
ये निरंतन खेले जाने वाले झूठे खेल
जो उसकी संवेदना को डस रहे है।
ये संस्कार की मूरत का लेप,
ये सहनशक्ति का महिमा मंडन।
जो हमेशा उसको मृत्यु के कगार पर ले गए ।
थक चुकी है वो इन से ऊब चुकी है उनसे,
जिसके साथ वो चली कंधा मिलाकर,
जिसके साथ सांस फूलते हुए भी वो दौड़ी
वे ही ले गए उसे अग्नि परीक्षा में,।
वे ही ले गए उसे निर्लज्ज सभा में।
सदैव उपेक्षित एक ही जीवन,
आशा की अपेक्षा में उपेक्षा की आशा में
औरत फिर नहीं बनना चाहेगी दोबारा किसी भी जन्म में औरत।
"कवि आश"
महेश गढ़वी
पुलिस इंस्पेक्टर
गुजरात
Mahesh Gadhvi
अब तो तुम आदत हो खाकी।
मेरी हर नब्ज में घुली हो खून की तरह।
तुम ही तो जज्बात हो खाकी।
मेरी हर विजयमें शामिल हो गर्वकी तरह।
तुम शान हो मेरी खाकी।
मेरी हर धड़कनमें दौड़ती हो सांसोंकी तरह।
अक्सर शामिल होती है आदतें जीवन में
पर तुम शामिल हो जीवन की आदतों में।
में कैसे कहूं खाकी की तुम आदत हो ,
और कैसे कहूं की बिना आदत का जीवन हो तुम।
सच कहूं ख़ाखी !
अब तुम वो आदत हो जिससे जीवन है।
धूप हो या छांव दिन हो या रात ,
इन रंगबिरंगे जहां में एक ही रंग हो तुम।
जो भाया मुझे, जो दे छाया मुझे ।
जिसने निर्भिक बनाया मुझे ।
जिसने सिखाया मुझे बेतरतीब को तरतीब में लाना,
आंखों से आंखे मिलाना,
और तेवर से ही औकात दिखाना ।
ऐसे ही कहां मिली हो तुम ।
धूल मिट्टी पसीने से सिली हो तुम।
गिरेबान में झांके वे जो बन रहे बेलगाम हैं।
ऐसे ही घोड़ों पर करते हम सवार हैं।
खाकी है हम आश बस इतना ही काफी है।
खाकी है हम काफी है हम।
"कवि आश" महेश गढ़वी
kattupaya s
Lot of people like"iravai sudum velicham" "இரவை சுடும் வெளிச்சம் "novel.but no reviews. quite surprising. if you have free time pls read the novel and put some reviews.
kattupaya s
Once again I wish to inform all my ebooks available@google play books. if you are interested pls go through.
Dr Darshita Babubhai Shah
मैं और मेरे अह्सास
चाहत की इंतिहा का असर देख लो l
अब थोड़ा दर्दों से फ़ासला लगता हैं ll
ये जो ग़म के बादल छाए हुए थे वो l
नन्ही गलती का मसअला लगता हैं ll
"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह
kattupaya s
Filter coffee for..
kattupaya s
Enjoy the Tea
kattupaya s
Time for some good breakfast..
kajal jha
खामोशी से सहते रहे हम हर जख़्म,
कभी शिकायत की आदत नहीं थी।
तुम क्या जानो टूटने का दर्द,
हँसते चेहरे के पीछे कितनी चीख़ें थीं।
- kajal jha
kattupaya s
your content that may people will not like immediately. don't force or get dejected. a good content takes its own time. even after 10 years some great writers books are not sold. try your best spend time on quality content
Shefali
#shabdone_sarname__
kattupaya s
what is professional writing?...iam also too young to write about this. a clean and right approach towards readers. honesty in your content.thats enough for healthy writing.
kattupaya s
regular income is not possible for begginers who choose writing as proffession. but your words may help the younger generation and current generation. think before writing something. it is easy to be a writer nowadays.at the seme time they don't have any commitment towards good writing. iam not blaming anyone. try to be more professional that's my request
kattupaya s
it's another beautiful day friends.. hope we will utlize it for our future. usually I didn't care about future. but nowadays it is necessary to secure the future of our family and need to plan everything. mm it's too much but the future in only paper will not help. family is the key for future.
