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भूख

by Rinki Singh

दिसंबर के अंतिम सप्ताह की वह रात हड्डियाँ जमा देने वाली थी। ठंड ऐसी कि लगता था नसों में ...

गुस्सा नहीं ग़ुरूर

by Rinki Singh
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कुछ महीने पहले काशी जाना हुआ |बस में मेरी खिड़की वाली सीट थी | मैं बैठ चुकी थी कि ...

इंसानियत

by Rinki Singh
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जून का महीना था, बेतहाशा गर्मी, चिलचिलाती धूप, सूर्य देव का प्रकोप अपने चरम पर था, जैसे सबकुछ जला ...

सुरक्षा-छत्र

by Rinki Singh
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गर्मी की दोपहर पूरे उन्माद पर थी। बाज़ार की चहल-पहल धीमी पड़ चुकी थी। श्यामा अपनी कपड़ों की दुकान ...

मिड-डे मील

by Rinki Singh
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प्राथमिक विद्यालय का प्रांगण कोलाहल से भरा हुआ था। आज स्कूल का अंतिम दिन था, कल से गर्मी की ...

स्मृतियों की खाट

by Rinki Singh
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दरवाज़े के बगल में रखी पुरानी सी खाट पर बैठकर हरिप्रसाद जी हर सुबह चाय की चुस्कियों के साथ ...

प्रमाणपत्र

by Rinki Singh
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ऑनलाइन कवि सम्मेलन की तैयारी में नीलिमा पुरानी अलमारी खंगाल रही थी |विषय था- "अपनी पहली रचना"|सोच रही थी, ...

ठुमकी (एक ठुमकती हुई ज़िन्दगी का असमय अंत )

by Rinki Singh
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ससुराल से एक साल बाद मायके पहुँची थी |बरामदे की चौखट पार की ही थी कि सामने से फूला ...

मृदुला

by Rinki Singh
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मृदुला के घर से फिर वही आवाजें उठ रही थीं..चीखें, रोने की, बर्तनों के गिरने की, बच्चों के सिसकने ...

रोशनी सी औरतें

by Rinki Singh
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गाँव के सुनसान छोर पर एक जर्जर मकान खड़ा था , जिसकी दीवारों की दरारों से हवा सीटी बजाती ...