मंदिर से लौटते वक्त गाड़ी में अजीब सी खामोशी थी न कोई हंसी न कोई हल्की-फुल्की बात रवीना खिड़की ...
अंधेरा अब सिर्फ बाहर नहीं था वो हर साँस के साथ भीतर उतर रहा था।हवा भारी थी, जमीन ठंडी ...
शादी का दिन सुबह का समय था मंदिर के आँगन में हल्की धूप उतर रही थी हवा में अगरबत्ती ...
अचानक शांति टूट गई पेड़ के भीतर से एक भयंकर धमाका हुआ और जमीन ऐसे हिली जैसे नीचे कुछ ...
पेड़ की दरार एक झटके में पूरी तरह फट गई और उसके भीतर कैद वह विकृत आकृति भारी आवाज ...
अगली सुबह घर में हमेशा की तरह जल्दी हलचल शुरू हो गई रसोई से तवे पर सिकती रोटियों की ...
तुषार अपने कमरे में खड़ा था। हाथ में प्रेस थी, लेकिन उसका ध्यान कपड़ों पर नहीं, कहीं और भटक ...
हवा में अब स्थिरता नहीं थी वो काँप रही थी जैसे दो अदृश्य ताकतें एक-दूसरे को धकेल रही हों ...
ज्वेलरी शॉप से बाहर निकलते-निकलते शाम ढलने लगी थी। दिन भर की भागदौड़ के बाद दोनों परिवारों के चेहरों ...
दोपहर की रोशनी धीरे-धीरे ढल रही थी, लेकिन पेड़ के आसपास समय जैसे ठहर गया था मंडल पूरा हो ...