GANESH TEWARI 'NESH' (NASH)
चलो जगत में इस तरह, ज्यों चलता गजराज। जीर्ण शीर्ण यदि दिखोगे, बिगड़ेगा सब काज।।
दोहा --३९३
(नैश के दोहे से उद्धृत)
-----गणेश तिवारी 'नैश'
Gajendra Kudmate
मीलते हैं लोंग राहों में
किसी मुसाफ़िर की तरह
दे जाते हैं तौफ़ा उम्रभर का
किसी बेनज़ीर की तरह
गजेंद्र
kattupaya s
Good morning friends.. have a great day
Prithvi Nokwal
माँ, तू अब नहीं है मेरे सामने,
पर तेरी सीखें और दुआएँ हैं मेरे साथ।
तेरी यादें बन गई हैं मेरी ताकत,
तेरी ममता की छाया रहेगी सदा मेरे जीवन में।
Sonu Kumar
*क्यों चुनावो में पार्टी के उम्मीदवारों को ही विजय मिलती है और योग्य होने के बावजूद निर्दलीय प्रत्याशियों की जमानत जब्त हो जाती है, और कैसे यह व्यवस्था लोकतंत्र का गला दबाकर राजनीति में कुछ परिवारों का दबदबा बनाए रखती है, और कैसे इस समस्या को हल किया जा सकता है ?*
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चुनावो की तारीख घोषित होने से लेकर प्रचार करने और मतदान होने तक की सारी प्रक्रियाएं लगभग एक माह के भीतर पूर्ण हो जाती है। मतदान के लिए सिर्फ एक दिन का वक्त होता है। आपको जो कुछ भी करना है इन कुछ दिनों में ही करना होता है। पार्टियो के पास संगठन होता है, सभी वार्डो, मुहल्लों, गाँवों, तहसीलों आदि में कार्यकर्ता होते है, और खर्च करने के लिए बेतहाशा रुपया होता है। इस तरह से इस तेज गति की दौड़ में बढ़त बना लेने के लिए उनके पास पर्याप्त संसाधन होते है। उन्हें सिर्फ टिकेट लाना होता है। एक बार यदि टिकेट मिल जाए तो पार्टी के ये सभी संसाधन उसके हो जाते है। इस तरह से कोई नामालूम, निकम्मा, कमीना, भ्रष्ट और आपराधिक छवि का व्यक्ति भी अगर टिकेट ले आता है तो वह बिना कुछ किये ही चुनावी जीत का दावेदार हो जाता है।
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जबकि किसी स्वतंत्र उम्मीदवार के पास इतना बड़ा सांगठनिक ढांचा, कार्यकर्ता और चुनाव लड़ने के लिए पैसा नहीं होता। और इतने कम समय में वह कितनी भी मेहनत करके इन्हें जुटा भी नहीं पाता है। इस तरह से संसाधन विहीन स्वतंत्र उम्मीदवार के लिए बराबर के मुकाबले के अवसर समाप्त हो जाते है। गुटबंदी और पैसा देकर प्रत्याशी टिकेट ले आते है और मतदाताओ को बाध्य होकर इन्हें ही चुनना होता है।
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समस्या -- चुनाव प्रचार के लिए समय की कमी होने और मतदान के लिए सिर्फ एक दिन तय होने के कारण पूरी शक्ति प्रचार में झोंकनी होती है। सिर्फ इसी कारण से संसाधन युक्त पार्टी के उम्मीदवार अपनी बढ़त बना लेते है, और योग्य होने के बावजूद निर्दलीय उम्मीदवार पिछड़ जाते है। यदि निर्दलीय उम्मीदवार पार्टी खड़ी करने पर काम करेंगे तो उन्हें दशको लग जाएंगे।
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समाधान :
