Rinki Singh stories download free PDF

इंसानियत

by Rinki Singh

जून का महीना था, बेतहाशा गर्मी, चिलचिलाती धूप, सूर्य देव का प्रकोप अपने चरम पर था, जैसे सबकुछ जला ...

सुरक्षा-छत्र

by Rinki Singh
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गर्मी की दोपहर पूरे उन्माद पर थी। बाज़ार की चहल-पहल धीमी पड़ चुकी थी। श्यामा अपनी कपड़ों की दुकान ...

मिड-डे मील

by Rinki Singh
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प्राथमिक विद्यालय का प्रांगण कोलाहल से भरा हुआ था। आज स्कूल का अंतिम दिन था, कल से गर्मी की ...

स्मृतियों की खाट

by Rinki Singh
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दरवाज़े के बगल में रखी पुरानी सी खाट पर बैठकर हरिप्रसाद जी हर सुबह चाय की चुस्कियों के साथ ...

प्रमाणपत्र

by Rinki Singh
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ऑनलाइन कवि सम्मेलन की तैयारी में नीलिमा पुरानी अलमारी खंगाल रही थी |विषय था- "अपनी पहली रचना"|सोच रही थी, ...

ठुमकी (एक ठुमकती हुई ज़िन्दगी का असमय अंत )

by Rinki Singh
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ससुराल से एक साल बाद मायके पहुँची थी |बरामदे की चौखट पार की ही थी कि सामने से फूला ...

मृदुला

by Rinki Singh
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मृदुला के घर से फिर वही आवाजें उठ रही थीं..चीखें, रोने की, बर्तनों के गिरने की, बच्चों के सिसकने ...

रोशनी सी औरतें

by Rinki Singh
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गाँव के सुनसान छोर पर एक जर्जर मकान खड़ा था , जिसकी दीवारों की दरारों से हवा सीटी बजाती ...

एक पत्र उनके नाम

by Rinki Singh
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प्रिय राधा आंटी!,उम्मीद है जहाँ होंगी इस जहाँ से बेहतर होंगी |हर कष्ट हर पीड़ा से मुक्त होंगी |आंटी!...कभी ...