Vrajesh Shashikant Dave stories download free PDF

अन्तर्निहित - 54

by Vrajesh Shashikant Dave
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[54]“सारी तैयारियां हो चुकी है। आप दोनों कल भोर होते ही अपने अभियान पर निकल सकते हो।” विजेंदर ने ...

अन्तर्निहित - 53

by Vrajesh Shashikant Dave
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[53]सारा के साथ शैल निकल पडा गुरु जी के आश्रम को जाने के लिए। मार्ग में ही सूर्यास्त हो ...

अन्तर्निहित - 52

by Vrajesh Shashikant Dave
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[52]वत्सर घर लौट रहा था तब वह मन ही मन अपने आराध्य श्रीकृष्ण का धन्यवाद करता रहा था। साथ ...

अन्तर्निहित - 51

by Vrajesh Shashikant Dave
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[51]पुलिस कार्यालय में नदीम के स्थान पर श्रीधर को स्थानांतरित किया गया था। उसने त्वरित कार्यभार संभाल लिया। उसके ...

अन्तर्निहित - 50

by Vrajesh Shashikant Dave
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[50]अपनी निर्दोषता सिद्ध होने पर वत्सर मन ही मन श्री कृष्ण का धन्यवाद करते हुए स्तुति करने लगा। न्यायालय ...

अन्तर्निहित - 49

by Vrajesh Shashikant Dave
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[49]“दो दिन पूर्व मेरे कार्यालय में सपन और निहारिका के साथ कपिल महोदय भी आए थे। उन्होंने मुझे उनकी ...

अन्तर्निहित - 48

by Vrajesh Shashikant Dave
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[48]“वत्सर ने सभी परीक्षणों की अनुमति दे दी है। अब सत्य प्रकट होकर रहेगा।” सपन ने कहा।“मुझे तो प्रतीत ...

अन्तर्निहित - 47

by Vrajesh Shashikant Dave
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[47]“श्रीकृष्ण के चरित्र के विषय में बात करना किसी के भी सामर्थ्य की बात नहीं। तथापि इतना समझ लो ...

अन्तर्निहित - 46

by Vrajesh Shashikant Dave
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[46]“मैं जानता हूँ। वेदों में राधा का नाम है। ऋग्वेद में है जो सबसे प्राचीन ग्रंथ है।” सहसा स्वामीजी ...

अन्तर्निहित - 45

by Vrajesh Shashikant Dave
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[45]“कपिल महोदय, और कोई तर्क है क्या?” या इस बात को यहाँ सम्पन्न मानकर स्वीकार कर लें कि राधाजी ...