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१) मतदान अवधि की सीमा बढ़ाना --- यदि मतदान को 365 दिनों और 5 वर्ष के लिए खोल दिया जाए तो स्थिति पलट जायेगी। इससे कम संसाधन होने के बावजूद निर्दलीय उम्मीदवार बिना किसी संगठन के भी धीमे धीमे अपना प्रचार करते रह सकते है। इससे उनके पास मतदाताओ तक पहुँचने के लिए पर्याप्त अवसर रहेगा। जब भी कोई मतदाता किसी उम्मीदवार से सहमत होता है, वह अपनी इच्छा से तब उसे वोट कर सकेगा। इस तरह से चुनाव पार्ट टाइम गतिविधि बन जायेगी और उम्मीदवारों को हड़बड़ी में अपने संसाधन नहीं झोंकने पड़ेंगे।
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२) जिस तरह बैंक अपना काउंटर लेकर रोज हमारे मोहल्ले में आकर नहीं कहता कि आज कि आज अपना पैसा निकालो या जमा कराओ, और फिर अगले 5 वर्ष तक किसी प्रकार का लेनदेन नहीं होगा, उसी तरह से मतदान में भी ऐसा नहीं होना चाहिए। हमें ऐसी प्रक्रिया लागू करनी चाहिए जिससे जिस व्यक्ति के पास जब समय हो वो उस समय पटवारी कार्यालय या कलेक्ट्री में जाकर अपना वोटर कार्ड दिखाकर अपना वोट दे सके। इस व्यवस्था के आने से चुनाव आयोग को मतदान के लिए अपनी भारी भरकम मशीनरी नहीं लगानी होगी, तथा चुनावो का खर्च बच जाएगा।
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३) वोट वापिस लेने का अधिकार --- कई बार मतदाता धुँवाधार प्रचार की चपेट में आकर गलत उम्मीदवार चुन लेते है। लेकिन उनके पास अपना वोट बदल लेने का कोई मौका नहीं होता। किसी भी समय वोट करने के साथ ही मतदाता को अपना वोट बदलने का अधिकार भी दिया जाना चाहिए। यदि किसी जनप्रतिनिधि के के मतों में एक निश्चित प्रतिशत से अधिक गिरावट दर्ज की जाए व किसी अन्य उम्मीदवार को एक वर्तमान प्रतिनिधि से अधिक मत मिल जाए तो अधिक मत वाला उम्मीदवार पद ग्रहण कर लेगा। इस व्यवस्था से मौजूदा प्रतिनिधियों पर लगातार अच्छा प्रदर्शन करने का दबाव बना रहेगा।
#वोट_वापसी_पासबुक
#जूरी_कोर्ट
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हमारे आंदोलन से जुड़ने ,आंदोलन के कार्यकर्ता बनने के लिए 98877 42837 पर संपर्क कर सकते हैं l
Sanket Gawande
उलझनों में फँसा मुसाफ़िर था, रास्ता न मिला...
चीख़ता रहा दुनिया से, पर अपना ही साया न मिला....
खुद को साबित करता रहा हर एक मोड़ पे, हर जगह....
लोग मिले बहुत से मगर दिल का हमसाया न मिला....
दर्द की आग में जलता रहा मैं हर एक रोज़....
तकलीफ़ों से लड़ते-लड़ते कोई सहारा न मिला....
भीतर ही भीतर बिखरता रहा ख़ामोशी के साथ....
हँसता रहा चेहरों में, पर मन का साया न मिला....
फिर धैर्य का हाथ थामा, मन को ठहरने दिया....
चुप रहना सीखा जब शोर में कुछ फायदा न मिला...
ना हर किसी को जवाब दिया, ना खुद को साबित किया....
जो सुकून चारों ओर ढूँढा, वो बाहर न मिला....
आख़िर झुककर देखा जब अपने ही अंदर “ये मुसाफ़िर”...
जिसे उम्र भर खोजता रह दर बदर, वही खुद में ही मिला.....
–संकेत गावंडे .
Soni shakya
सब सो गए और मैं,
अब भी अटकी हूं तुझमें..!!
🍁🍁
- Soni shakya
Soni shakya
राते चुप है और..!
यादें शोर मचा रही है..!!
- Soni shakya
S A Y R I K I N G
देख कर उसको अक्सर ये ख्याल आता हैं
काश शादी न हुई होती तो क्या होता
MOU DUTTA
তোমার চোখের কাজল
