GANESH TEWARI 'NESH' (NASH) stories download free PDF

तू मेरा मैं तेरा

by GANESH TEWARI 'NESH' (NASH)
  • 144

ऋगुवेद सूक्ति-(१२) की‌ व्याख्या-“त्वमस्माकं तव स्मसि”ऋगुवेद --८/९२/३२भावार्थ --प्रभु ! तू हमारा है हम‌ तेरे‌ हैं।यह आत्मसमर्पण, आश्रय और दिव्य–संबंध ...

आत्मा की यात्रा

by GANESH TEWARI 'NESH' (NASH)
  • 120

ऋगुवेद सूक्ति-- (१३) की व्याख्याअधाम इन्द्र श्रणवो हवेमा — ऋग्वेद ७/२९/३भावार्थ --हे प्रभो ! हमारी पुकार को‌ सुनो।पदच्छेद--अधाम । ...

आत्मबोध

by GANESH TEWARI 'NESH' (NASH)
  • 522

ऋगुवेद सूक्ति-- (१४) की व्याख्याऋग्वेद के मंत्र “यस्तन्न वेद किमृचा करिष्यति""… (१.१६४.३९)भावार्थ --ब्रह्म-तत्त्व को जाने बिना वेद-मंत्रों का पाठ ...

सच्ची मित्रता

by GANESH TEWARI 'NESH' (NASH)
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ऋगुवेद सूक्ति--(१५) की व्याख्यातवेद्धि सख्यम् स्तृतम्। १/१५/५भावार्थ -प्रभो ! आपकी ही मैत्री सच्ची है।पद-विश्लेषण--तव = तेरा / आपकाएव इद्धि ...

उदार जीवन

by GANESH TEWARI 'NESH' (NASH)
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ऋगुवेद सूक्ति-(१६)-की व्याख्या"मान्तः स्थूर्नो अरातयः" — १०/५७/१भावार्थ --हमारे अन्दर कंजूसी न हो।पद विच्छेद --मान्तः — भीतर, अन्तर मेंस्थूः/स्थुर्नः — ...

दान देने से धन नहीं घटता

by GANESH TEWARI 'NESH' (NASH)
  • 528

ऋगुवेद सूक्त.(१७) की व्याख्यामन्त्र — ऋग्वेद १०/११७/१उतो रयिः पृणतो नो पदस्यति।भावार्थ -दान करने वाले का धन नहीं घटता।पदच्छेद--उत + ...

जुआ मत खेलो

by GANESH TEWARI 'NESH' (NASH)
  • 573

ऋगुवेद सूक्ति-- (18) की व्याख्या"अक्षैर्मा दीव्य: कृषिमित् कृषस्व" 10/34/13भावार्थ--जुआ मत‌ खेलो, खेती करो।ऋग्वेद का यह मन्त्र द्यूत (जुआ)के दुष्परिणामों ...

जुआरी का पतन

by GANESH TEWARI 'NESH' (NASH)
  • 423

ऋगुवेद सूक्ति-(१९) की व्याख्या-“जाया तप्यते कितवस्य हीना”भावार्थ --जुआरी की पत्नी दीन हीन होकर दुख पाती है।ऋग्वेद १०.३४.१० (अक्षसूक्त)यह मंत्र ...

आत्मजागृति

by GANESH TEWARI 'NESH' (NASH)
  • 519

ऋगुवेद सूक्ति--(२०) की व्याख्या"कृत्वा चेतिष्ठो विश्वार्म्भूत"" १/६५/५भावार्थ --पदच्छेद (संकेतात्मक)कृत्वा । चेतिष्ठः । विश्वम् । अर्मभूत् (अर्म = स्नेह/हित)भावार्थ--प्रात: जागने ...

आलस्य मत‌ करो

by GANESH TEWARI 'NESH' (NASH)
  • 669

ऋगुवेद सूक्ति--(21) की व्याख्याऋगुवेद--"मा स्रेधत"--7/32/9अर्थ---आलस्य मत‌ करो।ऋग्वेद में प्रयुक्त — “मा स्रेधत” का भावार्थ है:“शिथिल मत पड़ो, आलस्य मत ...