vikram kori stories download free PDF

समर्पण से आंगे - 11

by vikram kori
  • 243

‎भाग – 11‎‎‎रात बहुत भारी थी।‎ऐसी रात, जिसमें नींद आँखों से नहीं‎सोचों से भाग जाती है।‎‎सृष्टि खिड़की के पास ...

समर्पण से आंगे - 10

by vikram kori
  • 441

‎भाग – 10‎‎‎शाम का समय था।‎सृष्टि की सिलाई मशीन आज कुछ ज़्यादा देर तक चलती रही।‎‎काम अब बढ़ने लगा ...

समर्पण से आंगे - 9

by vikram kori
  • 492

‎‎भाग – 9‎‎‎स्टेशन पर उतरते ही सृष्टि ने गहरी साँस ली।‎‎वही शहर,‎वही सड़कें,‎लेकिन अब उसकी चाल में झिझक नहीं ...

समर्पण से आंगे - 8

by vikram kori
  • 466

‎‎‎भाग – 8‎‎बस की खिड़की से बाहर भागती सड़क‎सृष्टि की आँखों के अंदर भी भाग रही थी।‎‎नया शहर।‎नई जगह।‎और ...

समर्पण से आंगे - 7

by vikram kori
  • 624

‎‎भाग – 7‎जब बदनामी ने दरवाज़ा खटखटाया‎समाज जब हारने लगता है,‎तो वह सच से नहीं,‎बदनामी से हमला करता है।‎‎अगली ...

समर्पण से आंगे - 6

by vikram kori
  • 984

‎‎भाग – 6‎‎‎सुबह की धूप आँगन में उतर रही थी,‎लेकिन घर के अंदर एक अजीब सा सन्नाटा छाया हुआ ...

समर्पण से आंगे - 5

by vikram kori
  • 1.2k

‎भाग – 5‎‎‎माँ के फैसले के बाद सब कुछ बाहर से सामान्य दिख रहा था,‎लेकिन अंदर ही अंदर हर ...

समर्पण से आंगे - 4

by vikram kori
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‎‎भाग – 4‎‎गाँव की बस सुबह-सुबह शहर पहुँची।‎‎अंकित प्लेटफॉर्म पर खड़ा था, दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था।‎उसे पता ...

समर्पण से आंगे - 3

by vikram kori
  • 813

‎भाग -3‎बारिश के बाद की सुबह कुछ ज़्यादा ही खामोश थी।‎‎मंदिर के सामने वही जगह, वही फूलों की खुशबू—‎लेकिन ...

‎समर्पण से आंगे - 2

by vikram kori
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  • 1.3k

‎‎ भाग – 2‎‎उस रात अंकित देर तक सो नहीं पाया।‎‎कमरे की बत्ती बंद थी, लेकिन दिमाग़ में सवालों ...