নাকি আমার চোখের জল,
কে ছিল প্রিয় আজও জানি না যে তা।
সত্য যদি প্রকাশ হয়
তবে ছলনা ভালোবাসা,
যে বাসা তে হারিয়ে গেছে
আমার সুখে থাকা।
হয়তো তুমি পূর্ণ চোখে চেয়ে আছো আজ
আমি আজ শূন্য মনে ফিরে গেছি থাক।
তবু চোখে আছে শুধু তোমার জন্য আশা
যে আশা তে শেষ হয় গো আমার ভালোবাসা।
শুধু আজ তুমি ছাড়া এসবই নিরাশা।
মৌ 🖋️
Raju kumar Chaudhary
न्याय की प्रतीक्षा में निर्मला
“माँ, होमवर्क करके जल्दी लौट आऊँगी।”
निर्मला ने अपने दोस्तों के लिए छोटे से प्लास्टिक में कुछ अमरूद बाँधे, अपनी पुरानी साइकिल निकाली और मुस्कुराते हुए घर के आँगन से निकल गई।
दिन ढल गया।
शाम हो गई।
लेकिन निर्मला नहीं लौटी।
बम दीदी-बहन के घर से दोपहर 2 बजे ही निकल चुकी निर्मला, शाम 8 बजे तक भी घर नहीं पहुँची। घबराए हुए माता-पिता पुलिस चौकी पहुँचे। वहीं उन्हें राज्य से पहला धोखा मिला।
“किसी लड़के के साथ चली गई होगी, घूम रही होगी।”
अपनी बेटी के लापता होने की पीड़ा से तड़पते माता-पिता पर वर्दीधारी रक्षकों की यह असंवेदनशील टिप्पणी थी। अगर उसी रात तुरंत खोज अभियान शुरू हो जाता, तो शायद इस कहानी का अंत कुछ और होता।
अगली सुबह— 11 साउन।
घर से कुछ ही दूरी पर गन्ने के खेत में निर्मला का निर्जीव शरीर मिला। उस दृश्य ने सिर्फ इंसानों को नहीं, बल्कि मानवता को भी झकझोर दिया। लेकिन उस भयावह घटना से भी ज़्यादा डरावना दृश्य इसके बाद देखने को मिला।
अपराध जांच में घटनास्थल को ‘मंदिर’ माना जाता है, लेकिन यहाँ रक्षक ही भक्षक के साथी बन गए। एक मासूम बच्ची के शव के पास मिली सलवार— जो बलात्कार का सबसे अहम सबूत हो सकती थी— पुलिस ने खुद पानी में धो दी।
क्या यह सिर्फ अज्ञानता थी?
या किसी के गुनाह धोने की सुनियोजित साज़िश?
भीड़ इकट्ठा हुई। निर्मला की साइकिल, कॉपी-किताबें शव से कुछ दूरी पर बिखरी पड़ी थीं। लेकिन संघर्ष का कोई निशान नहीं था। मानो हत्या कहीं और करके शव यहाँ सजा दिया गया हो।
सबूत मिटाने की जल्दबाज़ी में फॉरेंसिक टीम के पहुँचने से पहले ही शव हटा दिया गया। सच्चाई हमेशा के लिए उसी गन्ने के खेत की मिट्टी में दबा दी गई।
जन आक्रोश बढ़ता गया।
राज्य ने एक ‘पात्र’ खड़ा किया— दिलीप सिंह बिष्ट। 41 वर्षीय मानसिक रूप से असंतुलित व्यक्ति।
पुलिस ने तैयार की हुई पटकथा सुनाई—
“इसी ने निर्मला की हत्या की है।”
सबूत के नाम पर उसकी फटी हुई कमीज़ दिखाई गई।
बाद में बंद कमरे के भीतर की सच्चाई सामने आई—
“इस अपराध को स्वीकार कर ले, हम तुझे मांस और शराब देंगे, नहीं तो मार देंगे।”
एक मानसिक रोगी पर किया गया यह अत्याचार न्याय प्रणाली के चेहरे पर लगा काला धब्बा था।
लेकिन झूठ की उम्र लंबी नहीं होती।
निर्मला के शरीर से लिए गए (चाहे जितने भी विवादित क्यों न हों) डीएनए नमूने दिलीप के डीएनए से नहीं मिले।
विज्ञान ने राज्य के झूठ को मानने से इनकार कर दिया।
एक निर्दोष बच गया, लेकिन असली अपराधी आज भी पर्दे के पीछे मुस्कुराता रहा।
निर्मला के लिए न्याय माँगते ही सड़कें आग बन गईं।
पूरा देश रो पड़ा। कंचनपुर की सड़कों पर नारे गूँजे—
“सरकार, निर्मला को न्याय दो!”
लेकिन सरकार ने न्याय की जगह गोलियाँ चलाईं।
8 भदौ।
17 वर्षीय सन्नी— निर्मला के लिए न्याय माँगने सड़क पर उतरा एक किशोर— पुलिस की गोली से गिर पड़ा।
एक हत्या की जाँच करनी थी, राज्य ने जवाब में एक और हत्या कर दी।
आज वर्षों बीत चुके हैं।
घटनास्थल के पास की सेना की बैरक, बम दीदी-बहन का घर, बार-बार बदले गए बयान, घटना के तुरंत बाद रंगे गए कमरे, सलवार धोने वाले पुलिसकर्मी और शक के घेरे में खड़े ‘वीआईपी’ चेहरे— सब आज भी रहस्य के गर्भ में हैं।
निर्मला के पिता यज्ञराज पंत— न्याय माँगते-माँगते मानसिक रूप से टूट चुके हैं।
माँ दुर्गा देवी— राज्य से लड़ते-लड़ते अंततः हार मानने को मजबूर हो गईं।
इस कहानी का अंत अभी लिखा जाना बाकी है।
निर्मला का हत्यारा आज भी आज़ाद घूम रहा है।
उसके नाम पर कार्यक्रम चलाने वाले मंत्री बने, प्रधानमंत्री बदले, कानून मंत्री, आईजीपी, डीआईजी— सब बदल गए।
लेकिन एक सच्चाई आज भी नहीं बदली—
“निर्मला की आत्मा को अब तक शांति नहीं मिली है।”
निर्मला पंत को हार्दिक श्रद्धांजलिउखुबारीले देखेको सत्य
“आमा, म छिट्टै फर्किन्छु”
भन्दै निस्किएकी
एउटी छोरी
घर फर्किन पाइन।
साँझ ढल्दै गयो,
आकाश रातो भयो,
आमाको मन
रातभन्दा गहिरो अन्धकार बन्यो।
चौकीको ढोकामा
आँसु लिएर उभिँदा
राज्यले भन्यो—
“केटासँग होली।”
त्यही रात
न्याय निदायो,
र अर्को बिहान
उखुबारी रोयो।
सानो साइकल,
कापी–कलम,
र च्यातिएको सपना
माटोमा छरपस्ट।
प्रमाण पखालियो पानीले,
पाप पखालियो कि
सत्य डुबाइयो?
उखुबारी जान्दछ।
एउटा निर्दोष बालिका,
अर्को मानसिक रोगी,
र बीचमा
राज्यको झूट।
विज्ञान चिच्यायो—
“ऊ अपराधी होइन!”
तर हत्यारा
भीआईपी मुस्कानमा हरायो।
न्याय माग्दा
सडक आगो बन्यो,
र न्यायकै नाममा
गोली चल्यो।
सन्नी ढल्यो,
१७ वर्षको सपना
रगतमा मिसियो,
राज्य फेरि मौन भयो।
बुबाको आवाज
सडकमा गल्दै गयो,
आमाको आँसु
थाकेर रोकियो।
मन्त्री फेरिए,
कुर्सी सरे,
तर एउटी छोरीको
न्याय अड्कियो।
आज पनि उखुबारी
माटोमुनि सत्य बोकेर
चुपचाप उभिएको छ।
र देशले सुन्न नसकेको
एउटा आवाज अझै गुञ्जिन्छ—
“म निर्मला हुँ,
मलाई न्याय चाहिन्छ।https://youtube.com/@rajufilmyjunction?si=cCmXX87Yn7XPtlu
Raju kumar Chaudhary
न्याय की प्रतीक्षा में निर्मला
“माँ, होमवर्क करके जल्दी लौट आऊँगी।”
निर्मला ने अपने दोस्तों के लिए छोटे से प्लास्टिक में कुछ अमरूद बाँधे, अपनी पुरानी साइकिल निकाली और मुस्कुराते हुए घर के आँगन से निकल गई।
दिन ढल गया।
शाम हो गई।
लेकिन निर्मला नहीं लौटी।
बम दीदी-बहन के घर से दोपहर 2 बजे ही निकल चुकी निर्मला, शाम 8 बजे तक भी घर नहीं पहुँची। घबराए हुए माता-पिता पुलिस चौकी पहुँचे। वहीं उन्हें राज्य से पहला धोखा मिला।
“किसी लड़के के साथ चली गई होगी, घूम रही होगी।”
अपनी बेटी के लापता होने की पीड़ा से तड़पते माता-पिता पर वर्दीधारी रक्षकों की यह असंवेदनशील टिप्पणी थी। अगर उसी रात तुरंत खोज अभियान शुरू हो जाता, तो शायद इस कहानी का अंत कुछ और होता।
अगली सुबह— 11 साउन।
घर से कुछ ही दूरी पर गन्ने के खेत में निर्मला का निर्जीव शरीर मिला। उस दृश्य ने सिर्फ इंसानों को नहीं, बल्कि मानवता को भी झकझोर दिया। लेकिन उस भयावह घटना से भी ज़्यादा डरावना दृश्य इसके बाद देखने को मिला।
अपराध जांच में घटनास्थल को ‘मंदिर’ माना जाता है, लेकिन यहाँ रक्षक ही भक्षक के साथी बन गए। एक मासूम बच्ची के शव के पास मिली सलवार— जो बलात्कार का सबसे अहम सबूत हो सकती थी— पुलिस ने खुद पानी में धो दी।
क्या यह सिर्फ अज्ञानता थी?
या किसी के गुनाह धोने की सुनियोजित साज़िश?
भीड़ इकट्ठा हुई। निर्मला की साइकिल, कॉपी-किताबें शव से कुछ दूरी पर बिखरी पड़ी थीं। लेकिन संघर्ष का कोई निशान नहीं था। मानो हत्या कहीं और करके शव यहाँ सजा दिया गया हो।
सबूत मिटाने की जल्दबाज़ी में फॉरेंसिक टीम के पहुँचने से पहले ही शव हटा दिया गया। सच्चाई हमेशा के लिए उसी गन्ने के खेत की मिट्टी में दबा दी गई।
जन आक्रोश बढ़ता गया।
राज्य ने एक ‘पात्र’ खड़ा किया— दिलीप सिंह बिष्ट। 41 वर्षीय मानसिक रूप से असंतुलित व्यक्ति।
पुलिस ने तैयार की हुई पटकथा सुनाई—
“इसी ने निर्मला की हत्या की है।”
सबूत के नाम पर उसकी फटी हुई कमीज़ दिखाई गई।
बाद में बंद कमरे के भीतर की सच्चाई सामने आई—
“इस अपराध को स्वीकार कर ले, हम तुझे मांस और शराब देंगे, नहीं तो मार देंगे।”
एक मानसिक रोगी पर किया गया यह अत्याचार न्याय प्रणाली के चेहरे पर लगा काला धब्बा था।
लेकिन झूठ की उम्र लंबी नहीं होती।
निर्मला के शरीर से लिए गए (चाहे जितने भी विवादित क्यों न हों) डीएनए नमूने दिलीप के डीएनए से नहीं मिले।
विज्ञान ने राज्य के झूठ को मानने से इनकार कर दिया।
एक निर्दोष बच गया, लेकिन असली अपराधी आज भी पर्दे के पीछे मुस्कुराता रहा।
निर्मला के लिए न्याय माँगते ही सड़कें आग बन गईं।
पूरा देश रो पड़ा। कंचनपुर की सड़कों पर नारे गूँजे—
“सरकार, निर्मला को न्याय दो!”
लेकिन सरकार ने न्याय की जगह गोलियाँ चलाईं।
8 भदौ।
17 वर्षीय सन्नी— निर्मला के लिए न्याय माँगने सड़क पर उतरा एक किशोर— पुलिस की गोली से गिर पड़ा।
एक हत्या की जाँच करनी थी, राज्य ने जवाब में एक और हत्या कर दी।
आज वर्षों बीत चुके हैं।
घटनास्थल के पास की सेना की बैरक, बम दीदी-बहन का घर, बार-बार बदले गए बयान, घटना के तुरंत बाद रंगे गए कमरे, सलवार धोने वाले पुलिसकर्मी और शक के घेरे में खड़े ‘वीआईपी’ चेहरे— सब आज भी रहस्य के गर्भ में हैं।
निर्मला के पिता यज्ञराज पंत— न्याय माँगते-माँगते मानसिक रूप से टूट चुके हैं।
माँ दुर्गा देवी— राज्य से लड़ते-लड़ते अंततः हार मानने को मजबूर हो गईं।
इस कहानी का अंत अभी लिखा जाना बाकी है।
निर्मला का हत्यारा आज भी आज़ाद घूम रहा है।
उसके नाम पर कार्यक्रम चलाने वाले मंत्री बने, प्रधानमंत्री बदले, कानून मंत्री, आईजीपी, डीआईजी— सब बदल गए।
लेकिन एक सच्चाई आज भी नहीं बदली—
“निर्मला की आत्मा को अब तक शांति नहीं मिली है।”
निर्मला पंत को हार्दिक श्रद्धांजलि
Himanshu Shukla
पहला प्यार कभी भुलाया नहीं जाता… 💔
कुछ एहसास अधूरे रह जाते हैं,
और वही ज़िंदगी भर याद बन जाते हैं।
📖 “पहला प्यार : अनकहा एहसास (Part-1)”
आ चुका है। ❤️
अगर आपने भी कभी चुपचाप किसी से प्यार किया है,
तो ये कहानी आपके दिल को छू जाएगी…
Raju kumar Chaudhary
न्यायको पर्खाइमा निर्मला
“आमा, होमवर्क सकेर छिट्टै फर्किन्छु है।”
निर्मलाले सानो प्लास्टिकमा आफ्ना साथीहरूका लागि केही अम्बा पोको पारिन्, पुरानो साइकल निकालिन् र मुस्कुराउँदै घरको आँगनबाट निस्किइन्।
दिन ढल्यो। साँझ पर्यो।
तर निर्मला फर्किनन्।
बम दिदीबहिनीको घरबाट दिउँसो २ बजे नै निस्किसकेको भनिएकी निर्मला साँझ ८ बजेसम्म पनि घर पुगिनन्। आत्तिएका आमा–बुबा प्रहरी चौकी पुगे। त्यहीँ उनीहरूले राज्यबाट पहिलो धोका पाए।
“पोइला गइहोली, केटासँग घुम्दै होली।”
छोरी हराएको पीडामा छटपटाइरहेका आमाबुवामाथि बर्दीधारी रक्षकहरूको यो असंवेदनशील टिप्पणी थियो। यदि त्यो रात तत्काल खोजी अभियान सुरु भएको भए, सायद यो कथाको अन्त्य अर्कै हुन सक्थ्यो।
भोलिपल्ट बिहान— साउन ११ गते।
घरभन्दा केही परको उखुबारीमा निर्मलाको निर्जीव शरीर भेटियो। त्यो दृश्यले मान्छेको मात्र होइन, मानवताकै सातो उडायो। तर त्यो विभत्स घटनाभन्दा पनि डर लाग्दो दृश्य त त्यसपछि देखियो।
अपराध अनुसन्धानमा घटनास्थललाई ‘मन्दिर’ मानिन्छ। तर यहाँ रक्षकहरू नै भक्षकको मतियार बने। एउटा अबोध बालिकाको शव नजिक भेटिएको सुरुवाल— जुन बलात्कारको सबैभन्दा महत्वपूर्ण प्रमाण हुन सक्थ्यो— प्रहरीकै हातले पानीमा चोबलेर पखालियो।
के त्यो अज्ञानता मात्र थियो? कि कसैको पाप पखाल्ने नियोजित षड्यन्त्र?
भीड जम्मा भयो। निर्मलाको साइकल, कापी–किताबहरू शवभन्दा केही पर असरल्ल थिए। तर संघर्षको कुनै चिन्ह थिएन। मानौँ, हत्या अन्तै कतै गरेर शव यहाँ सजाइएको थियो।
तर प्रमाण नष्ट गर्ने हतारोमा फरेन्सिक टोली नपुग्दै शव उठाइयो। सत्य त्यही उखुबारीको माटोमुनि सधैँका लागि दबाइयो।
जनआक्रोश बढ्दै गयो।
राज्यले एउटा ‘पात्र’ खडा गर्यो— दिलिप सिंह विष्ट। ४१ वर्षीय मानसिक सन्तुलन गुमाएका व्यक्ति।
प्रहरीले तयारी पटकथा सुनायो— “यसैले निर्मलालाई मारेको हो।”
प्रमाणको नाममा च्यातिएको कमिज देखाइयो।
पछि मात्र बन्द कोठाभित्रको सत्य बाहिर आयो।
“यो अपराध स्वीकार गर, हामी तँलाई मासु र रक्सी दिन्छौं, नत्र मारिदिन्छौं।”
एक मानसिक रोगीमाथि गरिएको यो यातना न्याय प्रणालीको अनुहारमा लागेको कालो धब्बा थियो।
तर झूटको आयु छोटो हुन्छ।
निर्मलाको शरीरबाट संकलित (जतिसुकै विवादित भए पनि) DNA र दिलिपको DNA मिलेन।
विज्ञानले राज्यको झूट स्वीकार गरेन। एउटा निर्दोष बच्यो, तर असली अपराधी अझै पर्दा पछाडि मुस्कुराइरह्यो।
निर्मलाको न्याय माग्दा सडक आगो बन्यो।
सिङ्गो देश रोयो। कञ्चनपुरमा नारा लाग्यो—
“सरकार, निर्मलालाई न्याय दे!”
तर सरकारले न्यायको साटो गोली चलायो।
भदौ ८ गते।
१७ वर्षीय सन्नी— निर्मलाका लागि न्याय माग्दै सडकमा उत्रिएका एक किशोर— प्रहरीको गोली लागेर ढले। एउटा हत्याको छानबिन गर्नुपर्ने राज्यले अर्को हत्या गरेर जवाफ दियो।
आज वर्षौं बितिसके।
घटनास्थल नजिकको सेनाको ब्यारेक, बम दिदीबहिनीको घर, पटक–पटक फेरिएका बयानहरू, घटना लगत्तै रंगरोगन गरिएका कोठाहरू, सुरुवाल पखाल्ने प्रहरीहरू र शंकाको घेरामा रहेका ‘भीआईपी’ अनुहारहरू— सबै रहस्यकै गर्भमा छन्।
निर्मलाका बुबा यज्ञराज पन्त— न्याय माग्दामाग्दै मानसिक रूपमा थाकिसके।
आमा दुर्गा देवी— राज्यसँग लड्दालड्दै अन्ततः हार मान्न बाध्य भइन्।
यो कथाको अन्त्य अझै लेखिएको छैन।
निर्मलाको हत्यारा आज पनि स्वतन्त्र हिँडिरहेको छ।
उनको नाममा कार्यक्रम चलाउनेहरू मन्त्री बने, प्रधानमन्त्री फेरिए, कानुनमन्त्री, आईजीपी, डीआईजी सबै बदलिए।
तर नफेरिएको एउटा मात्रै सत्य छ—
“निर्मलाको आत्माले अझै शान्ति पाएको छैन।”
निर्मला पन्तप्रति हार्दिक श्रद्धाञ्जली।उखुबारीले देखेको सत्य
“आमा, म छिट्टै फर्किन्छु”
भन्दै निस्किएकी
एउटी छोरी
घर फर्किन पाइन।
साँझ ढल्दै गयो,
आकाश रातो भयो,
आमाको मन
रातभन्दा गहिरो अन्धकार बन्यो।
चौकीको ढोकामा
आँसु लिएर उभिँदा
राज्यले भन्यो—
“केटासँग होली।”
त्यही रात
न्याय निदायो,
र अर्को बिहान
उखुबारी रोयो।
सानो साइकल,
कापी–कलम,
र च्यातिएको सपना
माटोमा छरपस्ट।
प्रमाण पखालियो पानीले,
पाप पखालियो कि
सत्य डुबाइयो?
उखुबारी जान्दछ।
एउटा निर्दोष बालिका,
अर्को मानसिक रोगी,
र बीचमा
राज्यको झूट।
विज्ञान चिच्यायो—
“ऊ अपराधी होइन!”
तर हत्यारा
भीआईपी मुस्कानमा हरायो।
न्याय माग्दा
सडक आगो बन्यो,
र न्यायकै नाममा
गोली चल्यो।
सन्नी ढल्यो,
१७ वर्षको सपना
रगतमा मिसियो,
राज्य फेरि मौन भयो।
बुबाको आवाज
सडकमा गल्दै गयो,
आमाको आँसु
थाकेर रोकियो।
मन्त्री फेरिए,
कुर्सी सरे,
तर एउटी छोरीको
न्याय अड्कियो।
आज पनि उखुबारी
माटोमुनि सत्य बोकेर
चुपचाप उभिएको छ।
र देशले सुन्न नसकेको
एउटा आवाज अझै गुञ्जिन्छ—
“म निर्मला हुँ,
मलाई न्याय चाहिन्छ।
Ashish jain
दिखावे की प्यास (आशीष की दृष्टि से)
मूर्ख बहुत है दुनिया यहाँ, बस ज्ञान बाँटना पेशा है,
स्वयं सीखने की बारी आए, तो लगता घोर अंदेशा है।
झुककर ग्रहण करे जो विद्या, वह छोटा मान लिया जाता, आशीष, अहंकार की चोटी पर, बोध कहाँ टिक पाता है?
थाली सजी-सजाई मिल जाए, सब उस पर टूट पड़ते हैं, मेहनत की आँच पर पकने से, अक्सर लोग मुकरते हैं। पका-पकाया सत्य चाहिए, खोज की राह से डरते हैं, बिना चले ही मंज़िल पाने की, झूठी कोशिश करते हैं।
खोज रहे सब शांति यहाँ, पर शोर भीतर का भारी है, मौन को सुनने की हिम्मत, क्या हमने कभी विचारी है? शांति का मार्ग कठिन है, पर सब सुख की चाहत रखते हैं, अशांति के कड़वे घूँटों को, अमृत कहकर चखते हैं।
मोक्ष-मोक्ष की रट लगी है, पर मोह का बंधन प्यारा है, निकलना कोई चाहता नहीं, जिसे जंजाल ने घेरा है। आशीष, मुक्त वही है जिसने खुद को, सत्य के साँचे में ढाला है, वरना इस दुनिया ने तो, बस भ्रम का जाल पाला है।
ज्ञान वही जो आचरण में हो, बाकी सब वाचालता है, बिना साधना के सिद्ध हो जाना, बस एक कोरी कल्पना है।
आशीष जैन (श्रीचंद)
7055301422
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